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बीजेपी का मुस्लिम प्रेम: मुसलमान मजबूरी है, जीतना बहुत जरूरी है

उत्तर प्रदेश में आगामी नगर निकाय और नगर पंचायत चुनावों में बीजेपी की रणनीति पर अगर नजर डालें तो ऊपर लिखे नारे की परिभाषा को समझना आसान हो जाएगा.

Updated On: Nov 14, 2017 09:53 PM IST

Utpal Pathak

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बीजेपी का मुस्लिम प्रेम: मुसलमान मजबूरी है, जीतना बहुत जरूरी है

उत्तर प्रदेश में आगामी नगर निकाय और नगर पंचायत चुनावों में बीजेपी की रणनीति पर अगर नजर डालें तो ऊपर लिखे नारे की परिभाषा को समझना आसान हो जाएगा. जिस अंदाज में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं उससे साफ जाहिर है कि यह लिटमस टेस्ट अगर सफल  हुआ तो 2019 में बड़े दांव खेले जाएंगे. इसके साथ ही एक नीतिगत मजबूरी भी है जहां बीजेपी के पास मुस्लिम प्रत्याशियों को साथ लेकर चलने के सिवा कोई विकल्प नहीं.

सुबह की भूली बीजेपी क्या शाम को वापस घर आ चुकी है ?

ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपने हिंदूवादी एजेंडे से तौबा कर ली है लेकिन एक बात साफ जाहिर है कि अब लचीलापन नजर आने लगा है. ऐसे में इतिहास में हुई कुछ भूलों के अलावा आंकड़ों का गणित भी ऐसे उपक्रमों को प्रभावित कर रहे हैं.

पिछले चुनावों पर अगर नजर डालें तो 2012 में बीजेपी ने प्रदेश के 5148 वार्डों में महज 842 में ही उम्मीदवार उतारे थे. इनमें कई मुस्लिम बाहुल्य पंचायतों में बीजेपी का कोई उम्मीदवार नहीं था. वहीं, नगर निगमों में 980 पार्षद पदों की तुलना में  बीजेपी ने 844 पर ही प्रत्याशी उतारे थे.

दशाश्वमेध घाट, वाराणसी

वाराणसी (प्रतीकात्मक तस्वीर)

यहां तक कि बीजेपी का गढ़ माने जाने वाले वाराणसी नगर निगम की 90 में 78 सीटों पर ही प्रत्याशी उतारे गए थे, क्योंकि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों के वार्डों के लिये पार्टी के पास उम्मीदवारों का अभाव था.

2012 में समाजवादी पार्टी को खासा लाभ हुआ था और मुस्लिम समुदाय का समर्थन मिलने के कारण एसपी को मजबूती मिली थी.  इस वर्ष हुए नगरीय निकाय चुनाव में 30% से अधिक नगर पालिका और नगर पंचायत के अध्यक्ष पद पर मुस्लिम प्रत्याशी की जीत हुई थी.

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उत्तर प्रदेश के कुछ मुख्य जिले जैसे सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, बहराइच, मुजफ्फरनगर, बलरामपुर, मेरठ, अमरोहा, रामपुर, बरेली, श्रावस्ती में मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है. वहीं अलीगढ़, मुरादाबाद, फिरोजाबाद, संभल, शामली जैसे जिलों की कई नगर पंचायतों में 50 से 70% तक मुस्लिम आबादी है.

शीर्ष नेतृत्व ने पिछले चुनाव से यह सबक  लिया कि अगर बीजेपी को इन इलाकों में लड़ना है और जीतने की संभावना को बरकरार रखना है तो मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं है.

इसके अलावा पार्टी मुस्लिमों से परहेज रखने वाली छवि को खारिज करने के क्रम में अधिक से अधिक प्रत्याशी देकर एक नई छवि बनाना चाहती है.

चरणबद्ध रणनीति के तहत क्षेत्रवार बंटे टिकट -

सबसे पहले नगर पंचायत चुनावों पर गौर करें तो बीजेपी ने राजधानी लखनऊ के मलीहाबादी नगर पंचायत चुनाव में बीजेपी ने पांच मुस्लिम प्रत्यशियों को मैदान में उतारा है. इसमें जोशीन टोला से अतिया, मोहम्मदन टोला से अली मोहम्मद, चौधराना से इमरान अंसारी, केवलहार वार्ड से नाजिया और समदा वार्ड से अज्रा बानो को टिकट दिया गया है.

उन्नाव की कुरमठ नगर पंचायत में अब्दुल गफूर खान, मेरठ की शाहजहांपुर नगर पंचायत से आयशा खान और बिजनौर की सरसपुर नगर पंचायत से निशा परवीन को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया है.

कासगंज की भरगैन नगर पंचायत से नजमा बेगम बीजेपी के टिकट पर अध्यक्ष का चुनाव लड़ेंगी.  कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले अमेठी जिले की मुसाफिरखाना नगर पंचायत में बीजेपी ने घोसानिया से सिकंदर अहमद को, मिश्रौली वार्ड से तरजान खान और शहनाद को बाबागंज दक्षिण से मैदान में उतारा है.

bjp

बदायूं में बीजेपी ने नगर पंचायत सैदपुर से महजबीन बेगम को टिकट दिया है. बदायूं जिले में बीजेपी दो अन्य मुस्लिम प्रत्याशियों को बाहर से समर्थन दे रही है. सखानू नगर पंचायत से बीजेपी ने अपना कोई भी प्रत्याशी नहीं खड़ा किया है. यहां से निर्दल प्रत्याशी आसिम हुसैन ने अपना नामांकन जमा किया है और उनके नामांकन के दौरान शेखूपुर से बीजेपी विधायक धर्मेन्द्र शाक्य की मौजूदगी चर्चा का विषय थी. ठीक उसी तरह ककराला नगर पालिका से भी बीजेपी ने अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा है. ककराला में नजमुल को बीजेपी का समर्थन प्राप्त है.

पूर्वांचल के गाजीपुर जनपद में बीजेपी ने जमनिया से मुश्ताक, अंसारी मोहल्ला से अख्तर जमाल को और मुहम्मदाबाद से फिरोज को टिकट दिया है. सोनभद्र में बीजेपी ने हमीदनगर महल वार्ड से शराफत अली को टिकट दिया है.

नगर निगम में क्या मुस्लिम प्रत्याशियों की स्थिति

बात नगर निगम चुनावों की करें तो सूबे की राजधानी लखनऊ में  बीजेपी ने चार मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिए जिनमे दो महिलाएं भी शामिल हैं. पुराने लखनऊ में रहने वाली रिजवाना बानो के पति पिछले 25 वर्षों से बीजेपी से जुड़े हुए हैं, उन्हें टिकट देकर बीजेपी ने यह साबित करने की कोशिश की है. पार्टी में योग्य मुस्लिम चेहरों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा.

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वहीं दूसरी तरफ दो बार से निर्दल प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत रही नाजुक जहां को इस बार बीजेपी ने अपना सिंबल दिया है. नाजुक जहां अपने हर बयान में यह कहना नहीं भूलती,'बीजेपी मुस्लिम विरोधी पार्टी नहीं है' और ट्रिपल तलाक समेत अन्य कई कदम मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए गए हैं.  हालांकि अभी कुछ महीने पहले तक नाजुक जहां का बीजेपी के प्रति ऐसा कोई प्रेम जग जाहिर नहीं था.

लखनऊ नगर निगम के पुरुष प्रत्यशियों में बीजेपी ने हुसैनाबाद वार्ड से समाजवादी पार्टी छोड़ कर बीजेपी में आए बुक्कल नवाब के बेटे मोहम्मद फैसल नवाब को टिकट दिया है और मौलाना कल्बे आबिद वार्ड से मोहम्मद जावेद अब्बास को टिकट दिया है.

Bada Imambada Lucknow

लखनऊ (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मेरठ नगर निगम में भी बीजेपी ने शौकत अली और तानसीन अंसारी को नगर निगम में पार्षद उम्मीदवार के रूप में चुना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी बीजेपी ने तीन मुस्लिम प्रत्याशी उतारे हैं जिसमें दो महिलाएं हैं. रुबीना बेगम और हुमा बानो को वाराणसी के अलग-अलग मुस्लिम बाहुल्य वार्डों से बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया है.

इसके अलावा इस बात के प्रचार-प्रसार में खासा जोर दिया जा रहा है कि चूंकि पुराने लखनऊ में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के समय से ही शिया मुसलमानों का समर्थन बीजेपी के साथ रहा है. इसी वजह से इन चुनावों में प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा शिया मुसलमानों पर दांव लगाकर बीजेपी उन रिश्तों को प्रमाणित करना चाहती है.

बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैदर अब्बास चांद कहते हैं, 'केंद्र एवं प्रदेश सरकार की विकासपरक नीतियों और योजनाओं के चलते मुसलमान बीजेपी से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं. और हमारे पास कई जिलों से मुस्लिम उम्मीदवारों के आवेदन अच्छी संख्या में आए हैं. शीर्ष नेतृत्व उनकी सामाजिक छवि के आधार पर उन्हें मौका दे रहा है.'

हालांकि वे इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि यह प्रेम सिर्फ शिया मुसलमानों के प्रति ही क्यों है और अन्य मुसलमानों के प्रति क्यों नहीं लेकिन एक बात साफ जाहिर है कि बीजेपी लंबे समय की योजना पर काम कर रही है.

क्या साधेंगे मुस्लिम वोट के बहाने ?

दरअसल मुस्लिम वोटों को साधने के पीछे की मंशा 2014 में ही साफ जाहिर है और जिलेवार शिया समुदाय के पुरुषों एवं महिलाओं को बीजेपी से जोड़ने के लिए तरह-तरह की कवायद लगातार की जा रही है. संघ के साथ संगठन भी इसी योजना को अमली जामा पहनाने में लगा लगा हुआ है और इंद्रेश कुमार के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को जोड़ने के ढेरों तरीके अपनाए जा रहे हैं.

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2017 में हुए विधानसभा चुनावों के पहले मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नामक एक संस्था ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं से संपर्क का बड़ा कार्यक्रम चलाया था जो सहारनपुर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों समेत हरिद्वार में भी चलाया गया था.

संस्था का सीधा संबंध भारतीय जनता पार्टी के पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से है. संस्था की वेबसाइट के मुताबिक, संस्था की शुरुआत 24 दिसंबर 2002 को हुई जब राष्ट्रवादी मुसलमान और आरएसएस के कुछ कार्यकर्ता साथ आए, संस्था के संरक्षक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार हैं.

इंद्रेश कुमार

इंद्रेश कुमार

लेकिन संस्था के राष्ट्रीय सह संयोजक महिराजध्वज सिंह संस्था और संघ के सबंधों को खारिज करते हैं. इसी संस्था ने 5 और 6 मई को रुड़की के पास कलियार शरीफ में राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया था जिसमें तीन तलाक पर जनजागरण अभियान चलाना अहम प्रस्तावों का हिस्सा था.

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच वाराणसी में भी खासा सक्रिय है और चरणबद्ध तरीके से अलग-अलग कार्यक्रमों के आयोजन इस संस्था द्वारा किए जाते हैं. संस्था के साथ मुस्लिम महिला फाउंडेशन नामक एक स्थानीय संस्था भी जुड़ी हुई है जिसकी सद्र नाजनीन अंसारी अब कई कारणों से चर्चा में हैं.

यह दोनों संस्थाएं किसी न किसी कारण से अखबारों की सुर्खियों में बनी रहती हैं और छोटे बड़े आयोजनों के माध्यम से हर संभव विषय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल भी रहती हैं.

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कहना गलत न होगा कि अचानक से प्राप्त हो रही इन सफलताओं के पीछे कोई दैवीय शक्ति नहीं बल्कि एक संगठनात्मक सहयोग है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे किसी मजबूत संगठन के सिवा और कोई दे नहीं सकता.

उत्तर प्रदेश की अल्पसंख्यक राजनीति पर शोध कर रहे जैनुल बशर बताते हैं कि 'बीजेपी का यह लगाव नया नहीं है बल्कि एक सोची समझी रणनीति है, कट्टरवादी छवि से बाहर आने के क्रम में बीजेपी कई तरह के कदम उठा रही है, ऐसे में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं का एक हिस्सा भी अगर आसानी से बीजेपी की तरफ आ गया तो उस बहाने मुस्लिम वोटों के एक बड़े हिस्से पर अधिकार जमाना आसान हो जाएगा.'

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