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यूपी उपचुनाव: गोरखपुर-फूलपुर की हार ने साफ कर दिया कि वोट बस मोदी मैजिक से ही आता है

अगर बीजेपी इस बात पर आंखें बंद किए रहती है कि किस तरह इन तीन उप चुनावों के नतीजों के बाद उनके कार्यकर्ताओं ने खुशी जताई, तो यही कहना सही होगा कि बीजेपी के बड़े नेता अपने ही बनाए हवाई किले में कैद हैं

Updated On: Mar 16, 2018 10:20 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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यूपी उपचुनाव: गोरखपुर-फूलपुर की हार ने साफ कर दिया कि वोट बस मोदी मैजिक से ही आता है

उत्तर प्रदेश और बिहार में हुए उप-चुनावों में एक संदेश तो स्पष्ट है. वो ये कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए वोट जुटाने वाले सबसे बड़े नेता नहीं, बल्कि वो पार्टी के इकलौते वोट जुटाऊ नेता हैं. अगर आप किसी भी चुनाव से मोदी को अलग रखते हैं, तो बीजेपी की हार हो जाती है. बीजेपी ने पार्टी संगठन का बड़े पैमाने पर विस्तार किया है. फिर भी राजनैतिक परिदृश्य से मोदी की गैरमौजूदगी से पार्टी का काडर दिशाहीन हो जाता है. ये पार्टी हितों के खिलाफ जाता है. उप-चुनाव के नतीजों से साफ है कि बीजेपी के पास यूपी और बिहार में ऐसे कद्दावर क्षेत्रीय नेता नहीं हैं, जो जनता को अपने पाले में ला सकें. चुनाव जिता सकें.

तो क्या बड़े जननेता नहीं हैं योगी?

केसरिया गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर के किले का बीजेपी के हाथ से निकलने से ये उम्मीद टूटी है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का खुद को बड़ा जननेता समझने का मुगालता पालना सही नहीं था. गोरखपुर के वोटरों ने नया सियासी विकल्प चुनकर न सिर्फ योगी की उम्मीदों को झटका दिया है, बल्कि उनकी अपीलों को भी दरकिनार कर दिया. मतदान का बेहद कम प्रतिशत इस बात की मिसाल है.

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इसी तरह फूलपुर में भी बीजेपी की हार हुई. ये सीट पहले उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जीती थी. मौर्य को कद्दावर ओबीसी नेता माना जाता है. लेकिन, फूलपुर में हार से भी ये बात तय हो गई है कि मोदी के बगैर बीजेपी, क्षेत्रीय सियासी खिलाड़ियों के दांव-पेंच के आगे कमजोर हालत में है. मिसाल के तौर पर बीजेपी ने पर्दे के पीछे से अतीक अहमद को चुनाव मैदान में उतार कर मुस्लिम वोट बांटने चाहे थे. लेकिन पार्टी की ये रणनीति बुरी तरह नाकाम रही. मुस्लिम वोटरों ने बीजेपी के झांसे में आने से इनकार कर दिया.

इसी तरह बिहार की अररिया सीट पर शुरुआत से ही चुनावी मुकाबला बेमेल था. आरजेडी के उम्मीदवार सरफराज आलम के प्रति सहानुभूति की लहर थी. सरफराज, पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के बेटे हैं, जिनके निधन की वजह ये उप-चुनाव हुआ था. लालू यादव के जेल में रहने का फायदा भी सरफराज आलम को मिला. इस सीट पर मुस्लिम-यादव वोटरों का एकजुट होकर आरजेडी के लिए वोट करना कारगर रहा और सरफराज आलम आसानी से जीत गए. 

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नजरअंदाज नहीं कर सकती पार्टी आलाकमान

वैसे, इन उप-चुनाव के नतीजों को आगे चलकर बीजेपी की हार का संकेत मानना बचकाना ही होगा. उप-चुनावों से राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा नहीं तय होता. लेकिन इन नतीजों को 2019 के राष्ट्रीय चुनावों के लिहाज से अप्रासंगिक कहकर खारिज करना भी बेवकूफी होगी. अगर बीजेपी इस बात पर आंखें बंद किए रहती है कि किस तरह इन तीन उप चुनावों के नतीजों के बाद उनके कार्यकर्ताओं ने खुशी जताई, तो यही कहना सही होगा कि बीजेपी के बड़े नेता अपने ही बनाए हवाई किले में कैद हैं.

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मसलन, गोरखपुर में बीजेपी के कार्यकर्ताओं के एक बड़े तबके ने पार्टी की हार पर दिल ही दिल में खुशी मनाई. उन्हें लगा कि खुद को बहुत बड़ा नेता समझने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कुछ बीजेपी नेताओं को कुछ तो सबक मिलेगा. यही वजह है कि ब्राह्मण वोटर ने बीजेपी से दूरी बना ली थी. गोरखपुर की राजनीति में लोगों को लगता है कि महंत आदित्यनाथ राजपूतों को तरजीह दे रहे हैं. जब से वो मुख्यमंत्री बने हैं, तब से योगी आदित्यनाथ इस सोच को गलत साबित करने में नाकाम रहे हैं. ये चिंता की बात है.

फूलपुर में भी नाकाम रहे हैं केशव प्रसाद मौर्य

ऐसे ही, 2014 में फूलपुर से चुनाव जीतने के बाद केशव प्रसाद मौर्य का जैसा बर्ताव रहा है, उसे जनता नाखुश है. बाद में जब केशव मौर्य को डिप्टी सीएम बनाया गया, तो लोगों में ये संदेश गया कि बीजेपी मौर्य का कद बढ़ाकर गैर-यादव ओबीसी वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. यूपी विधानसभा चुनाव के बाद मौर्य को इस उम्मीद में डिप्टी सीएम बनाया गया था कि वो पार्टी के ओबीसी वोटरों को एकजुट करके अपने पाले में रखेंगे. लेकिन केशव मौर्य अपने खुद के इलाके में समर्थन नहीं बनाए रख सके. ये इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वो जमीनी सच्चाई से कितने दूर थे. वोटों की गिनती वाले दिन तक मौर्य ये दावा कर रहे थे कि उनकी पार्टी ये सीट आसानी से जीत लेगी.

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इन नतीजों से साफ है कि जब भी स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाता है, तो बीजेपी की मोर्चेबंदी कमजोर नजर आती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर 2019 तक समाजवादी पार्टी और बीएसपी का साथ बना रहा, तो ये दोनों मिलकर बीजेपी के लिए बड़े सामाजिक गठबंधन वाली चुनौती पेश करेंगे. बीजेपी तो अपनी राजनैतिक जमीन बचाने के लिए मोदी के जादू वाला ही दांव चलेगी, क्योंसि इसी लोकप्रियता ने 2014 के चुनाव में कमाल दिखाया था. राष्ट्रीय स्तर पर अभी इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि मोदी का जादू कम हुआ है.

मोदी के खिलाफ जिस तरह से परस्पर विरोधी विचारों वाले लोग जमा हो रहे हैं, उससे मोदी को खुद को नए सिरे से जनता के सामने पेश करने में कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए. वो जनता को आराम से समझा सकेंगे कि वो तो सियासत के वो अभिमन्यु हैं, जिन्हें हराने के लिए सारी बुरी ताकतें एकजुट हो गई हैं. आज प्रधानमंत्री मोदी पर लोगों को जितना भरोसा है, वैसे में उनकी स्थिति योगी या मौर्य जैसी तो कमजोर नहीं होने वाली है.

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