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राजनीतिक वजूद बनाए रखने की जंग लड़ रहे हैं उपेन्द्र कुशवाहा

वो कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं जिससे पिछली राजनीतिक भूल दोहराई न जा सके और पॉलिटिकल एडवेंचरिजम से बचा जा सके.

Updated On: Aug 28, 2018 05:30 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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राजनीतिक वजूद बनाए रखने की जंग लड़ रहे हैं उपेन्द्र कुशवाहा

राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा ने भले ही अपना बयान बदल लिया हो लेकिन हाल-फिलहाल में उन्होंने जो बयान दिए हैं वो साफ इशारा करते हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी के लिए सारे विकल्प खोल रखे हैं. सोमवार को उन्होंने ये कहकर हलचल पैदा कर दी कि यादव समाज का दूध और कुशवाहा समाज के चावल को मिलाकर स्वादिष्ट खीर तैयार की जा सकती है.

हां, उन्होंने अन्य छोटी जातियों का भी साथ पंचमेवा की संज्ञा देकर मांगा ताकि सत्ता के अंक गणित को पूरा करने में कोई कसर न रह जाए. लेकिन एक ही दिन के भीतर उन्होंने अपने बयान का खंडन कर दिया. ज़ाहिर है अपने ही बयान का खंडन कर वो एनडीए और आरजेडी गठबंधन दोनों के साथ आंख मिचौली खेलकर एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह पार्टी के लिए विकल्प खुले रखना चाहते हैं ताकि आने वाले लोकसभा चुनाव में वो अपनी पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटों के लिए मोलभाव कर सकें.

2017 में एनडीए गठबंधन में जैसे ही नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को जगह मिली, उसके बाद से ही राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेन्द्र कुशवाहा असहज से दिखाई पड़ने लगे थे. दरअसल रालोसपा कुशवाहा समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती रही है. जबकि नीतीश कुमार की वापसी के बाद उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए के भीतर अपनी जमीन तलाशने में जुट चुके हैं. ज़ाहिर है दोनों समता पार्टी और जेडीयू में साथ रह चुके हैं और नीतीश कुमार को उपेन्द्र कुशवाहा का मार्गदर्शक भी कहा जाता था लेकिन साल 2005 में उपेन्द्र कुशवाहा को नीतीश सरकार में जगह नहीं मिल पाने के काऱण उपेन्द्र कुशवाहा नीतीश के खिलाफ पार्टी के भीतर ही राजनीति चमकाने में जुट गए.

Upendra Kushwaha

दरअसल 2015 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी एनडीए के घटक दल के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ी थी लेकिन एनडीए गठबंधन को मिली करारी हार में उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा का प्रदर्शन भी खराब रहा. पार्टी ने कुल 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें रालोसपा को महज 2 सीटों पर जीत मिल पाई थी. वहीं बीजेपी एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी और वो 159 सीटों पर चुनाव लड़कर 53 सीटों पर जीत पाई थी. रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी ने 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा 21 सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर अपने प्रत्याशी को चुनाव में उतारी थी.

2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 3 सीटें मिली थीं और उपेन्द्र कुशवाहा को मोदी सरकार में राज्य मंत्री के पद से नवाजा भी गया लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए के घटक के तौर पर 2015 के विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाए.

बिहार में कोइरी समाज के मतदाताओं की संख्या 8 फीसदी है और 2015 के चुनाव में इस जाति के 19 विधायक जीते भी लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा से महज 2 विधायकों का जीतना ये साफ कर गया कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा कोइरी समाज में गहरी पैठ बना पाने में सफल नहीं हो पाए. ज़ाहिर है इसके बाद रालोसपा की उपयोगिता और उनको 23 सीट दिए जाने को लेकर एनडीए के भीतर सवाल भी उठने लगे.

वैसे रालोसपा के सांसद अरुण कुमार अब उपेन्द्र कुशवाहा से अलग होकर एक नई पार्टी बना चुके हैं. इसलिए संसद में रालोसपा की संख्या में कमी हुई है. वहीं बिहार विधान परिषद में रालोसपा के एमएलसी की संख्या भी एक है. ज़ाहिर है राजनीतिक हैसियत के हिसाब से रालोसपा बिहार के अंदर बड़ी पार्टी के रूप में उभर नहीं पाई है लेकिन हाल में कोइरी समाज के एक और नेता नागमणि का उनकी पार्टी में शामिल होना रालोसपा के लिए बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है. नागमणि जगदेव प्रसाद के पुत्र हैं और कोइरी समाज में जगदेव प्रसाद की गहरी पैठ रही है. ऐसे में कयास लगाया जा रहा है नागमणि और उपेन्द्र कुशवाहा का एक साथ होना कोइरी समाज को आने वाले चुनाव में बेहतर संगठित कर पाएगा. इसीलिए जब भी रालोसपा के नेता उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए विरोधी बयान देते हैं, आरजेडी के युवा नेता तेजस्वी यादव उनकी पीठ थपथपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं.

upendra kushwaha lalu yadav delhi

वैसे उपेन्द्र कुशवाहा और लालू प्रसाद का पुराना नाता रहा है. उपेन्द्र कुशवाहा हाल में लालू प्रसाद से मिलने एम्स भी गए थे. साल 2005 से पहले उपेन्द्र कुशवाहा बिहार विधान सभा के विपक्ष के नेता थे. तब राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थी. 2005 में चुनाव हारने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा पार्टी के भीतर दरकिनार होते गए. उन्हें उम्मीद के मुताबिक एमएलसी बनाकर नीतीश सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया. वैसे नीतीश कुमार ने उन्हें राज्य सभा भेजा. लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा पार्टी के भीतर नीतीश कुमार के खिलाफ मुखर होने लगे. इतना ही नहीं साल 2013 में उपेन्द्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के धुर विरोधी एक और नेता अरुण कुमार के साथ राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का गठन किया लेकिन दोनों नीतीश विरोधी लंबे समय तक साथ नहीं रह पाए.

साल 2017 में नीतीश की एनडीए में वापसी के बाद उपेन्द्र कुशवाहा अपनी पार्टी के एक एमएलए को नीतीश सरकार में मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन नीतीश कुमार ने रालोसपा के विधायक की जगह रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को तवज्जो दी. रामविलास के भाई को नीतीश सरकार में मंत्री बनाया गया लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी के एमएलए को जगह नहीं मिली.

ज़ाहिर है एनडीए खेमे में आने से पहले और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी बनाने से पहले उपेन्द्र कुशवाहा एनसीपी के खेमे में भी अपना भाग्य आजमा चुके हैं. इसलिए इस बार एनडीए के साथ उनकी आंख मिचौली पिछले साल भर से चल रही है लेकिन एनडीए गठबंधन में वो अब भी बरकरार हैं. ज़ाहिर इस बार वो कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं जिससे पिछली राजनीतिक भूल दोहराई न जा सके और पॉलिटिकल एडवेंचरिजम से बचा जा सके.

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