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यूपी: कोटे में कोटा पर राजनीति से बीजेपी को फायदा होगा या नुकसान?

योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण में बंटवारा कर कोटे में कोटा की रणनीति के तहत विपक्षी दलों, खास तौर पर एसपी और बीएसपी के मुकाबले सियासी लाभ लेने का दांव इस साल की शुरुआत पर चला था

Updated On: Dec 23, 2018 09:18 AM IST

Ranjib

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यूपी: कोटे में कोटा पर राजनीति से बीजेपी को फायदा होगा या नुकसान?

उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के 27 फीसदी आरक्षण का वर्गीकरण करने की योगी सरकार की पहल पर सत्ता के साझेदारों यानी सहयोगी दलों के बीच ही टकराव के आसार बनते लग रहे हैं. यूपी में बीजेपी की सहयोगी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार के खिलाफ 24 दिसंबर को धरना-प्रदर्शन की घोषणा कर दी है. उनकी मांग है कि सरकार पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारे की सिफारिश वाली रिपोर्ट लागू करे. वहीं बीजेपी लोकसभा चुनाव से पहले हड़बड़ी में इसे लागू करने के बजाय इसके सियासी नफा-नुकसान को तौल लेना चाहती है. सरकार की एक और सहयोगी पार्टी  अपना दल (एस) भी रिपोर्ट की सिफारिशों से सहमत नहीं बताई जाती है.

सामाजिक कार्यकर्ता अशोक राजभर शामिल थे

योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण में बंटवारा कर कोटे में कोटा की रणनीति के तहत विपक्षी दलों, खास तौर पर एसपी और बीएसपी के मुकाबले सियासी लाभ लेने का दांव इस साल की शुरुआत पर चला था. इसके लिए जो कमेटी बनाई गई थी उसकी रिपोर्ट आ गई है लेकिन जानकारों का कहना है कि बीजेपी कोटे में कोटा की इन सिफारिशों को मानकर पिछड़ी जातियों के एक बड़े तबके की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती. यही वजह है कि कोटे में कोटा का पैमाना तय करने वाली कमेटी की रिपोर्ट मिल जाने के बावजूद इसपर फिलहाल कोई हलचल नहीं है.

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यूपी में आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन और नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी का अध्ययन कर कोटे में कोटा तय करने के लिए योगी सरकार ने हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस राघवेंद्र कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी बनाई थी. इसमें बीएचयू के प्रोफेसर भूपेंद्र विक्रम सिंह, रिटायर्ड आईएएस जेपी विश्वकर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक राजभर शामिल थे.

कार्यकाल दो बार बढ़ाए जाने के बाद कमेटी ने हाल में अपनी रिपोर्ट यूपी सरकार को सौंप दी है. इसमे 27% पिछड़ा आरक्षण को तीन हिस्सों- पिछड़ा, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा में बांटने की सिफारिश की गई है. पहली श्रेणी को 7%, दूसरी श्रेणी को 11% और तीसरी श्रेणी को 9% आरक्षण वर्ग में रखा जाना प्रस्तावित है. सबसे अधिक 79 जातियां सर्वाधिक पिछड़ा में रखने की सिफारिश की गई है जबकि पिछड़ा में यादव-कुर्मी समेत सबसे कम बारह जातियां.

सूत्रों के मुताबिक इसे लागू करने पर नफा से अधिक नुकसान भांपते हुए सरकार लोकसभा चुनाव तक इसे ठंडे बस्ते में डालना चाहती है. सूत्रों का कहना है कि सरकार यह मानती है कि यूपी में कोटे में कोटा लागू करने के सारे आधार मौजूद हैं लेकिन राजनीतिक कसौटी पर इसके नफा-नुकसान को तौलना जरूरी हो गया है.

बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि चूंकि लोकसभा चुनाव नजदीक है, ऐसे में कमेटी की सिफारिश के मुताबिक सर्वाधिक पिछड़ा में शामिल होने वाली 79 जातियों को इसका फायदा समझा पाने के लिए वक्त कम बचा है. इसके अलावा कोटे में कोटा करने पर तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों- यादव, कुर्मी और जाट को नुकसान होगा. लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी इससे बचना चाहती है. उसकी बड़ी वजह यह कि 2014 के लोकसभा और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलने के बाद अब हालात बदले हैं.

योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ

यूपी सरकार रिपोर्ट को पिछड़ा वर्ग आयोग के पास भेजकर मामले को लोकसभा चुनाव तक टाल सकती है

बीजेपी को पिछड़ा बहुल गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा था. बाद में कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में जाटों ने भी बीजेपी का साथ नहीं दिया. लोकसभा चुनाव में एसपी-बीएसपी-आरएलडी का गठबंधन भी तय माना जा रहा जिसका मूल सामाजिक आधार पिछड़ा-दलित-जाट ही होगा. ऐसे में पिछड़ों के आरक्षण के मौजूदा 27 फीसदी के स्वरूप में कोई छेड़छाड़ बीजेपी के लिए घाटे का सौदा हो सकता है.

लिहाजा कोटे में कोटा के जरिए सियासी लाभ का बीजेपी का गणित अब उसके लिए नुकसान की आशंकाएं पैदा कर रहा है. सरकार में शामिल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की ओर से इस बंटवारे के पक्ष में बयानबाजी कर रहे हैं जबकि कुर्मी बिरादरी की सियासत करने वाला अनुप्रिया पटेल का अपना दल इससे सहमत नहीं होगा कि आरक्षण में कुर्मियों की ताकत घटे. अनुप्रिया पटेल कह चुकी हैं कि कमेटी ने जो फार्मूला बनाने की सिफारिश की है वह मान्य नहीं क्योंकि अभी तो जातीय जनगणना के आंकड़े भी नहीं आए हैं. ऐसे में कैसे तय होगा कि किसको कितना आरक्षण मिले.

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माना जा रहा है कि यूपी सरकार रिपोर्ट को पिछड़ा वर्ग आयोग के पास भेजकर मामले को लोकसभा चुनाव तक टाल सकती है. उसके पहले विधि समेत अन्य विभागों की टिप्पणी लेने के जरिए भी मामले को टाला जा सकता है. इतना ही नहीं जस्टिस राघवेंद्र कमेटी की रिपोर्ट को परखने और उसे अमल पर लाने के पहले योगी सरकार केंद्र सरकार की आरक्षण के अध्ययन के लिए बनी कमेटी की रिपोर्ट भी देखना चाहती है. केंद्र सरकार ने ओबीसी कमिशन को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के साथ ही केंद्रीय सेवाओं में कोटे में कोटा लागू करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी जिसका कार्यकाल 31 मई 2019 तक बढ़ाया जा चुका है.

यूपी के सरकारी सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय कमेटी ने कोटे में कोटा लागू करने के लिए इनको लागू करने वाले राज्यों से सुझाव मांगने के साथ ही अन्य राज्यों की भी राय मांगी है. ऐसे में यूपी में कोटे में कोटा को फिलहाल लटकाए रखने का यह तार्किक आधार भी होगा. सूत्रों की मानें तो केंद्र के पीछे हटने के बाद योगी सरकार भी इतना बड़ा फैसला लेकर अपने हाथ नहीं जलाना चाहती.

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