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क्या योगी आदित्यनाथ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का चेहरा बन पाएंगे?

यूपी के कुछ इलाकों में मुस्लिम-विरोधी पोस्टर संकेत देते हैं कि योगी का रास्ता आसान नहीं होगा.

Suresh Bafna Updated On: Mar 19, 2017 09:03 AM IST

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क्या योगी आदित्यनाथ ‘सबका साथ, सबका विकास’ का चेहरा बन पाएंगे?

उत्तर प्रदेश में तीन-चौथाई बहुमत पाने के बाद बीजेपी ने गोरखपुर के तेज-तर्रार व कट्‍टर हिंदू चेहरे सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करके फिर से इस बात को साबित किया है कि बीजेपी की जीत में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की निर्णायक भूमिका रही है.

अब बीजेपी की कोशिश है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में इस ध्रुवीकरण को स्थायी रूप प्रदान किया जाए. बीजेपी अब यह काम गर्व के साथ करना चाहती है.

5 बार लोकसभा चुनाव जीते हैं योगी

योगी आदित्यनाथ 1998 में 26 साल की उम्र में पहली बार लोकसभा का चुनाव जीते. पांच लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड उनके खाते में है, इसलिए उनकी राजनीतिक योग्यता के बारे में कोई सवाल उठाना उचित नहीं है. वे गोरखनाथ मठ के महंत भी है, जिसकी समाज के कई वर्गों में गहरी पैठ है.

इस मठ की प्रतिष्ठा का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह आज भी आदित्यनाथ का चरण स्पर्श करते हैं.

गोरखनाथ मठ का राम जन्मभूमि आंदोलन के साथ रिश्ता बीजेपी से भी बहुत पुराना है. 1949 में जब बाबरी मस्जिद में राम और सीता की मूर्तियां रखी गई थी, उसमें गोरखनाथ मठ के तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

दिग्विजय नाथ के निधन के बाद महंत अवैद्यनाथ ने राम जन्मभूमि आंदोलन आगे बढ़ाया. महंत अवैद्यनाथ 1970 में गोरखपुर से स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव जीते. 1991 में वे भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर फिर लोकसभा चुनाव जीते.

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धर्म परिवर्तन और लव जिहाद जैसे मुद्दों से जुड़ा है नाम

गोरखनाथ मठ के महंत होने के नाते राम जन्मभूमि आंदोलन से योगी आदित्यनाथ का भी गहरा रिश्ता है. 2007 में आदित्यनाथ ने ईसाइयों को हिंदू धर्म में परिवर्तित करने का अभियान चलाया था. इस अभियान के दौरान हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ था, जिसमें दो लोग मारे गए थे. फिर योगी ने लवजिहाद के खिलाफ अभियान चलाया.

योगी आदित्यनाथ के भाजपा के साथ रिश्ते कभी सहज नहीं रहे हैं. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार के दौरान हुए उपचुनावों में बीजेपी की हार के लिए योगी को जिम्मेदार ठहराया गया था. लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्वाचंल में योगी की लोकप्रियता को भाजपा के लिए नजरअंदाज करना संभव नहीं था. गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ उनके रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं.

बीजेपी को योगी की जरूरत है

पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ के प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव जीतने के लिए बीजेपी को योगी आदित्यनाथ की बेहद जरूरत है. बीजेपी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर हिन्दू मतदाताअों का ध्रुवीकरण करने के लिए योगी का सहारा लिया, जिसकी वजह से बीजेपी को उन सीटों पर भी विजय मिलीं, जहां उसे कभी विजय नहीं मिली थी.

लोकसभा में योगी आदित्यनाथ का टकराव अक्सर एमआईएम के सांसद असदुद्दीन औवेसी के साथ होता रहता है. योगी ने खुद को औवेसी ब्रांड मुस्लिम राजनीति के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी अलग हिंदू पहचान बनाई है.

विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे पर योगी आदित्यनाथ की नाराजगी इस हद तक बढ़ गई थी कि उन्होंने अपने अलग संगठन हिंदू युवा वाहिनी के तहत बागी उम्मीदवार खड़े कर दिए थे, जो बाद में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के निर्देश पर चुनाव मैदान से हटाए गए थे.

योगी को नजरअंदाज करना मुश्किल है

योगी यह भी चाहते थे कि उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाए. यह मानना गलत नहीं होगा कि योगी आदित्यनाथ का बीजेपी नेताअों पर दबाव था कि उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार किया जाए. यह कहना गलत नहीं होगा कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस स्थिति में नहीं है कि वे योगी को नजरअंदाज कर सकें.

उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत के बावजूद दो उप-मुख्यमंत्री की नियुक्ति करके बीजेपी नेताअों ने अप्रत्यक्ष तौर पर यह स्वीकार किया है कि चुने गए विधायकों में योगी आदित्यनाथ पर पूर्ण भरोसा नहीं है. इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति आज भी एक बड़ी राजनीतिक सच्चाई है.

योगी आदित्यनाथ ने सांसद के तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कई आपत्तिजनक बयान दिए हैं, जिनकी लंबी फेहरिस्त है. अब मुख्‍यमंत्री पद पर बैठने के बाद उनके हर बयान पर मीडिया और देश की नजरें होंगी.

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क्या पीएम मोदी के नक्शे-कदम पर चल पाएंगे योगी?

चुनाव नतीजों के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि सरकार बहुमत से बनती है, लेकिन चलती सर्वमत से है. अतीत में योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए बयानों से यह भरोसा नहीं बनता है कि वे मोदी की इस सोच के साथ तालमेल बना पाने में सफल होंगे, लेकिन हो सकता है मुख्यमंत्री पद की कुर्सी उन्हें इस बात के लिए मजबूर करें कि वे अपने पुराने दुराग्रह छोड़कर न्याय की भावना से अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाए.

भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री मोदी का यह सूत्र वाक्य दोहराया कि वे ‘सबका साथ सबका विकास’ की भावना से सरकार चलाएंगे. भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में मुस्लिम-विरोधी पोस्टरों से संकेत मिलता है कि योगी का रास्ता आसान नहीं होगा.

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