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नेपाल को पहला राजा देने वाले मठ ने यूपी को दिया नया सीएम

योगी गोरखनाथ की उन सबदियों को याद करेंगे, जिसकी उन्होंने अब तक अनदेखी की है.

Manoj Kumar Singh Updated On: Mar 19, 2017 03:51 PM IST

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नेपाल को पहला राजा देने वाले मठ ने यूपी को दिया नया सीएम

हिंदू ध्यावे देहुरा, मुसलमान मसीत, जोगी ध्यावे परम पद, जहां देहुरा न मसीत

(योगी मंदिर-मस्जिद का ध्यान नहीं करता. वह परम पद का ध्यान करता है. सह परम पद क्या है, कहां है? यह परम पद तुम्हारे भीतर है)

ये सैकड़ों साल पहले लिखा गया सबद है जोकि जो यूपी के अगले सीएम योगी आदित्यनाथ की मंदिर की दीवार पर लिखा हुआ है. गोरखपुर को अपना नाम देने वाले बाबा गोरखनाथ सैकड़ों साल पहले हुए थे. गोरखनाथ मंदिर के 400 साल के इतिहास में ऐसे बहुत मौके आए, जिसे कोई अनदेखा नहीं कर सकता था. न मुगल बादशाह जहांगीर, न नेपाल के हिंदू राजा, न महात्मा गांधी की हत्या की जांच कर रहे पुलिस अफसर और न हीं अमित शाह.

मुगलों का गोरखपुर

मुगल सम्राट जहांगीर के समय के कवि उस्मान की लिखी ‘चित्रावली’ में गोरखपुर का वर्णन है-

आगे गोरखपुर भल देसू , निबहै सोई जो गोरख भेसू, जहं तहं मढ़ी गुफा बहु अहही जोगी, जती सनासी रहहीं, चारिहूं ओर जाप नित होई, चरचा आन करै नहिं कोई, कोउ दुहुं दिसि डोलै बिकरारा, कोउ बैठि रह आसन मारा, काहू पंच अगिनि तप सारा, कोउ लटकई रूखन डारा, कोउ बैठि धूम तन डाढे, कोउ विपरीत रहे होई ठाढे, फल उठि खाहिं पियहिं चलि पानी, जां चाहि एक विधाता दानी, परब सबद गुरू देई तहं, जेहि चेला सिर भाग, नित जेहिं ड्योढी लावई, रहे सो ड्योढी लाग,

(गोरखपुर एक भला देश है. वहां गोरखनाथ का वेश धारण करने वाले नाथपंथियों का निर्वाह होता है. वहां जगह-जगह मठ और गुफाएं हैं जहां योगी, जती व सन्यासी निवास करते हैं. चारों ओर जाप होता है और कोई चर्चा नहीं होती. कोई इधर-उधर डोलता है तो कोई आसन लगाकर ध्यान में मग्न है. कोई पंचाग्नि तापता है तो कोई पेड़ की डाली पर उल्टा लटका है. कोई सिर नीचे पैर ऊपर कर तपस्या कर रहा है तो कोई धूप में अपने तन को जला रहा है.

भूख लगने पर तपस्वी फल खा लेते हैं, प्यास लगने पर पानी पी लेते हैं लेकिन कोई किसी से याचना नहीं करता. सब ईश्वर से ही याचना करते हैं. गुरू, शिष्यों को ब्रह्म का ज्ञान कराता है. कोई भाग्यशाली शिष्य ही इस ज्ञान को ग्रहण कर पाता है. जो नित्य गुरू की ड्योढ़ी पर पड़ा रहता है वही ब्रह्मज्ञान पाता है.)

चित्रावली का रचना काल 1613 है. यानि चार सौ साल पहले गोरखपुर को कवि उस्मान ने नाथ योगियों के बड़े केन्द्र के रूप में देखा था. आज यहां 52 एकड़ में फैला गोरखनाथ मंदिर है जिसके महंत योगी आदित्यनाथ हैं. वह 19 वर्षों से गोरखपुर के सांसद हैं और अब उस्मान के ‘ भल देसू ’ का यह उग्र संत यूपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है.

गोरखनाथ मंदिर

नाथ योगियों पर ‘गोरखनाथ एंड कनफटा योगीज’ नाम की किताब लिखने वाले जार्ज ब्रिग्स ने लिखा है कि उन्होंने 1914 में गोरखपुर में जो मंदिर देखा वह वर्ष 1800 के आस-पास निर्मित हुआ था.

गोरखपुर के बुजुर्ग बताते हैं कि देश की आजादी तक एक मंदिर के तौर पर यहां अखंड धूना ही था जिसे गोरखनाथ द्वारा त्रेता युग से प्रज्जवलित बताया जाता है. व्यापारी अपने कारोबार की सफलता और युवा परीक्षा में पास होने व नौकरी लगने की मन्नत मांगने आते थे और धूनी का चक्कर काटते थे. वर्ष 1934 में महंत बने दिग्विजयनाथ ने मंदिर को 52 एकड़ में फैलाया.

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मंदिर में गुरू गोरखनाथ की सफेद संगमरमर की ध्यान अवस्था की दिव्य मूर्ति स्थापित है.

मंदिर में तालाब के पास लेटी हुई भीम की प्रतिमा है. कहानी है कि, भीम राजसूय यज्ञ के लिए गुरू गोरखनाथ को बुलाने आए थे. उस समय गोरखनाथ समाधि में लीन थे. भीम ने जहां विश्राम किया, उनके शरीर के भार से जमीन धंस गई जो आज एक बड़े तालाब के रूप में है.

यूं तो नाथ संप्रदाय के मठ और मंदिर देश के कई राज्यों उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उड़ीसा, गुजरात, बंगाल, उड़ीसा में ही नहीं पाकिस्तान, नेपाल, अफगानिस्तान आदि स्थानों पर हैं लेकिन गोरखपुर का मठ ही सबसे बड़ा और लोगों की आस्था का केन्द्र है.

नाथ संप्रदाय  की परंपरा के अनुसार त्रेता युग में गोरखनाथ ज्वाला देवी स्थान से खिचड़ी की भिक्षा मांगते गोरखपुर आए और यहां एक बड़े तालाब मानसरोवर के पास अपनी धूनी जमाई. वे यहां काफी समय तक रहे और उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम गोरखपुर प्रसिद्ध हुआ. मकर संक्रांति पर बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परम्परा भी इसीलिए पड़ी.

दिग्विजयनाथ ने मंदिर को बनाया हिंदु राजनीति का केंद्र

दिग्विजयनाथ ने गोरखनाथ मंदिर को हिंदुत्व की राजनीति का केंद्र बनाया. गोरखनाथ मंदिर का महंत गुरू गोरखनाथ का प्रतिनिधि माना जाता है. 1934 में दिग्विजयनाथ महंत बने. दिग्विजयनाथ के बाद से ही यह मठ कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का भी केन्द्र बना. दिग्विजयनाथ हिंदु महासभा के अध्यक्ष रहे.

महात्मा गांधी की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था. आरोप लगा था कि उन्होंने ही नाथूराम गोडसे को हथियार दिए थे. महंत दिग्विजयनाथ 1967 में गोरखपुर के सांसद भी बने. उनके बाद मंदिर के महंत अवैद्यनाथ बने. अवैद्यनाथ मानीराम से कई बार विधायक गोरखपुर के पांच बार सांसद रहे.

महंत अवैद्यनाथ ने गढ़वाल के विज्ञान स्नातक अजय सिंह बिष्ट को 15 फरवरी 1994 को अपना उत्तराधिकारी बनाया और इस तरह से देश की राजनीति में एक युवा हिंदू नेता योगी आदित्यनाथ का उदय हुआ. चार वर्ष बाद 1998 में योगी आदित्यनाथ नाथ गोरखपुर से चुनाव लड़े और 26 वर्ष की आयु में सांसद बन गए. तबसे वह चार बार और चुनाव जीत चुके हैं.

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नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ

नाथ सम्प्रदाय की स्थापना आदिनाथ भगवान शिव द्वारा मानी जाती है. आदिनाथ शिव से मत्स्येन्द्रनाथ ने ज्ञान प्राप्त किया. मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ हुए. गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित बारह पंथी मार्ग नाथ संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इस संप्रदाय के साधक अपने नाम के आगे नाथ शब्द जोड़ते हैं.

कान छिदवाने के कारण इन्हे कनफटा, दर्शन कुंडल धारण करने के कारण दरशनी और गोरखनाथ के अनुयायी होने के कारण गोरखनाथी भी कहा जाता है.

लोककथाओं के अनुसार मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ) ने एक निःसन्तान स्त्री को सन्तान प्राप्ति के लिए भभूति दी थी. स्त्री ने भभूति को गोबर के ढेर पर डाल दिया. 12 वर्ष बाद जब मत्स्येन्द्रनाथ आए तो उन्होंने स्त्री से उसकी संतान के बारे में पूछा तो उसने सच्चाई बता दी. इस पर मत्स्येन्द्रनाथ ने अलख निरंजन की आवाज लगाई तो गोबर की ढेरी से 12 वर्ष का बालक सामने आया. मत्स्येन्द्रनाथ ने गोबर से रक्षित होने के कारण बालक का नाम गोरखनाथ रखा जो नाथ सम्प्रदाय का सबसे प्रभावशाली संत हुआ.

लोककथा में यह भी है कि गोरखनाथ के गुरू मछन्दरनाथ कदली देश (पाताल लोक) की रानी के प्रति आकर्षित हो गए थे और वहीं रहने लगे थे. तब गोरखनाथ ने वहां जाकर 'जाग मछन्दर गोरख आया' कहकर उन्हें गुरू धर्म याद दिलाया और उन्हें मुक्त कराकर अपने साथ लाए.

नेपाल में अकाल और गोरखनाथ

नेपाल में गोरखनाथ को लेकर कई कहानियां प्रसिद्ध हैं. कहा जाता है नेपाल में नाथ योगियों को लोग भिक्षा नहीं देते थे और उनका विरोध करते थे. जब यह जानकारी गोरखनाथ को हुई तो उन्होंने बादलों को अपनी जांघ के नीचे दबा लिया. इससे नेपाल में अकाल पड़ गया.

राजा को बताया गया कि गोरखनाथ को उनके गुरू मत्स्येन्द्रनाथ ही योगासन से उठा सकते हैं. राजा मत्स्येन्द्रनाथ को गोरखनाथ के पास ले गए. गुरू को सामने देख गोरखनाथ उनका स्वागत करने खड़े हुए तो बादल छूट गए और नेपाल में वर्षा हुई. इस घटना की याद में आज भी नेपाल में मत्स्येन्द्रनाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है.

नेपाल में शाह राजवंश के संस्थापक पृथ्वी नारायण शाह को गोरखनाथ ने आशीर्वाद व शक्ति प्रदान किया था जिसके बूते वह नेपाल को एकीकरण करने में सफल हुए।

नेपाल की राजमुद्रा में गोरक्ष नाम और राजमुकुट में गोरखनाथ की चरण पादुका अंकित है. नेपाल के पूर्व राजा द्वारा मकर सक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर में चढ़ाने के लिए खिचड़ी भेजी जाती है.

राजस्थान के मेवाड़ के राजा वाप्पारावल को गोरखनाथ द्वारा वरदानी तलवार भेंट किए जाने की भी कहानी सुनाई जाती है, जिसकी याद में विजयादशमी को तलवार की पूजा होती है.

महंत, जिसने हिंदु-मुस्लिम एकता की नींव रखी

विद्वान एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में गोरखनाथ का समय आठवीं से ग्यारहवी शती के बीच मानते हैं. गोरखनाथ ने बौद्ध परम्परा के ब्राह्मणवाद, बौद्ध परंपरा में अतिभोगवाद व सहजयान में आई विकृतियों के खिलाफ विद्रोह किया.

उन्होंने हिन्दू-मुसलमान एकता की नींव रखी और उंच-नीच, भेदभाव, आडम्बरों का विरोध किया. यही कारण है कि नाथ संप्रदाय में बड़ी संख्या में सनातन धर्म से अलगाव के शिकार अस्पृश्य जातियां इसमें शामिल हुईं. नाथपंथियों में वर्णाश्रम व्यवस्था से विद्रोह करने वाले सबसे अधिक थे.

हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग बल्कि कहीं-कहीं तो मुसलमान बड़ी संख्या में नाथ संप्रदाय में शामिल हुए. गोरखनाथ का प्रभाव निर्गुण संतों कबीर, दादू और सूफी कवियों मुल्ला दाउद, जायसी पर खूब पड़ा.

सबदी गोरखनाथ की सबसे प्रमाणिक रचना है. इसमें योगियों के लिए उपदेश हैं. कुछ सबदियां गोरखनाथ मंदिर की दीवारों पर लिखे गए हैं.

हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धीरे धरिबा पांव, गरब न करिबा, सहजै रहिबा, भरत गोरख रांव

( ऐसे गुजर जाओ की किसी को पता नहीं चले. अनुपस्थित रहो. सबकी आंखों के केंद्र में न रहो. ऐसे गुजरो कि कोई देखे नहीं. गर्व न करो, सहज रहो, ध्यान से बोलो)

मन में रहिणां, भेद न कहिणां बोलिबा अमृत वाणी अगिला अगनी होइबा हे अवधू तौ आपण होइबा पाणीं

(किसी से भेद न करो, मीठा बानी बोलो. यदि सामने वाला आग बनकर जला रहा है तो हे योगी, तुम पानी बनकर उसे शांत करो)

योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक जीवन गोरखनाथ के उपदेशों के उलट है. वह सख्त बोलते हैं, आग उगलते हैं, मंदिर-मस्जिद की राजनीति करते है, अक्सर विवादों में रहते है और उनकी उपस्थिति समर्थकों में ऐसा आवेग भर देती है कि वह नारे लगाने लगते हैं-‘ यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना है.’

अब जब वह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बन गए हैं, उन्हें ‘सबका साथ सबका विकास’ को अमली जामा पहनाने के लिए सबको साथ लेना पड़ेगा. तब उन्हें गोरखनाथ की इन सबदियों को याद करना पड़ेगा जिसकी उन्होंने अब तक अनदेखी की है.

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