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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में मोदी मोड में सीएम योगी

विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद उत्तर प्रदेश का नगर निकाय चुनाव बीजेपी के लिए अब नाक का सवाल बना हुआ है

Utpal Pathak Updated On: Nov 23, 2017 09:57 PM IST

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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में मोदी मोड में सीएम योगी

विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद उत्तर प्रदेश का नगर निकाय चुनाव बीजेपी के लिए अब नाक का सवाल बना हुआ है. तमाम बयानों और चुनावी गुणा-गणित के बीच पूरे अभियान में प्रचार की कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ में होना इस बात का साक्ष्य है कि न सिर्फ शीर्ष नेतृत्व उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को भुनाना चाहता है, बल्कि उनके बहाने पार्टी सदस्यों में इस बात का संदेश देना चाहता है कि चुनाव किसी भी स्तर के हों लेकिन उनका महत्व पार्टी के लिए कम नहीं है.

हर नगर निगम में एक सभा

निकाय चुनावों के मद्देनजर बीजेपी शीर्ष नेतृत्व द्वारा हर नगर निगम में इस बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक-एक जनसभा का आयोजन का खाका तैयार किया गया. योगी आदित्यनाथ ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत प्रचार अभियान की शुरुआत पहली बार नगर निगम बने अयोध्या के साथ की.

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योगी आदित्यनाथ ने 14 नवंबर को अयोध्या से निकाय चुनाव के प्रचार अभियान का आगाज इसलिए भी किया क्योंकि अयोध्या बीजेपी की हालिया राजनीति का केंद्रबिंदु होने के साथ योगी के लिए निजी आस्था का विषय भी है, पार्टी में इस बात की चर्चाएं लगातार हो रही हैं कि कल्याण सिंह के बाद योगी आदित्यनाथ दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अयोध्या पर इतना ध्यान दिया है.

अयोध्या में दीवाली के आयोजन ने दिए कई संकेत

पिछले दिनों सरयू तट पर असंख्य दीप जलवाकर योगी की नेतृत्व में मनाई गई दीपावली इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 2019 के चुनाव मंदिर विवाद सुलझाने के नाम पर लड़े जाएंगे. ऐसे में 2018 तक मंदिर का काम शुरू हो जाना पहली प्राथमिकता है और मुख्यमंत्री के निजी रूचि लिए बगैर यह संभव नहीं हो पाता लिहाजा योगी आदित्यनाथ को लाना ही एक मात्रा विकल्प था.

AYODHYA

उच्च पदस्थ बीजेपी सूत्र बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने मुजफ्फरनगर से चुनावी बिगुल फूंकने की योजना बनाई थी और इसी क्रम में वे मुजफ्फरनगर में 9 नवंबर को पहली चुनावी रैली को संबोधित करने वाले थे. लेकिन, बाद में इस योजना को बदल दिया गया और अयोध्या से शुरुआत करने की बात सामने आई.

हालांकि इस बाबत बीजेपी का नजरिया कुछ और है, गुजरात चुनावों में पार्टी की ओर से प्रचार में लगे प्रदेश प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने दूरभाष पर बताया, 'अयोध्या से प्रचार कार्यक्रम की शुरुआत इसलिए की गई क्यूोंकि वहां पहले चरण में चुनाव होने थे और अयोध्या न सिर्फ आस्था का विषय है बल्कि हमारी सरकार की पहली प्राथमिकता भी है, योगी जी के नेतृत्व से एवं प्रदेश के अन्य शीर्ष नेताओं मिली-जुली मेहनत से हम जीत दर्ज करेंगे और प्रधानमंत्री जी के सपनों को साकार करेंगे.

बीजेपी एक लोकतांत्रिक पार्टी है और यहां मेरे जैसे कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेताओं की भी जिम्मेदारी सुनिश्चित है, ऐसे में हमारे मुख्यमंत्री जी हों या अन्य कोई पदाधिकारी उन सबको सुनने और उनसे मिलने के लिए जनता आतुर है और यही बात विपक्ष को खाये जा रही है.'

नए मर्तबान में पुराना मुरब्बा

गौरतलब है कि अयोध्या को नगर निगम घोषित करने का आदेश उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिया था जिसे योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद लागू कर दिया. विपक्ष ने इस आदेश को लेकर बीजेपी की खिल्ली भी उड़ाई थी और अखिलेश यादव ने अपनी हालिया बयानों में भाजपा की इन नीतियों पर तंज भी खूब कसे लेकिन एक सधी हुई मीडिया नीति के तहत भाजपा ने कभी अखिलेश के नाम को मंदिर से जुड़ने नहीं दिया और हर बार योगी को आगे लाकर भरपाई करने की कोशिश की.

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सिर्फ अयोध्या ही नहीं बल्कि काशी और मथुरा के लिए भी अखिलेश ने जिन योजनाओं का शुभारंभ या लोकार्पण किया था उन सभी को धो-पोंछ कर नए नामों के साथ बीजेपी की कार्ययोजनाओं में शामिल कर लिया गया है.

तूफानी दौरे और चुनाव प्रचार का साम्य

चरणबद्ध चुनाव कार्यक्रम और मुख्यमंत्री के प्रचार कार्यक्रम पर नजर डालिए तो साफ जाहिर है तो साफ जाहिर होता है कि प्रदेश को क्षेत्रवार मथने का कार्यक्रम बड़े ही सोचे समझे प्लान के तहत बनाया गया है. मिसाल के तौर पर 22 नवंबर को जहां एक तरफ पहले चरण के 24 जिलों में मतदान हो रहा था वही दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोक सभा क्षेत्र वाराणसी में दो चुनावी रैलियों में दहाड़ रहे थे. पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार योगी आदित्यनाथ 14 दिन में 32 रैलियां करेंगे.

क्या खास है योगी के भाषणों में 

yogi adityanath

योगी आदित्यनाथ निकाय चुनावों से सबंधित रैलियों में अपनी सरकार की उपलब्धियों का ब्यौरा देने से आरंभ करते हैं. उसके बाद नई योजनाओं के वायदे करते हैं और फिर पूर्व में रही सपा सरकार पर निशाना साधते हैं. कभी परिवारवाद को खत्म करने और कभी गुंडों माफियाओं और दोषियों को न बक्शे जाने के भाषणों के बाद वे स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करना भी नहीं भूलते.

कुल मिलाकर उनके हर भाषण में क्रमवार नियोजन करके कुछ ऐसे बिंदुओं का समावेश रहता है जिससे हर तबके और हर मानसिकता के वोटरों पर कोई असर पड़े. वे प्राथमिकताओं में विकास के साथ धार्मिक योजनाओं का उल्लेख करना भी नहीं भूलते और उनके भाषणों में जय श्री राम का जयघोष भी रहता है. योगी आदित्यनाथ ने हर रैली में बिना भूले कुछ बिंदुओं का बार-बार उल्लेख किया जिनमें -

1- प्रदेश में गरीबों को मकान तथा बिजली कनेक्शन देने में किसी के साथ भी भेदभाव नही हुआ है. 11 लाख लोगों को मकान व 20 लाख को बिजली का कनेक्शन दिया गया है.

2- हमने 86 लाख किसानों का कर्ज माफ किया, हमने प्रदेश में किसानों का गन्ना मूल्य का पूरा भुगतान कराया है. हम अब तक 600 करोड़ रुपए का भुगतान करा चुके हैं.

3- यदि बीजेपी का 652 स्थानों पर पूर्ण बहुमत आता है तो प्रदेश में हर जगह बिजली व पानी के साथ ही नगर निकाय में विकास किया जाएगा.

4- हर जगह हर शहर में एक जैसी स्ट्रीट लाइट लगवाई जाएगी.

5- प्रदेश में गुंडागर्दी के कारण व्यापारी भाग रहा था लेकिन अब बदमाश सरेआम नही घूम सकता और उसे या तो जेल जाना होगा या फिर यमराज के पास. कानून के साथ खिलवाड़ नही होने दिया जाएगा. हम प्रदेश में सुरक्षा भी देंगे विकास भी देंगे.

6- समाजवादी पार्टी ने पुलिस लाइन में जन्माष्टमी का आयोजन बंद कर दिया था, लेकिन अब मनाई जा रही है.

7- कांवड़ यात्रा निकल रही है कोई शव यात्रा नहीं. डीजे भी बजेगा और कांवड़ियों पर हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा भी की जाएगी, इस बार सावन में चार करोड़ श्रद्धालु सड़क पर थे, लेकिन कोई अप्रिय घटना नही हुई.

इन बिंदुओं से यह साफ जाहिर है कि योगी ने बीजेपी के प्रस्तावित रामराज लाने के क्रम में इस अग्नि परीक्षा को न सिर्फ स्वीकार किया है बल्कि उसको अमली जामा पहनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.

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लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. योगेश मिश्र बताते हैं, 'इस प्रकार की रणनीति को इतने कौतुहल से नहीं देखा जाना चाहिए, पूर्व की दोनों (समाजवादी-बहुजन समाज पार्टी) सरकारों ने बगैर सिंबल के चुनाव लड़ा था लिहाजा उनके मुख्यमंत्रियों भागदौड़ खासी कम थी, और एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पिछले दो दशकों से नगर निकाय चुनावों में अधिकांश जगहों पर भाजपा का ही कब्जा बना रहा लिहाजा इस बार भाजपा अधिक या कम मेहनत करे तो भी लाभ उनका ही दिखता है.

Yogi Adityanath

रही बात योगी जी के दौरों की तो पूर्व के निकाय चुनावों में वे गोरखपुर के अलावा लखनऊ में प्रचार के सिलसिले में आते जाते रहते थे. ऐसे में इस बार अगर वो मुख्यमंत्री होकर कुछ रैलियां कर रहे हैं तो उसमे कोई बड़ी बात नहीं. रही बात लोकसभा के लिटमस टेस्ट की तो निःसंदेह योगी जी एक बड़ी भूमिका है लेकिन 2019 में नए मैदान पर नया डी बनेगा और चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच ही लड़े जाएंगे.'

बहरहाल, भाजपा अब भी नगर निकाय चुनावों में बगावत और अन्य परेशानियों के बावजूद जीत के प्रति आश्वस्त है लेकिन ऊंट किस करवट बैठेगा इस बात का फैसला मतगणना के दिन ही होगा. तब तक के लिए बीजेपी ने अपने चुनावी तरकश के कुछ और तीर बचा कर रखे हैं, देखना होगा कि नोटबंदी और जीएसटी का जिन्न इस बार शहरी मतदाताओं को कितना डरा पाता है.

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