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यूपी चुनाव: विद्रोही तेवर और नई राजनीति का आकर्षण

हिन्दुस्तानी वोटर नएपन को तरजीह देता है. नएपन का स्वाद विद्रोह की मिर्च से पैदा हो तो और भी ज्यादा.

Ambikanand Sahay Updated On: Jan 15, 2017 04:34 PM IST

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यूपी चुनाव: विद्रोही तेवर और नई राजनीति का आकर्षण

'खबर गढ़ी जाती है. उम्मीदों के सान पर चढ़ती है. कही और बतायी जाती है. जानने-बताने के खेल में उसका एक-एक रेशा उधेड़ा जाता है. आखिरकार उसके भीतर से सबकुछ निचोड़ लिया जाता है. फिर इस खबर को छोड़ किसी नये की तलाश की जाती है' यह बात टाइम्स मीडिया घराने के सबसे ताकतवर अमेरिकी संपादकों में एक थॉमस ग्रीफिथ ने कही थी.

दरअसल हर लम्हे नई शक्ल अख्तियार करती सियासी खबरों के साथ यही होता है, खासकर उस वक्त जब चुनावी बुखार चढ़ रहा हो. नया क्या है, घटना अब कौन सा नया मोड़ लेने वाली है? यह सवाल सबसे अहम बन जाता है. यह बात अमेरिकी चुनावों के पेशेनजर डोनाल्ड ट्रंप के मामले में नजर आई और कुछ ऐसा ही हुआ भारत में 2014 में नरेन्द्र मोदी के चुनावी अभियान के समय.

हिन्दुस्तानी वोटर नयेपन को तरजीह देता है. नयेपन का स्वाद विद्रोह की मिर्च से पैदा हो तो और भी ज्यादा. यह बात बिल्कुल जानी-समझी है. इस पर आगे और बहस की जरुरत नहीं. हाल का इतिहास इसकी भरपूर मिसाल देता है.

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भूल जाइए इस बात को कि चुनावी खेल के विशेषज्ञ अपने आंकड़ों की भूल-भुलैया के सहारे क्या इशारे कर रहे हैं. पूर्वानुमान लगाने का उनका विज्ञान या ठीक समझे तो उसे कला कह लें. लगातार चारो खाने चित्त होता नजर आ रहा है.

बस आपको इतना भर याद करने की जरुरत है कि पूर्वानुमान लगाने के धंधे का अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावों में क्या हश्र हुआ. युरोपीय संघ से निकलने के मसले पर ब्रिटेन में हुए जनमत-संग्रह या फिर दिल्ली और बिहार में हुए विधान-सभा चुनावों के वक्त नतीजों की भविष्यवाणियां कितनी खोखली साबित हुईं.

विद्रोही पड़ेगा भारी

यह कहना गलत ना होगा कि उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों पर नयेपन और विद्रोह का तीखा-नमकीन स्वाद भारी पड़ेगा. इसके आगे नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, राम मंदिर, समाजवादी कुनबे का महाभारत और गुंडाराज जैसे बड़े मसले फीके पड़ जायेंगे.

इसे ज्यादा बेहतर ढंग से समझने के लिए नीचे के चार उदाहरणों पर गौर किया जा सकता है. ये उदाहरण मिलते-जुलते सियासी हालात के हैं.  इनपर नजर डालने से आम मतदाता के रुझान का पता किया जा सकता है.

समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद ने मतदाताओं को असमंजस में डाला है

समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद ने मतदाताओं को असमंजस में डाला है

पहला उदाहरण इंदिरा गांधी का है. याद कीजिए 1960 में इंदिरा गांधी के साथ हुए वाकये को. तब की कांग्रेस के भीतर सिंडकेट के नाम से मशहूर शीर्ष के नेताओं ने उनको प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचाया. सिंडिकेट की सोच थी कि तख्य पर गुड़िया बैठेगी तो उनके मर्जी से हां-ना में सर हिलायेगी.

उनकी सोच धरी की धरी रह गई. इंदिरा गांधी ने विद्रोह किया. पार्टी दो फाड़ हुई. इंदिरा ने सारी ताकत अपने हाथ में कर ली. जल्दी-जल्दी में पार्टी के कार्यकर्ताओं और देश की जनता का दिल जीतने वाले कदम उठाये और लोकसभा का चुनाव अपने नाम कर लिया.

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उनके साहस भरे सियासी और कूटनीतिक चालों को देख उन्हें भारत की ‘आयरन लेडी’ के नाम से पुकारा गया जो एक मायने में ठीक ही था. अविभाजित कांग्रेस के भीतर उनके विरोध पर अड़े शीर्ष के नेताओं का क्या हश्र हुआ ? एक मोरारजी देसाई को छोड़ दें तो सब के सब  गुमनामी के गढ्डे में समा गये.

जब दक्षिण में हुई बगावत

दूसरा उदाहरण आंध्रप्रदेश का है. 1990 के दशक में चंद्रबाबू नायडू बगावती तेवर के साथ एन.टी रामाराव से अलग हुए और लोग उनके साथ हो लिए. विद्रोही बने चंद्रबाबू नायडू का तर्क था कि एन.टी रामाराव की पत्नी लक्ष्मी पार्वती सरकार के रोजमर्रा के कामकाज में दखल देती हैं.

इस नाजायज दखल से नायडू तंग आ चुके थे. तेलुगु देशम पार्टी टूट गई. नायडू की पार्टी का दबदबा कायम हुआ. नायडू ने इसके बाद से पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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तीसरा उदाहरण तमिलनाडु का लिया जा सकता है जहां जे जयललिता ने एम जी रामचंद्रन की पत्नी जानकी रामचंद्रन से बगावत की. तब एआईएडीएमके में दोनों के बीच अपना दबदबा कायम करने की जबर्दस्त और बेजोड़ लड़ाई मची थी. जीत बगावती जे जयललिता की हुई.

जयललिता ने चुनावों में जानकी रामचंद्रन के गुट को धूल चटा दी. इसके बाद उनका कद लगातार ऊंचा होकर इस मुकाम पर पहुंचा कि पार्टी के कार्यकर्ता बाद के बरसों में उन्हें अम्मा, पुराची थलाइवी( क्रांतिकारी नेता) और थंगा थरागी( स्वर्णदेवी) कहने लगे. विद्रोह सफल हो जाये तो बिल्कुल ऐसा ही होता है.

विरोध के बावजूद मोदी उभरे

चौथा उदाहरण नरेन्द्र मोदी की 2014 की चुनावी सफलता का लिया जाता है. पार्टी के शीर्ष के कुछ नेता और सहयोगी दल उनके खिलाफ थे. इनके तगड़े विरोध के बावजूद नरेन्द्र मोदी लोगों की नजरों में चढ़ते चले गये.

मोदी राष्ट्रीय रंगमंच पर आजादी के बाद से आज दिन तक के सबसे ताकतवर नेता बनकर उभरे. कहते हैं ना कि ‘मुश्किलें मुझपर पड़ी इतनी की आसां हो गईं’.

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यूपी के चुनावों के पेशेनजर बीजेपी की मुश्किल ये है कि वह मोदी की छवि को कुछ ज्यादा ही भुनाने में लगी है. बीजेपी की इस लाचारी को समझा जा सकता है. ना तो सूबे में बीजेपी का कोई कद्दावर नेता नजर आ रहा है और ना ही पांच साल के भीतर सूबे में पार्टी ने कुछ ऐसा कमाल किया है कि उसे भुनाया जा सके.

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सो यूपी में बीजेपी के पास मोदी के सिवाय दिखाने के लिए कुछ है ही नहीं.  पार्टी बस यही कर सकती है कि केंद्र सरकार की उपलब्धियों का ढोल पीटे. और, दरअसल वह यूपी में यही कर भी रही है.

ब्रांड अखिलेश बीजेपी पर हावी

इसके ठीक उलट अखिलेश यादव नयेपन और विद्रोह को लेकर वोटर की चाहत के हिसाब से बिल्कुल सही राह पर जान पड़ रहे हैं. ब्रांड अखिलेश उनके हाथ लगा तुरुप का पत्ता है और इसके भरोसे वे अपने सारे दांव चल रहे हैं. चाहे पिता के साथ पटरी बैठे या ना बैठे, जाति-समुदाय की दीवार को लांघते हुए अब उन्हें ‘यादव-मुस्लिम’  वोट-बैंक के हद से आगे निकलना ही है.

पार्टी का निशान साइकिल मिले चाहे जाये. उनकी मोटर-साइकिल सवारी के लिए बिल्कुल तैयार खड़ी है.

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यूपी चुनावों में हर पार्टी की साख दांव पर

अगर यह युवा-तुर्क चुनाव-विश्लेषक, भविष्यवक्ताओं और राजनीति के पंडितों के अनुमानों को एकबारगी झटका देते हुए बहुत बेहतर कर दिखाता है तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं.

लेकिन इन सारी बातों के अलावे क्या कुछ ऐसा भी है जिसकी आहट तो सुनायी दे रही है लेकिन उसका चेहरा ठीक-ठीक नजर नहीं आ रहा ? हां, कुछ ना कुछ ऐसा है.

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कौन जाने यूपी में बीजेपी की चुनावी नैया के अकेले खेवैया नरेन्द्र मोदी बजट-प्रस्तावों के भीतर से जादू की ऐसी छड़ी निकाल घुमायें कि पासा ही पलट जाए. अच्छा है कि कुछ देर तक अभी और इंतजार किया जाए.

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