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यूपी चुनाव: अखिलेश जीते तो सोना, बगावत से जीते तो सोने पर सुहागा

छवि बाहुबलियों और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाले की है. उम्र कम है. इन सब पैमानों पर मुलायम अपने बेटे से पिछड़ जाते हैं.

Updated On: Dec 30, 2016 03:14 PM IST

Madhukar Upadhyay

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यूपी चुनाव: अखिलेश जीते तो सोना, बगावत से जीते तो सोने पर सुहागा

अखाड़े के पहले दांव में सबने यही माना कि समाजवादी पार्टी में चल रहा दंगल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच है. कहा गया कि ये नूरा कुश्ती है और बात अंतत: परिवार से बाहर नहीं जाएगी.

दूसरे दांव में राजनीतिक पंडितों ने कहा कि कुश्ती के असल पहलवान समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव हैं. वे जो कर रहे हैं उससे राजनीतिक नुकसान कम और फायदा अधिक होगा. अखिलेश की पहले से साफ छवि बेहतर हो जाएगी. इसे मुलायम का पुत्र मोह करार दिया गया.

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तीसरे दांव में कुश्ती अखाड़े से बाहर चली गई. इसका पहला संकेत अखिलेश ने तकरीबन दो साल पहले दे दिया था. संकेत इतना ढका-छिपा था, इतना नफीस, कि उसकी गंभीरता नजरंदाज हो गई. उसे हल्की-फुल्की टिप्पणी मान लिया गया.

दोनों खिलाड़ी

अखिलेश से पूछा गया कि ‘अध्यक्ष जी’ मुलायम सिंह यादव और आपमें मतभेद क्यों हैं?

मुख्यमंत्री ने तपाक से जवाब दिया, ‘हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है. बस इतना है कि हम दोनों खिलाड़ी हैं. वो कुश्ती के और मैं फुटबॉल का’.

कुश्ती वैयक्तिक खेल है और फुटबॉल में टीम होती है.

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कुश्ती और पहलवानी दोनों फारसी शब्द हैं. इसका विकास मुगल काल में मल्ल युद्ध में फारस की पहलवानी को जोड़ कर किया गया. जबकि फुटबॉल अपने आधुनिक रूप में औपनिवेशिक काल में भारत आया.

AkhileshMulayam

तीसरे दांव के बाद पता चला कि ‘धोबीपाट’ में माहिर मुलायम को अखिलेश ने ‘ऑफ साइड’ हुए बिना ‘कसौटा’ मार दिया है. उनका अगला दांव ‘मछरगोटा’ हो सकता है.

अखिलेश की टिप्पणी तल्ख थी. यकीनन राजनीतिक अखाड़े के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव को इसका निहितार्थ ठीक-ठीक पढ़ने में दिक्कत नहीं हुई. ये बेटे की बाप से बगावत का तब तक का स्पष्टतम संकेत था. लड़ाई उसी समय से पिता पुत्र की है, चाचा भतीजे की नहीं.

मामला कुछ ज्यादा है

समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह का कारण उत्तर प्रदेश की सत्ता से कुछ अधिक है. यह उत्तर प्रदेश का नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की लड़ाई का एक अध्याय है. लखनऊ उसका कुरुक्षेत्र है. जहाँ से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी.

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मुलायम सिंह यादव ने बेटे की इसी बगावत को भांप कर पार्टी की राज्य इकाई की अध्यक्षता अखिलेश से छीन कर छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को सौंप दी. बगावत में कथित रूप से अखिलेश का साथ दे रहे चचेरे भाई रामगोपाल को पार्टी से निकाल दिया. अखिलेश ने कई मंत्री हटाए तो मुलायम के ‘मुल्तानी’ वीटो से उनकी वापसी हो गई.

Mulayam Singh Yadav

तब ये कहा जा रहा था कि बाप बेटे के झगड़े के पीछे कुछ उद्योगपतियों और बाहरी लोगों का हाथ है. अखिलेश ने सार्वजनिक मंच से अमर सिंह की ओर इशारा भी कर दिया.

तो इस झगड़े की वजह है क्या?

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और इसमें हैरानी नहीं होगी कि राज्य में दूसरी राजनितिक कामयाबी अखिलेश को राष्ट्रीय फलक का प्रमुख किरदार बना देगी. इसमें ये बात शामिल होगी कि मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की छवि दागदार होने की जगह लगातार सुधरी है.

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राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति की अखिलेश की आकांक्षा में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सीमाएं, जयललिता का निधन, नितीश कुमार का ढुलमुल रवैया और नवीन पटनायक के सीमित प्रभाव क्षेत्र की भूमिका भी है.

आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद विपक्ष के केंद्रीय नायक की तरह चंद्रबाबू नायडू अपना महत्त्व काफी खो चुके हैं. इस वजह से सबकी निगाहें उत्तर प्रदेश पर हैं कि विपक्ष में प्रभावी नेतृत्व कौन देगा.

मुलायम या अखिलेश ये जगह भर सकते है और इसीलिए अखिलेश मुलायम के लिए चुनौती हैं. राज्य में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है. काम दिखता है. छवि बाहुबलियों और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाले की है. उम्र कम है. इन सब पैमानों पर मुलायम अपने बेटे से पिछड़ जाते हैं.

Akhilesh Mulayam

राष्ट्रीय राजनीति में ‘बेचारा’ का ठप्पा लगा कर पहुंचने की निरर्थकता से वाकिफ अखिलेश आगामी चुनाव समाजवादी पार्टी से जीतें तो सत्ता में वापसी सोना और बगावत कर के जीत हासिल हो सोने पर सुहागा. नहीं जीते तो छवि एक युवा जुझारू नेता की होगी.

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वैसे आतंरिक कलह से समाजवादी पार्टी को काफी नुकसान हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी इसका लाभ लेने की कोशिश करेगी क्योंकि वह भी अखिलेश को भविष्य में विपक्ष की राष्ट्रीय राजनीति की धुरी के रूप में नहीं देखना चाहेगी.

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