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तिलक, तराजू और तलवार के बल पर होगी सोशल इंजीनियरिंग

2007 के चुनाव में सोशल इं​जीनियरिंग का प्रयोग सफल होने के बाद मायावती इसे दोहराना चाहती हैं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jan 04, 2017 07:47 AM IST

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तिलक, तराजू और तलवार के बल पर होगी सोशल इंजीनियरिंग

2007 में यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए तो बहुजन समाज पार्टी में सतीशचंद्र मिश्र का कद अपने आप बढ़ता चला गया. बसपा को 403 में 206 सीटों पर जीत हासिल हुई.

दलित अस्मिता की राजनीति से शुरुआत करने वाली जिन मायावती और उनकी पार्टी ने कभी 'तिलक, तराजू और तलवार...' वाला नारा दिया था, उन्होंने सवर्णों को अपने साथ लेकर सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग किया.

मायावती अगला चुनाव भले ही हार गईं, लेकिन जातिगत सोशल इंजानियरिंग के फॉर्मूले पर उनका भरोसा अब भी कायम है. 2007 के बाद से ही मायावती ने कोर वोटर दलित को छोड़कर अन्य जातियों को सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर लुभाना शुरू कर दिया.

Mayawati BSP

पीटीआई.

सवर्णों को सबसे ज्यादा टिकट 

मंगलवार को जब लखनऊ में मायावती ने आगामी चुनावों के मद्देनजर पार्टी कैंडिडेट्स का जातिवार ब्योरा पेश किया तो एकबार फिर साल 2007 की याद आ गई. मायावती ने सबसे ज्यादा 113 सीटें अगड़ी जातियों को देने का ऐलान किया है. इसके बाद 106 ओबीसी, 97 मुस्लिम और सबसे कम 87 एससी कैंडिडेट को जगह दी गई.

लगभग इसी अंदाज में 2012 के चुनावों में भी सबसे ज्यादा 117 सीटों पर अगड़ी जातियों के उम्मीदवारों को टिकट दिया था. हां, मुसलमानों को पिछली बार के 85 के मुकाबले इस बार 97 सीटों पर टिकट मिला है. लेकिन दलितों को इस बार पिछली बार के 88 के मुकाबले एक और सीट कम मिली है.

बहुजन से सर्वजन की नेता

मायावती के पास सोशल इंजीनियरिंग के मिले-जुले अनुभव हैं. इसी फॉर्मूले पर एक बार वो जीती हैं और एक बार हार भी चुकी हैं. लेकिन सोशल इंजीनियरिंग का मोह उनके मन से जा भी नहीं रहा है. बहुजन से सर्वजन की नेता बनने की कवायद जारी है.

bsp

मायावती की सोशल इंजीनियरिंग थोड़ी उल्टी भी लगती है. कमाल है कि मायावती प्रदेश में सबसे कम संख्या वाले सवर्ण समुदाय को सबसे ज्यादा सीटें दे रही हैं. आखिर राजनीति की कौन सी ऐसी धारा है जो सत्ता की सीढ़ियों तक पहुंचने के लिए कोर वोटर को भूलकर उनकी संख्या बढ़ा दी गई जिनका जीवनभर विरोध करके मायावती यहां तक पहुंची हैं.

मायावती के इस फॉर्मूले को समाजशास्त्री बद्रीनारायण उनके आत्मविश्वास के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं कि 'मायावती को मालूम है कि दलित वोट बैंक तो आधार के रूप में उनके साथ जुड़ा ही हुआ है. अब दूसरी जातियों के वोट अपनी तरफ खींचने के लिए वो उन जातियों पर ज्यादा फोकस कर रही हैं.'

बद्री ये भी कहते हैं ‘मायावती अब आंदोलन मोड से आगे बढ़कर सर्वजन की नेता बन गई हैं. इससे ये नहीं समझा जाना चाहिए कि वो अपने कोर वोटर से दूर छिटक रही हैं बल्कि उनके इस कदम को दूसरी जातियों को अपने साथ जोड़ने के तौर पर भी देखा जा सकता है. मुस्लिम समुदाय को ज्यादा सीट देने की वजह सपा विवाद भी हो सकता है. उन्हें शायद ऐसा लगता है कि विवाद से जो मुस्लिम छिटकेंगे, उनका वोट बसपा की तरफ आएगा.’

यह भी सच है कि आंदोलन की अपनी एक परिणति होती है. सत्ता के गलियारों तक पहुंचने के लिए सारे हथकंडे अपनाने पड़ते हैं. मायावती चूंकि 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता तक पहुंच चुकी हैं, इसलिए वे इसे दोहराना चाहती हैं. जाहिर तौर पर इसमें आंदोलन की जगह जातिगत हथकंडों की अहम भूमिका होगी.

supreme court

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या ?

मायावती द्वारा जातिगत आधार पर प्रत्याशियों की घोषणा करना भी सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का माखौल उड़ाने जैसा है. सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राजनीतिक पार्टियों के धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के नाम पर वोट मांगने पर रोक लगा दी है.

लेकिन मायावती ने जातिगत आधार पर प्रत्याशियों की घोषणा करने की इतनी जल्दीबाजी दिखाई कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़ने की जहमत तक नहीं उठाई.

मायावती का निर्णय ये भी बताता है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों की जड़ों में जातिवाद और धर्म कितनी गहरी जगह बना चुका है, जिससे पार पाना किसी भी सूरत में संभव नहीं है. वह भी तब, जबकि अस्मितावादी राजनीति से जुड़े नेताओं का पूरा जीवन जातीय राजनीति में गुजरा हो!

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