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यूपी चुनावः ऊंट किस करवट बैठेगा, शायद ऊंट को भी नहीं पता

मौजूदा हालात में 11 मार्च को क्या नतीजे आएंगे इसका अंदाजा लगाना तकरीबन नामुमकिन है.

Sreemoy Talukdar Updated On: Jan 05, 2017 07:51 PM IST

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यूपी चुनावः ऊंट किस करवट बैठेगा, शायद ऊंट को भी नहीं पता

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का एलान होने के साथ ही 11 मार्च भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण दिन का गवाह बनने जा रही है. 11 मार्च को ही इन राज्यों के चुनाव के नतीजे आएंगे. इन नतीजों का असर 2019 के चुनाव पर भी पड़ेगा. यह तय हो जाएगा कि 2019 में 7 रेस कोर्स रोड पर किसका कब्जा होगा और कौन चुनौती देने वाला बनेगा.

देश की राजनीति तय करेगा यूपी का चुनाव

अगर 2019 का रास्ता फरवरी और मार्च से होकर जाता है, तो ऐसा इस वजह से है क्योंकि इन तारीखों में देश के सबसे बड़े राज्य में चुनाव हो रहे हैं. हालांकि गोवा, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में होने वाले चुनाव भी कम महत्व के नहीं हैं. लेकिन, राष्ट्रीय राजनीति को तय करने में जितनी अहमियत उत्तर प्रदेश की है उतनी किसी और राज्य की नहीं है.

मोदी मैजिक से मिली थीं 80 में से 71 सीटें

2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश ही वह राज्य था जहां से बीजेपी को 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इनमें जीत का मार्जिन 81 फीसदी था. इसने 1977 में जनता पार्टी की लहर की याद दिला दी थी. तब इमरजेंसी के खिलाफ खड़े हुए आंदोलन में जनता पार्टी ने ऐसा ही प्रदर्शन किया था.

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2014 में नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर देखने को मिली जिसने एसपी और बीएसपी दोनों का सूपड़ा साफ कर दिया.

चुनाव विश्लेषकों को आज भी इस बात पर ताज्जुब है कि कैसे बीजेपी ने 3.43 करोड़ वोट हासिल किए. जबकि सपा को केवल 1.8 करोड़ और बीएसपी को 1.59 करोड़ वोट ही मिल पाए.

बीजेपी की दलित पॉलिटिक्स

2014 में बीजेपी की जीत के पीछे सबसे बड़ा फैक्टर दलित वोटों का बीजेपी के साथ जुड़ना था. उस वक्त ऐसा दिखाई दिया कि मोदी ने बीजेपी की अगड़ी जातियों की पार्टी की इमेज तोड़कर इसे बाकी की पिछड़ी जातियों और दलितों की भी पार्टी बना दिया.

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लेकिन 2017 को 2014 नहीं माना जा सकता है. इस दौरान गंगा से काफी पानी बह चुका है. उत्तर प्रदेश में जातियों के गणित को दिमाग में रखते हुए बीजेपी दलित वोटों को हासिल करने की पूरी कोशिश कर रही है.

पार्टी प्रेसिडेंट अमित शाह की लंच की राजनीति हो या प्रधानमंत्री के डिजिटल ट्रांजैक्शंस के लिए बने मोबाइल फोन एप का नाम दलित आइकॉन बी आर अंबेडकर के नाम पर भीम रखने की बात हो. यह सब दिखाता है कि पार्टी अपने ऊपर लगे अगड़ी जातियों की पार्टी के ठप्पे को मिटाना चाहती है.

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लेकिन, रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या गुजरात में दलितों पर गौरक्षकों के अत्याचार का मामला, बीजेपी को इनके विपरीत परिणाम झेलने पड़े हैं. इन दोनों घटनाओं की बड़े लेवल पर रिपोर्टिंग हुई और इससे बीजेपी के खिलाफ एक माहौल तैयार हुआ. निश्चित तौर पर मायावती इस चीज से अनजान नहीं होंगी.

बीजेपी के लिए चीजें संभालना आसान नहीं

यूपी चुनाव के संदर्भ में एक चीज और महत्वपूर्ण है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जो परिणाम आए वह एक असामान्य लहर का नतीजा था.

पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर लुढ़का है. पार्टी को तीसरे नंबर ही संतोष करना पड़ा है. त्रिकोणीय मुकाबले में 30 फीसदी वोट शेयर बहुमत हासिल करने के लिए काफी है. यूपी में बिहार जैसे किसी महागठबंधन के कोई आसार नहीं हैं.

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लेकिन, 2014 से उलट यह लोकसभा चुनाव नहीं है और अगर बीजेपी हर दूसरी रैली में मोदी को लेकर आए, तब भी किसी लोकल नेता के न होने या मुख्यमंत्री उम्मीदवार का अभाव पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है.

बात यहीं नहीं रुकती. नोटबंदी ने 8 नवंबर से पहले राजनीतिक पंडितों के दिए जा रहे हर अनुमान को बेमतलब कर दिया है.

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नोटबंदी के चलते पैदा हुई दिक्कतें इतनी गहरी हैं कि इससे बीजेपी की राज्य में परचम लहराने की उम्मीदें मिट्टी में मिल सकती हैं.

लेकिन, चूंकि इस कदम के साथ भ्रष्टाचार और काला धन खत्म करने का बड़ा राजनीतिक संदेश था, ऐसे में यह इस फैसले को लागू करने से पैदा हुई नकारात्मकता को मिटा सकता है. साथ ही इससे जातिगत समीकरण भी बौने पड़ सकते हैं. और मोदी के लिए बेहतरीन नतीजे आ सकते हैं.

प्रधानमंत्री निश्चित तौर पर ऐसा ही सोचते होंगे. उनकी लखनऊ में हुई हालिया रैली में वोटरों से जाति की राजनीति से ऊपर उठकर विकास के लिए बदलाव लाने की पुरजोर अपील की गई.

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लेकिन, जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक बड़े से बड़ा पंटर भी किसी संभावित नतीजे पर दो बार सोचकर दांव लगाएगा. मौजूदा हालात जिस तरह के हैं उनमें यह इलेक्शन कहीं ज्यादा पेचीदा हो गया है. यूपी में ऊंट किस करवट बैठेगा इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है.

मुस्लिम वोटों पर दांव लगा रहीं बहनजी

समाजवादी पार्टी में मचा दंगल मायावती को दलित-मुस्लिम गठजोड़ बैठाने का मौका दे रहा है. हालांकि, मुस्लिमों को दिए गए टिकटों की ज्यादा संख्या किसी चीज को तय नहीं करती है. लेकिन बीएसपी सुप्रीमो को अपने दलित वोट के बरकरार रहने का पूरा भरोसा है.

 

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मायावती अपनी ऊर्जा मुस्लिम वोटरों को लुभाने में लगा रही हैं. मुस्लिम अगर साथ आ गए तो बहनजी के लिए 40 फीसदी वोट शेयर पक्का हो सकता है. यूपी की गद्दी हासिल करने के लिए यह काफी होगा.

उनकी हर चुनावी रैली से पहले अजान गूंजती है. उन्होंने मुसलमानों को 125 टिकट दिए हैं. अपने भरोसेमंद सहयोगी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनके बेटे अफजल को उन्होंने मुसलमानों को पार्टी की ओर खींचने के लिए लगा रखा है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्दीकी पिता-पुत्र मुसलमान वोटरों को एक साफ संदेश दे रहे हैं: ‘2014 के चुनावों में यूपी से एक भी मुस्लिम एमपी नहीं चुना गया, क्या आप ऐसा ही विधानसभा में भी चाहते हैं?’

सपाई कुनबे का अंतहन ड्रामा 

यूपी की सत्ताधारी पार्टी का हाल बिलकुल अलग है. तीन महीने से चल रही रस्साकसी के बावजूद समाजवादी परिवार के झगड़े का कोई अंत निकलता नजर नहीं आ रहा है.

सियासत के दंगल के मंझे हुए पहलवान मुलायम सिंह यादव को अपने ही बेटे अखिलेश से पटखनी मिल गई है. अखिलेश ने अपने चाचा को दरकिनार कर दिया है. और 'बाहरी शख्स' को बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

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समाजवादी कुनबे में वही सबसे मजबूत होकर उभरे हैं. लेकिन, रोज-रोज के ड्रामे से अब सूबे की आम जनता ऊब गई है.

लेकिन, मुलायम सिंह को कमतर आंकना भूल साबित हो सकती है. समाजवादी पार्टी का जमीनी स्तर पर मजबूत काडर है. वोटरों के साथ जुड़ा हुआ पार्टी का ढांचा उम्मीदवारों के जीतने में मददगार साबित हो सकता है.

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फिलहाल, किसी पर दांव लगाने की बजाय बेहतर यही होगा कि पैसे को जेब में दबाकर रखा जाए.

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