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यूपी चुनाव 2017: बीजेपी की रणनीति आत्मघाती हो सकती है

बीजेपी के बनिया और ब्राह्मण वोटर पहले ही महागठबंधन की तरफ झुकाव के संकेत दे रहे हैं.

Updated On: Jan 20, 2017 04:49 PM IST

Ambikanand Sahay

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यूपी चुनाव 2017: बीजेपी की रणनीति आत्मघाती हो सकती है

'चौबे जी गये छब्बे जी बनने, दुबे जी बनकर लौटे' हिंदी बोलने और समझने वाले इस कहावत के मायने फौरन समझ जाएंगे.

बीजेपी जो पिछले कई महीनों से यूपी में गैर यादव पिछड़ों और दलितों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही थी, वो शायद इस चक्कर में अपने सवर्ण और जाट वोटरों को गंवा बैठे.

अगर हम पूर्वी उत्तर प्रदेश से आ रहे जमीनी संकेतों पर यकीन करें तो, बीजेपी के बनिया और ब्राह्मण वोटर पहले ही महागठबंधन की तरफ झुकाव के संकेत दे रहे हैं. बीजेपी की दिक्कत इस बात से बढ़ सकती है कि दलित वोटर तो बीएसपी के पाले में एकजुट हैं. वहीं, गैर यादव पिछड़े मतदाता समाजवादी पार्टी, बीएसपी और बीजेपी के बीच बंट जाएंगे.

वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों ने बीजेपी के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया है. ये लोग नोटबंदी की वजह से बहुत नाराज हैं. इस नारे पर गौर करें तो जाटों का मूड अच्छे से भांपा जा सकता है, 'मोदी तेरे राज में, मूंजी गई ब्याज में और पराली गई शर्म लिहाज में'. ये नारा आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दीवारों पर, ट्रैक्टर ट्रालियों पर देखने को मिल जाएंगे.

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आपको याद होगा कि जाटों की अगुवाई में ही हिंदू वोटों की बीजेपी के पक्ष में लामबंदी हुई थी. खास तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के दूसरे इलाकों में भी. मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट बीजेपी के खेमे में एकजुट हो गये थे. इसी का असर था कि 2014 के चुनाव में बीजेपी को इतनी बड़ी संख्या में सीटें हासिल हो सकी थीं.

बीजेपी के खिलाफ जाट एकजुट

इंडियन एक्सप्रेस ने 15 जनवरी को अपनी इस रिपोर्ट, में लिखा, 'चीनी मिलों से भुगतान में देरी, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अपेक्षित इजाफा न होने और फसल कर्ज के बढ़ने से परेशान जाटों के गुस्से को नोटबंदी ने और भड़का दिया.'

'खास तौर से उस वक्त जब रबी की बुवाई का सीजन शुरू ही हो रहा था. इसीलिए जाट किसान बीजेपी से बुरी तरह नाराज हैं. कमोबेश हर जाट खाप ने एलान कर दिया है कि वो इस बार बीजेपी को हराने के लिए वोट करेंगे'.

PTI

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अखबार ने आगे लिखा था कि, '8 जनवरी को 35 खाप नेताओं की अगुवाई में यूपी और हरियाणा के हजारों जाट मुजफ्फरनगर में इकट्ठे हुए थे. ये लोग जाट आरक्षण संघर्ष समिति के बैनर तले इकट्ठे हुए थे. इस बैठक में तय हुआ कि जाट, बीजेपी को वोट नहीं देंगे. इस रैली में मुसलमान जाट भी आए थे.'

'इसमें बीजेपी पर सांप्रदायिक नफरत फैलाने का आरोप लगाया गया. हालांकि मुख्य मुद्दा जाटों को आरक्षण का ही था, लेकिन रैली में किसानों को हो रही दिक्कतों, विकास में कमी और मुजफ्फरनगर दगों के बाद के हालात पर भी चर्चा हुई.’

जिन्हें उत्तर प्रदेश की राजनैतिक समझ है वो खापों की अहमियत जानते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरियों के फरमान और मौलवियों के फतवे में फर्क नहीं होता. बहुत मुश्किल से ही कोई इन फरमानों के खिलाफ जाता है.

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साफ है कि बीजेपी की यूपी के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति अपेक्षित नतीजे नहीं दिखा रही है. यही वजह है कि टिकट बंटवारे में पार्टी जीत सकने वाले नेताओं पर ज्यादा भरोसा कर रही है, खास तौर से विरोधी दलों के.

बीजेपी में दलबदलुओं की भरमार

मिसाल के तौर पर कांग्रेस से 8 जनवरी को बीजेपी में आये ठाकुर धीरेंद्र सिंह को गौतम बुद्ध नगर की जेवर विधानसभा सीट से टिकट दिया गया है. वहीं दिसंबर में ही कांग्रेस से बीजेपी में आए अजीत पाल त्यागी को गाजियाबाद की मुरादनगर सीट से उम्मीदवार बनाया गया है. इसी तरह कांग्रेस से आए एक और नेता प्रदीप चौधरी को बीजेपी ने गंगोह सीट से टिकट दिया है.

बीजेपी की पहली लिस्ट में समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय लोकदल से आए तमाम नेताओं के नाम शामिल हैं. जैसे-बेहट से महावीर राणा, नकुर से धर्मसिंह सैनी, नेहतौर से ओम कुमार, पटियाली से ममतेश शाक्य, तिल्हर से रोशन लाल वर्मा, पलिया से रोमी साहनी और धौरहरा से बाला प्रसाद अवेशी. ये सभी बीएसपी के मौजूदा विधायक हैं.

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स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा छोड़कर बीजेपी में आए.

बीजेपी ने आगरा की बाह सीट से समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक राजा अरिदमन सिंह की पत्नी पक्षालिका सिंह को टिकट दिया है. राजा और उनकी पत्नी ने हाल ही में बीजेपी का दामन थामा था. इसी तरह अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के दो विधायक दलवीर सिंह और पूरन प्रकाश को भी बीजेपी ने अपने दल के नेताओं की अनदेखी करके उम्मीदवार बनाया है. इन्हें बरोली और बलदेव सीटों से टिकट दिया गया है.

साफ है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी का बहुत कुछ दांव पर है. चौंकाने वाली बात नहीं होगी अगर बीजेपी की अगली सूची में भी ऐसे ही जिताऊ नेताओं पर ज्यादा भरोसा दिखाया जाये.

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पर तब क्या होगा अगर दलबदलू नेताओं पर ज्यादा भरोसा दिखाने का दांव नाकाम हो गया? कम से कम इस मौके पर तो हमें अपनी कल्पना के घोड़े ज्यादा दूर दौड़ाने की जरूरत नहीं. फिलहाल तो ये कहना ठीक रहेगा कि आगे-आगे देखिये, होता है क्या...

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