S M L

यूपी चुनाव: राजनीति की धुरी बनकर उभरे हैं अखिलेश

चुनाव आयोग ‘साइकिल’ निशान को फ्रीज कर देता तो वह नए चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में कूदने के लिए तैयार थे.

Sreemoy Talukdar Updated On: Jan 19, 2017 11:37 AM IST

0
यूपी चुनाव: राजनीति की धुरी बनकर उभरे हैं अखिलेश

राजनीति एक समझ है. अखिलेश को पता था कि पिता के खिलाफ जंग में संख्याबल उनके पास है. इसी हिसाब से उन्होंने गठजोड़ तैयार किए. पूरे उत्तर प्रदेश में दौरों की तारीखें तय कीं और अपने कैंपेन मैनजरों को दूर-दूर तक भेज दिया ताकि हर रोज कई रैलियां की जा सकें.

टीपू का कैंप तैयार था. यहां तक कि अगर चुनाव आयोग ‘साइकिल’ निशान को फ्रीज कर देता तो वह नए चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में कूदने के लिए तैयार थे.

मीडिया रिपोर्ट्स में संकेत दिया गया था कि अगर चुनाव आयोग साइकिल निशान को रोक देता तो अखिलेश मोटरसाइकिल निशान के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में थे.

यह भी पढ़ें: आया मौसम दलबदल का !

लेकिन, इसमें एक दिक्कत थी. संख्याबल के मामले में मजबूत स्थिति होने के बावजूद एक नई पार्टी और नया सिंबल समाजवादी पार्टी में दो फाड़ साबित करता. चौतरफा मुकाबले में मायावती को निर्णायक बढ़त हासिल हो सकती थी.

संख्याबल में अखिलेश मजबूत

अखिलेश यादव के धड़े को सपा के 228 एमएलए में से 205 का सपोर्ट हासिल है. इसके अलावा 68 एमएलसी में से 56, 24 लोकसभा/राज्यसभा सांसदों में से 15, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 46 में से 28 और 5,731 डेलिगेट्स में से 4,716 सदस्य अखिलेश के साथ खड़े थे.

चुनाव आयोग के फैसले से मुलायम को झटका

चुनाव आयोग (ईसी) ने सोमवार को फैसला दिया कि साइकिल चुनाव चिन्ह अखिलेश के पास रहेगा. अखिलेश की अगुवाई वाले धड़े को ही असली समाजवादी पार्टी माना गया. ईसी का फैसला मुलायम सिंह के लिए एक बड़ा झटका है. उनके लिए अब मजबूरी हो गई है कि वह अपने साम्राज्य को अपने बेटे को सौंप दें.

मुलायम सिंह के लिए यह चौंकाने वाला झटका रहा है और उनके लिए इससे वापसी कर पाना मुश्किल भरा होगा.

7 चरणों में होने वाले यूपी चुनावों में पहले चरण के चुनाव 11 फरवरी को होंगे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 73 सीटों के लिए नामांकन का काम शुरू हो गया है.

अगर मुलायम सिंह अपने बूते पर चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें और उनके हताशा से भरे कैंप को भारतीय लोकदल जैसे पुराने प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ेगा. इसकी वजह यह है कि उनके पास अब इतना वक्त नहीं है कि वह कोई नई पार्टी खड़ी करें.

ब्रांड अखिलेश में मजबूती

इस पूरी जंग के बाद ब्रांड अखिलेश को जबरदस्त मजबूती मिली है. उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बखूबी संभाल लिया है. साथ ही उन्होंने इनकंबेंसी (सत्ताधारी पार्टी के विरोध में बनने वाले माहौल) और नेगेटिव चर्चाओं पर भी काबू पा लिया है.

यह भी पढ़ें: ये है अखिलेश यादव का घोषणा पत्र

सपा के पुराने दिग्गजों की अहमियत खत्म होने के साथ ही, मुख्यमंत्री अब अपनी छवि को एक ऐसे कद्दावर नेता के तौर पर पेश कर सकते हैं जो नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चल रही विकास की बहस के खिलाफ खड़ा होने की ताकत रखता है.

गुंडागर्दी की सरकार की इमेज तोड़ी

एक झटके में ही अखिलेश ने सपा शासन पर लगने वाले बाहुबली और गुंडागर्दी की सरकार के ठप्पे को खत्म कर दिया है. भ्रष्टाचार, अराजकता के आरोप कहीं पीछे छूट गए हैं और अखिलेश के पक्ष में एक ताजा माहौल तैयार हुआ है.

सपा में उथल-पुथल की शुरुआत पिछले साल सितंबर में हुई. तब ‘साढ़े चार मुख्यमंत्री’ वाले सूबे में सपा के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर हटाए जाने के बाद अखिलेश ने विद्रोह का मोर्चा खोल दिया. अपने पिता और चाचा शिवपाल के खिलाफ अखिलेश को एक कड़वी जंग में उलझना पड़ा.

ताजा घटनाक्रम के बाद अखिलेश यादव काफी मजबूत बनकर उभरे हैं

ताजा घटनाक्रम के बाद अखिलेश यादव काफी मजबूत बनकर उभरे हैं

इस जंग के नतीजे के तौर पर अखिलेश पार्टी के निर्विवाद मुखिया के तौर पर उभरे. उन्होंने खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर साबित किया जिसने पुत्र होने की वजह से बैठे-बिठाए यह साम्राज्य हासिल करने की बजाय पार्टी की कमान और पिता की विरासत लड़कर हासिल की है.

परिवार के इस दंगल से यूपी के सीएम एक साफ-स्वच्छ छवि वाले और चमकदार भविष्य वाले नेता के तौर पर सामने आए हैं. उन्होंने पार्टी और परिवार में अपनी हैसियत को साबित किया है.

यह भी पढ़ें: रहस्य गढ़ने में माहिर मुलायम सिंह को खत्म मत समझिए

इस उथल-पुथल मचाने वाले राजनीतिक संदेश को उनके दोस्तों और दुश्मनों दोनों ने नोटिस किया है. कांग्रेस अखिलेश की साइकल पर बैठकर अपनी राजनीति की नैया को किनारे लगाने की कोशिश में है. नरेंद्र मोदी को यूपी में पटखनी देने की मंशा पूरी करने में तृणमूल को भी अखिलेश ही सहारा दिख रहे हैं.

सबका सहारा अखिलेश

एक नई राजनीतिक धुरी बन रही है जिसके केंद्र में अखिलेश हैं. यह केवल महागठबंधन की बात नहीं है. अगर अखिलेश दोबारा चुनाव जीतने में कामयाब रहे तो वह विपक्ष में बने हुए शून्य को भर सकते हैं. और नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक गंभीर चुनौती पैदा कर सकते हैं.

जिस तरह से विपक्षी नेताओं ने यूपी के सीएम को सोमवार को बधाई दी, उसमें कोई अचरज की बात नहीं है. शीला दीक्षित की खुद के लिए सीएम की सीट की इच्छा करने से ज्यादा अखिलेश को जिताने में दिलचस्पी नजर आ रही है. हालांकि, दीक्षित को कांग्रेस ने सीएम कैंडिडेट घोषित किया है.

लालू प्रसाद सपा काडर से भी ज्यादा उत्साह से मुलायम सिंह से समझौता करने के लिए अपील कर रहे हैं.

नीतीश कुमार और एनसीपी ने भी अखिलेश को अपना सपोर्ट दिया है. वेस्ट बंगाल में ममता बनर्जी ने भी उन्हें बधाई दी है.

यह भी पढ़ें: क्या नए वाजिद अली शाह हैं मुलायम!

सपा-कांग्रेस-आरएलडी के महागठबंधन के लिए मंच तैयार है. यूपी में एक त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है. लेकिन, अखिलेश की प्रतीकात्मक विजय के भारतीय राजनीति में दूरगामी असर होना तय है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
कोई तो जूनून चाहिए जिंदगी के वास्ते

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi