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गुल खिलाएगी अखिलेश-राहुल और प्रियंका-डिंपल की जुगलबंदी?

नरेंद्र मोदी-अमित शाह-आरएसएस की त्रिकोणीय ताकत का मुकाबला करने के लिए उन्हें एक दूसरे का साथ चाहिए होगा.

Updated On: Jan 19, 2017 11:47 AM IST

Ambikanand Sahay

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गुल खिलाएगी अखिलेश-राहुल और प्रियंका-डिंपल की जुगलबंदी?
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एलिजाबेथ फोले ने कभी लिखा था कि अच्छे दोस्तों के बीच सबसे खूबसूरत खोज ये होती है कि बगैर एक दूसरे से दूर हुए वो अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़ते रहते हैं और यही बात अब राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच भी देखी जा रही है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में दोनों युवा नेता ना सिर्फ सियासी गठबंधन की ओर बढ़ चले हैं बल्कि उन्होंने तीन बातों को बेहतर तरीके से समझ लिया है.

पहली बात तो ये है कि एक दूसरे से दूरी बनाए बगैर दोनों अलग-अलग अपनी राजनीतिक जमीन तलाश सकेंगे. दूसरी बात, उत्तर प्रदेश के सियासी समर में नरेंद्र मोदी-अमित शाह-आरएसएस की त्रिकोणीय ताकत का मुकाबला करने के लिए उन्हें एक दूसरे का साथ चाहिए होगा, और तीसरी बात जो सबसे अहम है, वो ये कि अगर 2017 में वो यूपी फतह कर लेंगे, तो इससे बीजेपी विरोधी ताकतों को 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ एकजुट करने में कोई परेशानी नहीं आएगी.

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अब जबकि दोनों ही नेताओं ने चुनाव से पहले सियासी गठजोड़ करने का मन बना लिया है तो इस महागठबंधन की बारीकियों को आप भी समझ लीजिए. अव्वल तो ये है कि ये गठबंधन एकदम अलग है. जहां सभी राजनीतिक दल एक मजबूत और सामान्य सियासी दुश्मन के खिलाफ एक छत के नीचे जुटे हैं. इस संघर्ष में एक दूसरे का साथ निभाते हुए उनके सामने अपनी राजनीतिक विचारधारा को एक दूसरे के लिए छोड़ने की बाध्यता नहीं है.

Lucknow: Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav coming out after paying the homage to Imam Telewali Mosque Maulana Fazlur Rahman Waizi in Lucknow on Monday. PTI Photo (PTI1_9_2017_000268B)

बीजेपी और मोदी को मिलकर देंगे जवाब

सवाल उठता है कि आखिर वो कौन सी सियासी चुनौती सामने है. जिसके चलते अलग अलग विचारधारा वाली इन पार्टियों को एक दूसरे का दामन थामना पड़ा? तो इस सवाल का जवाब है बीजेपी और नरेंद्र मोदी का लगातार बढ़ता सियासी कद.

यही वजह है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस किसी भी चुनावी प्रयोग से मुंह नहीं मोड़ना चाहती है. अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के ‘वार रूम’ से बाहर निकल कर आ रही खबरों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश के इस सियासी समर में कई रंग देखे जा सकते हैं.

हो सकता है कि पहली बार सूबे की जनता राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को रोड शो में हिस्सा लेते देखें तो, महागठबंधन के समर्थन में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे नेता अलग-अलग जगहों पर चुनावी रैलियों को संबोधित करते नजर आएं.

इसमें दो राय नहीं कि अखिलेश यादव हर राजनीतिक घटना को वास्तविकता के चश्मे से देख रहे हैं. जबकि उनके समर्थक जोश में हैं. खास कर तब जबकि चुनाव आयोग ने साइकिल सिंबल को अखिलेश को देने का फैसला सुनाया.

लेकिन खुशी के इस पल में अखिलेश ने परिपक्वता दिखाई और वो सीधे अपने पिता मुलायम सिंह से मिलने जा पहुंचे. दोनों के बीच क्या बात हुई इसकी जानकारी तो नहीं मिल सकी. लेकिन हां, यादव कुनबे से जो जानकारी बाहर आ रही है उसके मुताबिक अखिलेश अपनी जीत में विनम्र और उदार दिखने की कोशिश कर रहे हैं.

और तो और इस युवा नेता के समर्थक भी यही कह रहे हैं कि वो मुलायम की देख रेख में ही चुनाव लड़ेंगे. समर्थक अखिलेश और मुलायम दोनों के पक्ष में नारेबाजी करते दिख रहे हैं.

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बहुत साफ है कि अखिलेश शांत दिमाग और बेहतर सियासी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं. यही वजह है कि उन्होंने कांग्रेस के साथ डील को सील करने में देरी नहीं की. ताकि खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोट बैंक में बंटवारे को रोका जा सके.

राहुल और जयंत के पास मौका

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में खराब प्रदर्शन के कलंक से बचने के फिराक में है. अब जबकि समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस की डील करीब-करीब हो चुकी है, तो ऐसे में राहुल गांधी अपना ध्यान पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर में होने वाले चुनावों में भी दे सकेंगे .

इसके अलावा इस महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिए जयंत चौधरी भी इच्छुक हैं. जैसे संकेत मिल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी भी इस महागठबंधन का जल्द ही हिस्सा होंगे.

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हालांकि अजीत सिंह के बेटे और चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी इस गठबंधन में रहकर अलग सियासी समीकरण साधना चाहते हैं. जयंत जाट लैंड में ‘मजगार’ के समीकरण को मजबूत करना चाहते हैं.

दरअसल चौधरी चरण सिंह जब अपने सियासी चरम पर थे. तब उन्होंने अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत और मुस्लिमों का राजनीतिक समीकरण साधा जिसे ‘मजगार’ कहा गया. जब तक चौधरी चरण सिंह जिंदा रहे यह गठबंधन बचा रहा.

लेकिन बाद के दिनों में अहीर समाज समाजवादी पार्टी के साथ और गुर्जर बीएसपी के साथ जुड़ गए. जबकि राजपूत और जाटों का समर्थन बीजेपी और आरएलडी में बंट गया.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी में बंट चुका है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की शानदार सफलता के पीछे यूपी में पार्टी का प्रदर्शन ही था. चूंकि तब यहां के वोटिंग ट्रेंड में बदलाव देखे गए थे. तब मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद जाट समुदाय ने बीजेपी का समर्थन किया था.

महागठबंधन की स्क्रिप्ट तैयार करने वालों को ये भरोसा है कि सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि पर ‘मजगार’ समीकरण फिर से पनप सकती है. ऐसा हो भी सकता है या नहीं भी . लेकिन इसके प्रति उम्मीद पालने में कोई खराबी नहीं है .

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