S M L

यूपी चुनाव: बाप की उम्मीदों से आगे निकल गए अखिलेश

सपा में विरासत के बंटवारे का खेल जारी है. अखिलेश अपने पिता से ज्यादा ताकतवर बनकर उभरे हैं.

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jan 03, 2017 04:12 PM IST

0
यूपी चुनाव: बाप की उम्मीदों से आगे निकल गए अखिलेश

यूपी के सिनेमाघरों में इन दिनों इंटरवल के दौरान एक छोटी सी फिल्म दिखाई जाती है. इस फिल्म में यूपी की समाजवादी सरकार ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया है.

इस समाजवादी शॉर्ट फिल्म के हीरो हैं वन एंड ओनली अखिलेश यादव. सह कलाकारों में उनकी पत्नी डिंपल यादव हैं. उनके बच्चे हैं. उनके अफसरों की फौज है, लेकिन उस छोटी सी फिल्म में नेताजी मुलायम सिंह यादव कहीं नजर नहीं आते.

डिंपल यादव अपने पति अखिलेश के लिए कप में चाय उड़ेलती दिख जाती हैं. अपने पिता के साथ बच्चे क्रिकेट खेलते दिख जाते हैं.

साफ झक संगमरमर से सजे दफ्तर में अपने बॉस के साथ काम करते बड़े-बड़े अफसर दिख जाते हैं. फुर्सत के पलों में अपने ऑफिस की कांच की दीवारों से उस पार देखते अखिलेश सोचते से दिखते हैं- वाह! सूबे को कितना बदल दिया है इस कम वक्त में.

महीनों पहले लिखी गई पटकथा

इस फिल्म में अखिलेश किसी प्रदेश के सीएम से अधिक किसी कंपनी के सीईओ जैसे दिखते हैं, लेकिन मुलायम सिंह यादव कहीं नहीं दिखते. महीनों पहले इस फिल्म की शूटिंग हुई होगी. आप समझिए कि उसी वक्त अखिलेश ने अपने पिता मुलायम को मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया था.

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पार्टी नेता अमर सिंह और जया प्रदा के साथ सोमवार को दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के आॅफिस जाते हुए. (फोटो: पीटीआई)

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पार्टी नेता अमर सिंह और जया प्रदा के साथ सोमवार को दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के आॅफिस जाते हुए. (फोटो: पीटीआई)

अखिलेश यादव ने कोई आज सम्मानजनक तरीके से पिता को किनारे नहीं लगाया है. वो पिछले काफी वक्त से यूपी चुनाव की तैयारी खुद को आगे रखकर कर रहे थे.

ऐसे कई मौके आए जब अखिलेश की अगुवाई वाली रैलियों सभाओं में मुलायम सिंह का चेहरा गायब दिखा. वो पोस्टरों में नदारद दिखे. शायद आज की स्थिति का आभास उन्हें पहले से था, इसलिए पूरी तैयारियां कर रखी थीं.

मुलायम समर्थकों का विद्रोह 

ये तैयारियों का ही नतीजा है कि 1 जनवरी को जब उन्होंने अपनी पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया तो मंत्रियों, विधायकों और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ और पुराने नेताओं की भरमार थी.

मुलायम गुट से असंवैधानिक करार दिए गए राष्ट्रीय अधिवेशन में समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक रेवती रमन सिंह मौजूद थे. 1 जनवरी तक पार्टी के उपाध्यक्ष रहे किरनमय नंदा मंच पर मौजूद रहकर अखिलेश के समर्थन में कार्यकर्ताओं के हाथ उठवा रहे थे. राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल मुलायम का दामन छोड़कर अखिलेश के साथ हो लिए थे.

मुलायम के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ से जीते और मंत्री बने बलराम यादव और दुर्गा प्रसाद यादव भी मौजूद थे. उदय प्रताप सिंह जिन्होंने मुलायम को उनके कॉलेज के दिनों में पढ़ाया था और बाद में अपने शिष्य से ही सियासत का पाठ पढ़कर राजनीति में आए थे, वो भी अखिलेश को अपना नया राजनीतिक गुरू मान चुके थे.

परिवार के लोगों में से बंदायूं से सांसद धर्मेंद्र यादव, रामगोपाल के बेटे और फिरोजाबाद से सांसद अक्षय यादव, मैनपुरी से सांसद तेजप्रताप यादव और इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव भी मौजूद थे.

बाप के खिलाफ बेटे का राजनीतिक विद्रोह

सबको पता था कि ये एक बेटे का अपने बाप के खिलाफ राजनीतिक विद्रोह है. लेकिन उन सभी को उस मजबूत धड़े का साथ चाहिए था, जिनमें उन्हें अपने सियासत के जिंदा रहने और फलने-फूलने की उम्मीद नजर आती थी. अखिलेश यादव का पार्टी पर पकड़ उतनी कमजोर नहीं है जितनी उनके पिता समझते हैं.

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पार्टी नेता शिवपाल यादव के साथ सोमवार को दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के आॅफिस जाते हुए.(फोटो: पीटीआई)

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पार्टी नेता शिवपाल यादव के साथ सोमवार को दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के आॅफिस जाते हुए.(फोटो: पीटीआई)

पिछले कई मौकों पर मुलायम सिंह यादव लगभग झिड़कते हुए अखिलेश को कह चुके हैं कि शिवपाल ने पार्टी छोड़ी तो आधे लोग शिवपाल के साथ चले जाएंगे और आधे लोग मेरे साथ. उनके लिए ये बड़ा सदमा है. पार्टी के कैडर वोटर्स का तो पता नहीं लेकिन पार्टी संभालने वाले आधे से ज्यादा लोग अखिलेश के साथ हैं.

चुनाव चिन्ह का झगड़ा

अब झगड़ा साइकिल के चुनाव चिन्ह कब्जाने तक जा पहुंचा है. मुलायम सिंह यादव अपने सिपहसलार शिवपाल यादव, भरोसेमंद अमर सिंह और जयाप्रदा के साथ चुनाव आयोग हो आए हैं. साइकिल के चुनाव चिन्ह पर अपना दावा जता आए हैं. मंगलवार को अखिलेश गुट की बारी है. रामगोपाल चुनाव आयोग में अपना दावा दर्ज कराएंगे.

पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक ऐसा मुमकिन है कि दोनों में से किसी को साइकिल का चुनाव चिह्न न मिले. इंडिया टुडे टेलीविजन चैनल से कुरैशी ने कहा, ‘अपने पास बहुमत को दर्शाने के लिए दोनों पक्ष अपने दावे के पक्ष में हलफनामा और अपने समर्थकों के हस्ताक्षर पेश करेंगे’

उन्होंने कहा, ‘इनका सत्यापन होगा और इसमें चार से पांच महीने का वक्त लग सकता है. मुझे नहीं लगता कि यह चुनाव से पहले होने जा रहा है, क्योंकि दोनों पक्षों के दावे मजबूत हैं और दोनों मजबूती से अपना पक्ष रखेंगे.’

मुमकिन है कि साइकिल चुनाव चिन्ह जब्त कर लिया जाए. साइकिल की सवारी न मुलायम कर पाएं न अखिलेश. दोनों गुट अलग-अलग चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ें. समाजवादी पार्टी में विरासत की सियासत के बंटवारे का खेल जारी है. अखिलेश अपने पिता की उम्मीदों से ज्यादा ताकतवर बनकर उभरे हैं. क्या पता देर सवेर उन्हें अहसास हो भी जाए. संभावनाएं खत्म नहीं हुई है.

सिनेमाघरों में दिखाया जा रहा अखिलेश का वीडियो यहां देखें:

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Social Media Star में इस बार Rajkumar Rao और Bhuvan Bam

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi