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आल्हा ऊदल, लक्ष्मीबाई और मस्तानी का बुंदेलखंड इतना गरीब क्यों है?

कोई सरकार बुंदेलखंड के विकास पर ध्यान देगी यहां पर्यटन के विकास की कोशिश करेगी?

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Feb 23, 2017 04:01 PM IST

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आल्हा ऊदल, लक्ष्मीबाई और मस्तानी का बुंदेलखंड इतना गरीब क्यों है?

2015 की बॉलीवुड फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' की शानदार कामयाबी के बाद यूपी के बुंदेलखंड इलाके में टूरिज्म का कारोबार तेज होना चाहिए था.

मराठा शासक, पेशवा बाजीराव (1700-1740) की दूसरी पत्नी मस्तानी बुंदेलखंड की ही रहने वाली थी. वो इलाके के राजा छत्रसाल की बेटी थी. वैसे सिर्फ मस्तानी की वजह से बुंदेलखंड की शोहरत हो ऐसा नहीं है.

ये ऐतिहासिक इलाका कई मशहूर हस्तियों से ताल्लुक रखता है. जैसे कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को हराने वाले बारहवीं सदी के महोबा के लड़ाके आल्हा-ऊदल इसी इलाके से थे.

बुंदेलखंड ने प्राचीन और मध्यकाल में भारत के इतिहास में बड़ा रोल निभाया था. 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में भी बुंदेलखंड ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी. आजादी की लड़ाई में भी बुंदेलखंड इलाका हर कदम पर देश के साथ था.

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मगर यूपी की तमाम सरकारों के हाथों इसका ये हाल हुआ कि आज बुंदेलखंड अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. ऐसे में बुंदेलखंड की ऐतिहासिक विरासत की यहां के लोगों को उतनी फिक्र नहीं, जितनी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की है.

यही वजह है कि बाजीराव और मस्तानी के वंशज, नवाब शमशेर बहादुर का महल आज खंडहर में तब्दील हो गया है. नवाब शमशेर बहादुर ने 1857 की लड़ाई में अहम रोल निभाया था.

अंग्रेजों के खिलाफ जंग

बुंदेलखंड में ही 277 साल पुराना बहादुरगढ़ का किला है, जहां 1857 में अंग्रेजों ने 800 हिंदुओं और मुसलमानों को फांसी दी थी. उनका जुर्म ये था कि उन्होंने कंपनी सरकार के खिलाफ बगावत की थी.

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भूरागढ़ का किला बांदा में   (तस्वीर-देवव्रत घोष)

आजादी की पहली लड़ाई में बहादुरगढ़ का किला अंग्रेजों के खिलाफ जंग का केंद्र था. क्योंकि यहां लड़ाई बांदा के शासकों और अंग्रेजों के बीच लड़ी गई थी. ये किला बांदा शहर से पांच किलोमीटर की ही दूरी पर है. मगर इसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं.

फिर यहीं पर दसवीं सदी का मशहूर कालिंजर का किला है, जिसे कभी जीता नहीं जा सका. ये बांदा से 57 किलोमीटर दूर है और कालिंजर की पहाड़ी पर स्थित है. इसकी हालत भी खराब है.

बांदा के अलावा भी बुंदेलखंड के 13 जिलों में कई ऐतिहासिक विरासतें हैं. बुंदेलखंड के सात जिले यूपी में पड़ते हैं तो छह मध्य प्रदेश में हैं. लखनऊ से चलने वाली यूपी की राजनीति में बरसों से बुंदेलखंड की अनदेखी होती रही है.

ये इलाका सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है. इसकी सुध तभी ली जाती है जब चुनाव आते हैं उस वक्त नेता आते हैं. पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का वादा करते हैं और फिर अगले चुनाव तक के लिए लापता हो जाते हैं.

तो क्या इलाके का इतिहास कोई अहमियत रखता है? यूपी अगर चाहता तो यहां की ऐतिहासिक विरासत को टूरिज्म के विकास के लिए इस्तेमाल कर सकता है. जैसे कि राजस्थान और मध्यप्रदेश ने किया है.

इन राज्यों में ऐतिहासिक विरासतों का बेहतर रख-रखाव और प्रचार हुआ है. दोनों ही राज्यों में टूरिज्म से काफी कमाई हो रही है. दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकार है.

बांदा के नवाब के आठवीं पीढ़ी के वंशज शादाब अली बहादुर कहते हैं, 'देश के इतिहास में बांदा की काफी अहमियत है. खासतौर से आजादी की लड़ाई के दौरान इसने बड़ा रोल-प्ले किया था.

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अंग्रेजों ने बहादुरगढ़ के किले में 800 लोगों को बगावत के जुर्म में फांसी दे दी थी. मगर आज किले की हालत बेहद खराब है. यही हाल बांदा के नवाब के दो महलों का है. शादाब अली बहादुर इन दिनों भोपाल में रहते हैं.

छत्रसाल ने महोबा और आस-पास के इलाके बाजीराव को उस वक्त सौंपे थे, जब बाजीराव ने मुगलों के खिलाफ छत्रसाल की मदद की थी. शादाब अली बहादुर कहते हैं कि फिल्म बाजीराव मस्तानी में ऐतिहासिक किरदारों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया.

पेशवा देश के बेहद काबिल योद्धाओं में से एक थे. उन्होंने चालीस युद्ध लड़े और सारे के सारे ही जीते.

पर्यटन की अनदेखी

शादाब अली बहादुर कहते हैं कि इस बार के चुनाव में भी किसी पार्टी ने बुंदेलखंड की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने और पर्यटन को बढ़ावा देने का वादा नहीं किया है. जबकि इससे इलाके के लोगों का विकास किया जा सकता है.

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बांदा के पहले नवाब का किला (तस्वीर-देवव्रत घोष)

नवाब शमशेर बहादुर के बेटे और बांदा के पहले शासक नवाब अली बहादुर की दो हवेलियां, कांकर महल और बाड़ा बेड़ी आज बेहद बुरी हालत में हैं. इमारतें ढह रही हैं. वहां कूड़ा फेंका जा रहा है और खरपतवार उग रहे हैं. दोनों ही ऐतिहासिक इमारतें वीरान खंडहर बन चुकी हैं.

नवाब के एक मंत्री के खानदान से ताल्लुक रखने वाले जयंत गोरे कहते हैं कि यूपी की किसी भी सरकार ने इन इमारतों को बचाने के लिए काम नहीं किया. ये काम सरकार और आम लोगों को मिलकर करना होगा, वरना ये विरासतें तबाह हो जाएंगी.

2012 में चरखारी विधानसभा से चुनाव लड़ते हुए उमा भारती ने वादा किया था कि वो चरखारी को बुंदेलखंड का कश्मीर बना देंगी. हालांकि, बाद में उन्होंने चरखारी सीट से इस्तीफा देकर झांसी से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता था. चरखारी की हालत आज भी जस की तस है.

महोबा के रहने वाले पंकज सिंह परिहार बताते हैं कि यूपी के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने चरखारी को बुंदेलखंड के कश्मीर का नाम दिया था. वो यहां की कुदरती खूबसूरती से काफी प्रभावित थे.

लेकिन पंकज अफसोस जताते हैं कि किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में बुंदेलखंड में पर्यटन के विकास का जिक्र नहीं.

हिंदी की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मीबाई के बारे में मशहूर कविता-बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी, लिखी थी.

तो क्या झांसी की रानी, बाजीराव मस्तानी और आल्हा ऊदल के किस्से सिर्फ किताबों का हिस्सा रहेंगे और लोकगीतों में उनका जिक्र होता रहेगा? या फिर कोई सरकार बुंदेलखंड के विकास पर ध्यान देगी? यहां पर्यटन के विकास की कोशिश करेगी?

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