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उत्तरप्रदेश के मुसलमानों का असली नेता कौन?

ये सोचना की मुसलमान एकतरफा वोट करेगा और वही जीत की गारंटी है अब बेमानी हो गया है

Updated On: Jan 29, 2017 09:47 AM IST

Faisal Fareed

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उत्तरप्रदेश के मुसलमानों का असली नेता कौन?

दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी पूरे परिवार के साथ बीएसपी में शामिल हो गए. मायावती ने अपने घर पर उनको पार्टी में शामिल किया और परिवार को तीन टिकट भी दिए- सिबगतुल्लाह अंसारी, मुख़्तार अंसारी और उनके बेटे अब्बास अंसारी.

इन तीन टिकट के साथ बीएसपी ने इस चुनाव में मुसलमानों को टिकट देने के मामले में अपना शतक भी पूरा कर लिया. इस मौके पर पूर्व सांसद और मुख़्तार के भाई अफजाल अंसारी ने अखिलेश यादव को मुस्लिम विरोधी करार दिया लेकिन जो फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई उसमे अंसारी परिवार के सभी सदस्य मायावती के घर पर मौजूद थे लेकिन जूते उतार कर.

लोग जानते हैं कि मायावती के घर में सभी जूते उतार कर जाते हैं लेकिन तस्वीर वायरल होने से कमेंट आने शुरू हो गए. जो प्रभाव अंसारी बंधु ले कर आए थे वो धुंधला हो गया.

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बात सिर्फ मुख़्तार अंसारी की नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व की हैं. अगर राजनीतिक पार्टी ये समझ जाए कि मुसलमान अपने नेतृत्व के साथ हैं, तो तस्वीर ही दूसरी हो लेकिन सभी मुस्लिम नेता अपना प्रभाव तो दिखा देते हैं लेकिन ज्यादा लंबी दूर तक चल नहीं पाते हैं.

मुख़्तार का कद कितना बड़ा है

मुख़्तार अंसारी के बीएसपी में आने से फर्क पड़ेगा. बीएसपी को पूर्वांचल में खासकर गाजीपुर और मऊ जनपद में उसे मुसलमानों का वोट मिल सकता है. लेकिन, ऐसा भी नहीं हैं कि अंसारी बंधुओ के आने से सारे प्रदेश का मुसलमान अब बीएसपी को वोट करेगा.

यूपी का मुसलमान अपने नेता को लेकर हमेशा द्वंद में रहता है

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अगर ऐसा होता है तो मुख़्तार खुद 2012 में घोसी विधानसभा से एसपी से न हार गए होते. मुख़्तार चार बार के विधायक हैं. जेल से भी जीत चुके हैं. इनके भाई भी सांसद रह चुके हैं. सपा-बसपा दोनों पार्टी से इनका नाता रह चुका है. लेकिन हर बार चुनाव बाद इनको किनारे कर दिया जाता हैं.

जब विधानसभा सत्र चलता है तो मुख़्तार विधानसभा आते हैं. अत्यंत विनम्रता से सबसे बात करते हैं, लेकिन तब भी ये सभी मंत्रियो के पास जाकर अपने लेटरहेड पर काम देते हैं. खुद कई मंत्री उनके आने के समय हट जाते हैं. जाहिर है सब काम होते भी नहीं होंगे. अगर मुख़्तार अंसारी मुसलमानों के प्रदेश में नेता होते तो ऐसी तस्वीर न होती.

ज्यादा पुरानी बात नहीं हैं मुख़्तार के बेटे अब्बास अंसारी जो बहुत अच्छे निशानेबाज हैं और देश-विदेश में कई प्रतियोगिताएं जीत चुके हैं, उनके हथियार लाइसेंस के लिए गाजीपुर प्रशासन ने मना कर दिया था.

बात सिर्फ मुख़्तार की नहीं हैं. अतीक अहमद जो इस समय सपा में हैं और उनको कानपुर कैंट टिकट देने से मना कर दिया है, वो खुद भी हट गए. लेकिन बहुत कम सपा नेताओं को याद होगा कि भोपाल में जब सपा का अधिवेशन हुआ था तब ये कहा गया था कि मुलायम के पास चलने के लिए अच्छी गाड़ी नहीं हैं और इससे उनकी सुरक्षा को खतरा हैं. तब अतीक ने मुलायम को एक गाड़ी देने का एलान किया था.

अतीक अहमद की कितनी पकड़ है?

अतीक तब भी बाहुबली थे लेकिन तब सपा को उनकी जरूरत थी. आज वो साइडलाइन कर दिए गए हैं क्योंकि वो भी बाहुबली हैं, लेकिन मुसलमानों के नेता नहीं हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में अतीक श्रावस्ती से चुनाव लड़े थे, अपना भाई का नारा भी चला लेकिन उनके विरोध में दूसरे बाहुबली रिजवान जहीर भी लड़ गए. दोनों ही हार गए.

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यहां के मुसलमान नेता खुद भी राजनैतिक दलों के हाथ ठगे सा महसूस करते हैं

अगर अतीक अकेले नेता होते तो एकतरफा मुसलमान वोट ले जाते. रिजवान जहीर भी सपा में आने वाले थे, स्टेज बन चुका था लेकिन गेट से उनको वापस कर दिया गया.

कहना साफ है, मुख़्तार और अतीक से मुसलमानों को हमदर्दी हो सकती है क्योंकि उत्तरप्रदेश में हर समुदाय अपने बीच से अपने हीरो को चुन लेता है. चाहे वो नेता हो, अभिनेता, अधिकारी, खिलाडी या फिर बाहुबली ही क्यों न हो. लेकिन इनका प्रभाव सीमित रह जाता है. वो इनके साथ सेल्फी ले सकता हैं, इनके साथ अपनी फोटो शेयर करता हैं लेकिन वोट पूरी तरह नहीं देता हैं.

असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों के राष्ट्रीय नेता?

आप हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी को लीजिए. फैजाबाद के बीकापुर में उपचुनाव में भदरसा में एक मीटिंग हो रही थी. ओवैसी के आने से पहले लगभग 9000 लोग वहां पहुंच चुके थे. एकदम से आवाज आती है... देखो-देखो कौन आया, शेर आया शेर आया और ओवैसी हुजूम के साथ मंच पर आते हैं.

ओवैसी अपने भाषण पर खूब तालियां बटोरते हैं. लेकिन वोट लगभग 11,000 ही पाते हैं. ओवैसी राजनीतिक और मुसलमानों के मुद्दे बहुत जोर-शोर से उठाते हैं लेकिन अभी भी प्रदेश में मुसलमानों का वो समर्थन नहीं पा सके हैं जो वो चाहते हैं. जगह-जगह उनको रोक कर मुस्लिम युवा फोटो लेते हैं लेकिन ये वोट में तब्दील नहीं होते. ऐसे में सवाल उठता हैं कि फिर प्रदेश में मुसलमानों का नेता कौन है? किसकी आवाज पर वो वोट देते हैं.

उलेमा काउंसिल की दिक्कत

सपा के पास आजम खान के रूप में एक चेहरा हैं. भीड़ वो भी बटोरते हैं. फायर ब्रांड नेता हैं, जबरदस्त भाषण करते हैं और सपा को मुसलमानों का हमदर्द साबित कर देते हैं. प्रदेश में घूम-घूम कर मीटिंग करते हैं, लेकिन खुद अपने रामपुर में मुसलमानों की एक नहीं कर पाते हैं.

Muslims shout slogans as they take part in a rally demanding increase in allowances for clerics and opposing the Indian government's move to change the Muslim Personal Law, according to a media release, in Kolkata

मुसलमान मतदाता के मुद्दे भी आम वोटरों जैसे ही हैं

रामपुर में भी सपा को मात्र दो सीट मिली थी जिसमें एक उनकी खुद की थी. इधर ओवैसी से कुछ परेशान हुए तो कहने लगे कि मुसलमान को हैदराबाद की बिरयानी पसंद नहीं हैं. कुछ छोटे दल जैसे पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल भी हैं लेकिन सब के सब अपने हद तक सीमित हैं.

उलेमा काउंसिल आजमगढ़ में बनी है. जब बटला हाउस एनकाउंटर में आजमगढ़ के कुछ लड़के मारे गए, तब इसके सदर मौलाना आमिर रश्दी खुद बताते हैं कि वो मुसलमानों को समझा-समझा कर परेशान हो गए हैं. रश्दी जब वोट मांग रहे थे तो आजमगढ़ में उनसे एक मुस्लिम औरत ने कहा बाबू तुम भी मुसलमान हो...मुलायम भी मुसलमान, फिर मिल कर चुनाव क्यों नहीं लड़ते. जाहिर है रश्दी ने अपना सिर पीट लिया. बात मुस्लिम धर्मगुरुओं की भी करिए.

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जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी हर चुनाव में नई अपील के साथ आ जाते हैं. लेकिन 2012 में एसपी के पक्ष में अपील करने और सरकार बनवाने का दावा करने वाले बुखारी उसी चुनाव में अपने दामाद उमर को बेहट विधानसभा से सपा के चिह्न पर चुनाव नहीं जिता पाए.

मतलब आप समझ सकते हैं, मुसलमान को किसी एक नेता और वो भी मुसलमान फिलहाल प्रदेश में नहीं दिखता है. मुसलमान भले नारा चलाए कि पहले अपना भाई, फिर सपाई या बसपाई लेकिन आज भी वो आजमगढ़ में मुलायम को वोट दे देता हैं और बसपा के गुड्डू जमाली चुनाव हार जाते हैं जबकि नारा चला था, मुलायम तो जुनून हैं, गुड्डू जमाली अपना खून हैं.

मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न

इस नारे को ही मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न नहीं माना जा सकता. पिछले विधानसभा चुनाव में 26 सीटें ऐसी रही जहां मुसलमान कैंडिडेट हार गए और वजह सिर्फ एक रही, कई मुसलमान कैंडिडेट्स में बुरी तरह वोटों का बिखराव. इनमें कई सीट ऐसी भी थी जहां मुसलमान कैंडिडेट दूसरी से लेकर चौथी पोजीशन पर थे. तो मुसलमान किसकी आवाज पर वोट देता है?

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मुस्लिम युवा ये तय नहीं कर पाता है कि उसका नेता कौन है

मुसलमान की वोटिंग सिर्फ मुसलमान नेता या उनको ज्यादा टिकट देने से नहीं हो पाती हैं. वो भी वोट किसी दुसरे समुदाय की तरह देता हैं. मुद्दे उसके भी वही हैं, रोजगार, शिक्षा, बिजली, सड़क, पानी लेकिन पार्टियां मुसलमान को टिकट, रोज़ा-इफ़्तार, टोपी लगाकर अपना काम कर लेती हैं.

सिर्फ मुसलमान के नाम पर वोट नहीं मिलते मुसलमानों में भी जातिगत समीकरण बहुत हैं. पहले जहां सिर्फ शिया-सुन्नी का मसला रहता था वहीं इस बार देवबंदी-बरेलवी का मुद्दा बहुत जोरों पर हैं और अन्दर जायें तो तमाम जातियां जैसे तुर्क, कुरैशी, मलिक इत्यादि भी किसी न किसी विधानसभा में अपना असर डाल रही हैं.

जातिगत झगड़ों से मुसलमान अब अछूता नहीं रहा है. इसीलिए ये सोचना कि मुसलमान एकतरफा वोट करेगा और वही जीत की गारंटी है अब बेमानी हो गया है.

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