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भ्रष्टाचार के आरोप भर से कट गए थे बड़े कांग्रेसी नेताओं के टिकट

कभी नेताओं के खिलाफ आरोपों की जांच शुरू हो जाने मात्र से चुनावी टिकट कट जाते थे.

Updated On: Jan 22, 2017 09:36 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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भ्रष्टाचार के आरोप भर से कट गए थे बड़े कांग्रेसी नेताओं के टिकट

आजकल हर तरफ टिकटों की और टिकट मांगने वालों के काले दुर्दांत किस्सों की धूम है.

आजकल दागी अपराधी होना कोई खास बड़ी दिक्कत नहीं है. हर बड़ा नेता विनेबिलिटी की बात करता है. पर हमेशा ऐसा नहीं था. कभी नेताओं के खिलाफ आरोपों की जांच शुरू हो जाने मात्र से चुनावी टिकट कट जाते थे.

अब तो ऐसे अनेक उम्मीदवारों को भी टिकट पाने में कोई कठिनाई नहीं होती जिनके खिलाफ किसी अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं. कई दल तो खुलेआम कथित हत्यारों, घोटालेबाजों, हिस्ट्रीशीटरों और माफियाओं को डंके की चोट पर टिकट दे रहे हैं.

हर दल में दागी

राजनीतिक दल तर्क देते हैं कि जब तक किसी को सुप्रीम कोर्ट दोषी करार नहीं देता, तब तक वह अपराधी नहीं है. एक नेता तो यह भी कहा करते हैं कि हम बाघ के खिलाफ बकरी को तो खड़ा नहीं कर सकते.

यानी जब तक एक भी दल अपराधी को टिकट देता रहेगा, हम उसी तरह के लोगों को टिकट देंगे. पर इस स्थिति को बदलने के लिए  पहल कौन और कब करेगा? इस सवाल पर नेतागण बगलें झांकने लगते हैं. यहां अपराधी उसे कहा जा रहा है जिसे आम लोग अपराधी मानते हैं.

साफ छवि के लिए काटा गया था बड़े नेताओं का टिकट 

सन 1969 में बिहार के अपने सबसे बड़े छह नेताओं के टिकट कांग्रेस पार्टी ने काट दिए थे.

कारण यह था कि उनके खिलाफ 1967 में तत्कालीन गैर कांग्रसी महामाया सरकार द्वारा न्यायिक जांच आयोग गठित कर दिया गया था. उन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे.

उस अय्यर कमिशन की जांच रपट 1970 में आई. पर वे लोग 1969 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सके थे. टिकट से वंचित होने वालों में पूर्व मुख्यमंत्री के बी सहाय और पूर्व सिंचाई मंत्री महेश प्रसाद सिन्हा प्रमुख थे. अन्य पूर्व मंत्रियों में पूर्व शिक्षा मंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा और पूर्व लोक निर्माण मंत्री राम लखन सिंह यादव थे. दो राज्य मंत्री थे- अंबिका शरण सिंंह और राघवेंद्र नारायण सिंह.

उन दिनों कांग्रेस हाईकमान में कुछ ऐसे नेता थे जो स्वच्छ छवि के लोगों को आगे बढ़ाना चाहते थे.

उनके दिमाग में डॉ. राम सुभग सिंह का नाम था. उनकी स्वच्छ छवि थी.

तब सत्ताधारी दल भी रखते थे लोक-लाज का ख्याल

1969 में बिहार विधान सभा का मध्यावधि चुनाव साल के प्रारंभ में ही हो गया था. तब तक इंदिरा गांधी का पार्टी पर  वर्चस्व नहीं हुआ था. हालांकि प्रधानमंत्री वही थीं.

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इस संबंध में सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने अपनी जीवनी में लिखा है कि हमलोगों को टिकट से वंचित करने का उद्देश्य यह था कि बिहार कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए.

1969 के चुनाव के बाद सरदार हरिहर सिंह मुख्यमंत्री बने थे. उन पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं था.

यानी तब तक की कांग्रेस पार्टी भी लोक-लाज का ख्याल रखती थी.

आज तो कुछ गैर कांग्रेसी दल कथित भ्रष्ट व अपराधी उम्मीदवारों को टिकट देने में कांग्रेस से आगे चल रहे है.

जिन राज्यों में इन दिनों विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, उनके उम्मीदवारों की जन्मपत्री को सरसरी नजर से भी देख लेने से 1969 और 2017 के फर्क का पता चल जाएगा.

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