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सपा विवाद: ये सत्ता पर नहीं, पार्टी पर कब्जे की लड़ाई है

विवाद की असल जड़ पार्टी पर अखिलेश का मुलायम सिंह की सत्ता को चैलेंज करना है

Updated On: Jan 09, 2017 08:51 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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सपा विवाद: ये सत्ता पर नहीं, पार्टी पर कब्जे की लड़ाई है

अमर सिंह कह रहे हैं, ‘मैं खलनायक नहीं हूं’. शिवपाल कह रहे हैं, ‘मुलायम भइया ही पार्टी के सर्वेसर्वा हैं’. रामगोपाल कह रहे हैं, ‘अखिलेश यादव ही पार्टी के वास्तविक राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं’. अखिलेश यादव कह रहे हैं, ‘मैं पहले पिताजी की इज्जत करता था, अब और ज्यादा करता हूं. लेकिन बता देना चाहता हूं कि वो गलत लोगों से घिरे हुए हैं’.

इन सारे बयानों में एक बात साफ है. सभी अपने बयान में नेताजी पर सीधे वार नहीं करना चाहते हैं. सब उन्हें अच्छा बता कर एक-दूसरे पर तलवार निकाले हुए हैं. लेकिन मुलायम सिंह की राजनीति को जानने वाले ये आसानी समझ सकते हैं कि विवाद की असली जड़ वो नहीं है जो दिखाई दे रही है. यानी ये झगड़ा सिर्फ अखिलेश-रामगोपाल और अमर-शिवपाल के बीच का नहीं है.

इस विवाद पर आम राय यही बन रही है कि अखिलेश यादव पार्टी के गलत लोगों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. वे गुंडातंत्र और भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं. वे अपने भाषणों में ऐसे बात करते हैं जैसे पार्टी में सारे गुंडों को उनके चाचा शिवपाल ने संरक्षण दे रखा है और अमर सिंह परिवार में तिकड़मी दांवपेच लगाकर सभी को एक-दूसरे से लड़वा रहे हैं.

रामगोपाल यादव खुद को अखिलेशवादी बताकर पाक-साफ बताने की कोशिश में जुटे हैं. वे बताते नहीं थकते कि वर्तमान राजनीति के मर्म को पुत्र अखिलेश पिता मुलायम से बेहतर समझते हैं.

Akhilesh Yadav

अखिलेश ने दिखाई ताकत तो बिदके मुलायम

लेकिन इन सबसे साफ महसूस हो रहा है कि साढ़े चार मुख्यमंत्रियों की संज्ञा दिए जाने वाले प्रदेश में अखिलेश जैसे-जैसे अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं, मुलायम सिंह की छटपटाहट बढ़ रही है. मुलायम सिंह की दिल्ली से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली की दौड़ यूं ही नहीं है.

ऐसा लग रहा है सबकुछ उनके हाथ से छूटा जा रहा है और वो ये सब किसी तरह समेट लेना चाहते हैं. मुलायम सिंह ये दुहाई देते नहीं थक रहे कि बेटे ने बाप को धोखा दिया. मुलायम सिंह का रुदन देखकर समझा जा सकता है कि वे शिवपाल के अपमान से नहीं बल्कि अपने अपमान से दुखी हैं. अंग्रेजी के कवि वर्ड्सवर्थ की 'चाइल्ड इज फादर ऑफ मैन' की उक्ति बिल्कुल सही सिद्ध होती दिख रही है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह का इस पर कहना है, ‘देखिए यह सच है कि रामगोपाल और शिवपाल-अमर का विवाद पहले भी रहा है. लेकिन हालिया मामले की शुरुआत बलिया से लखनऊ एक्सप्रेस वे को लेकर शुरु हुआ. अखिलेश इसके आवंटन को लेकर इन दोनों के खिलाफ थे. कहा जाता है कि रामगोपाल यादव ने ही तब अखिलेश को यह समझाया कि पार्टी पर पकड़ बनाना जरूरी है. अखिलेश को लग रहा था कि शिवपाल और अमर का दखल सरकार में भी बढ़ रहा है. ’

प्रदीप सिंह कहते हैं,  ‘अखिलेश और रामगोपाल को एक टारगेट चाहिए था. पार्टी पर वर्चस्व की लड़ाई में वो एक सीमा से ज्यादा शिवपाल पर हमला नहीं कर सकते थे. यहीं से टारगेट में अमर सिंह आ गए. दूसरे उन्हें यह भी लगता है कि मुलायम जो कुछ कर रहे हैं उसके पीछे अमर का हाथ है.'

सिंह बताते हैं कि 2012 में जब सपा ने विधानसभा चुनाव जीता था तो इटावा में परिवार की बैठक हुई. शिवपाल चाहते थे कि 2014 के लोकसभा चुनावों तक मुलायम सिंह सीएम रहें और फिर उसके बाद अखिलेश यादव को कुर्सी दी जाए. लेकिन रामगोपाल का कहना था कि अखिलेश को अभी ही सीएम बनाया जाए. मुलायम सिंह बनाना भी चाहते थे तो बना दिया गया. यहां से भी रामगोपाल और शिवपाल में एक टर्फ वॉर की शुरुआत हुई.

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रामगोपाल और शिवगोपाल में पुराने हैं मतभेद

शिवपाल और रामगोपाल के बीच का विवाद तो पुराना है. कहा जाता दोनों में ही एक दूसरे के प्रति राजनीतिक मतभेद काफी पहले से रहे हैं. लेकिन हालिया विवाद में मुलायम सिंह यादव को शिवपाल ये समझाने में कामयाब रहे कि उनके खिलाफ असली साजिश तो रामगोपाल रच रहे हैं. अखिलेश तो सिर्फ रामगोपाल के मोहरे भर हैं. मुलायम के बयानों में यह दर्द उभरकर सामने भी आ रहा है.

इस पर प्रदीप सिंह कहते हैं,  ‘रामगोपाल और अखिलेश नहीं चाहते थे कि अमर पार्टी में वापस आएं. उन्हें पार्टी में दोबारा वापस लाने में शिवपाल का हाथ है. लेकिन ये पूरा सच नहीं है कि शिवपाल ही अमर को पार्टी में अपनी मर्जी से लाए. दरअसल कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह जो कराना चाहते हैं वो शिवपाल के जरिए कराते हैं. अब शिवपाल को जितने बड़े विलेन के रूप में पेश किया जा रहा है उतने बड़े विलेन वो हैं नहीं. वो वही करते हैं जो उनसे मुलायम सिंह कराना चाहते हैं.'

प्रदीप आगे जोड़ते हैं, 'अभी दो-तीन महीने की बात छोड़ दें तो मुलायम सिंह की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं होता था. न सरकार में और न पार्टी में. अखिलेश को लगा कि मुलायम सिंह की अथॉरिटी को चैलेंज करना है, तो ये दो रेडिमेड विलेन थे. अब देखिए वर्तमान समय में अखिलेश के सबसे बड़े सलाहकार रामगोपाल हैं. पिछले सालभर से वो उन्हें समझा रहे हैं कि पार्टी पर अभी कब्जा करो. मुख्यमंत्री तो आप बन चुके हैं लेकिन अगर चुनाव हार गए तो पार्टी पर कोई प्रभाव नहीं बचेगा और अगर पार्टी पर प्रभाव जमाना है तो मुलायम की सत्ता को चैलेंज करना होगा.’

लब्बोलुआब यह है कि आम निगाह में यह भले ही महसूस होता हो कि ये सत्ता संघर्ष है लेकिन ये पूरी लड़ाई पार्टी पर संघर्ष की चल रही है. जब तक अखिलेश आज्ञाकारी पुत्र बने रहे पार्टी में कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन जैसे-जैसे वो पांव पसार रहे हैं मुलायम के लिए चादर छोटी पड़ती जा रही है. उन्हें लग रहा है उनका रसूख घट रहा है. लेकिन मुलायम सिंह ने कुश्ती भले ही छोड़ दी हो लेकिन तेवर पूरी तरह से बने हुए हैं.

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