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जब विश्वास, नीति और सिद्धांत के साथ चुनाव लड़ते थे नेता

नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेता देश बनाने के लिए चुनाव लड़ते थे.

Updated On: Jan 28, 2017 03:10 PM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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जब विश्वास, नीति और सिद्धांत के साथ चुनाव लड़ते थे नेता

आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राम मनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय देश बनाने के लिए चुनाव लड़ते थे. आज जब अधिकतर नेता निजी संपत्ति, वंश और अपनी जाति को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं तो वे पुराने नेता चुनाव के वक्त कुछ अधिक ही याद आते हैं.

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के 13 सदस्य 1946 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए थे.

Narendra-Dev

उनमें शीर्ष नेता व विचारक आचार्य नरेंद्र देव भी थे. 1934 में गठित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी आजादी की लड़ाई के दिनों कांग्रेस के ही अंदर रह कर काम करती थी. जयप्रकाश नारायण भी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक नेताओं में प्रमुख थे.

1947 में आजादी मिलने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं से कहा कि आप या तो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता छोड़ दें या कांग्रेस छोड़ दें.

आचार्य नरेंद्र देव और उनके साथियों ने कांग्रेस छोड़ दी, जबकि कांग्रेस 1946 में आचार्य जी को उत्तर प्रदेश की अंतरिम सरकार में मंत्री बनाना चाहती थी.

आचार्यजी और उनके 12 साथियों ने नैतिकता के आधार पर उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता छोड़ दी क्योंकि वे कांग्रेस के टिकट पर चुने गये थे. उपचुनाव लड़े. सभी हार गए. हालांकि पहले ही आचार्यजी से लोगों ने कहा था कि कांग्रेस की हवा है. उपचुनाव नहीं जीत पाएंगे इसलिए विधायकी छोड़ने की कोई मजबूरी भी तो नहीं है.

पर आचार्यजी और उनके साथी विधायक नहीं माने.

इतना ही नहीं, उपचुनाव में उनके राजनीतिक विरोधियों ने यह प्रचार कर दिया था कि आचार्यजी नास्तिक हैं. इन्हें वोट मत दीजिए. आचार्यजी ने इस प्रचार का खंडन तक नहीं किया. क्योंकि वे नास्तिक थे ही. नतीजतन आचार्यजी बाबा राघव दास से चुनाव हार गए.

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आचार्यजी समाजवादी विचाारधारा के वही विद्वान स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के कहने पर इंदिरा गांधी के दो पुत्रों का नामकरण किया था-राजीव और संजय. जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी आॅफ इंडिया लिखने में आचार्य जी से भी मदद ली थी.

डॉ राम मनोहर लोहिया ने जब फूलपुर से 1962 में जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया तो उन्हें कुछ लोगों ने कहा कि क्यों चट्टान से टकराने जा रहे हैं? किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ कर लोकसभा में पहुंचिए.

Lohia

डॉ लोहिया ने कहा था कि नेहरू के खिलाफ मेरे चुनाव लड़ने से हमारी पार्टी और विचारधारा का प्रचार होगा, क्योंकि दुनिया भर के प्रेस की नजर वहां रहेगी. चट्टान को मैं भले तोड़ नहीं पाऊंगा ,पर उसमें दरार तो डाल ही दूंगा. यही हुआ भी. फूलपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में से दो में लोहिया से नेहरू हार गए थे.

चुनाव प्रचार के दौरान ‘टाइम’ मैगजीन ने लिख दिया था कि लोहिया नेहरू वंश के ही विरोधी हैं. लोहिया ने अमेरिकी पत्रिका पर मानहानि का मुकदमा कर दिया. लोहिया ने कहा कि मैं नेहरू वंश के खिलाफ नहीं हूं बल्कि मैं नेहरू की नीतियों के खिलाफ हूं.

इतना ही नहीं.  सन 1967 में तो लोहिया ने सिद्धांतवादिता की हद कर दी.

वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे. उस क्षेत्र में मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी है. किसी पत्रकार ने तब समान नागरिक संहिता पर लोहिया से उनकी राय पूछ दी. लोहिया ने कह दिया कि वह तो संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में है. उसे तो लागू होना ही चाहिए.

डॉ लोहिया का यह बयान प्रमुखता से छपा. कुछ समाजवादियों ने कहा कि अब तो आप चुनाव हार जाएंगे क्योंकि कन्नौज में मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं. लोहिया ने जवाब दिया, ‘मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति में नहीं हूं. मैं देश बनाने के लिए राजनीति में हूं.’ लोहिया चुनाव हारते- हारते सिर्फ चार सौ वोट से जीते.

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चुनाव के बारे में जनसंघ के विचारक नेता दीनदयाल उपाध्याय की धारणा जानने के बाद आज के अधिकतर नेताओं व दलों को शर्म आनी चाहिए.

DeenDayalUpadhyay

उत्तर प्रदेश के जौनपुर से उपाध्याय 1963 में लोकसभा का उप चुनाव लड़ रहे थे. किसी स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता ने उनसे कहा कि यदि आप अपनी जाति के मतदाताओं से व्यक्तिगत तौर से अपील करें तो आप चुनाव जीत सकते हैं. उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

नतीजतन वह चुनाव हार गए.

दरअसल जवाहरलाल नेहरू के कारण ब्राह्मण वोट कांग्रेस के वोट बैंक का बड़ा हिस्सा था. लेकिन उपाध्याय जी अपने दल के लिए कोई जातीय वोट बैंक नहीं बनाना चाहते थे.

इन दिनों जी-जान से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भिड़े अधिकतर राजनीतिक दलों और नेताओं से तो यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे नरेंद्र देव, लोहिया और उपाध्याय के पदचिह्नों पर चलेंगे. हां, नई पीढ़ी के आदर्शवादी मतदातागण ऐसा प्रयास जरूर कर सकते हैं. ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को ताकत देकर जो उन आदर्शों पर चलने की कोशिश कर रहे हैं.

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