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यूपी चुनाव: मुस्लिम वोट को लेकर इतना कंफ्यूजन क्यों है?

अखिलेश और मायावती में किसी एक को मुस्लिम एकतरफा वोटिंग नहीं करने जा रहे हैं.

Amitesh Amitesh Updated On: Feb 17, 2017 09:48 AM IST

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यूपी चुनाव: मुस्लिम वोट को लेकर इतना कंफ्यूजन क्यों है?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर चर्चा हो रही है वो है मुस्लिम वोट. यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की तादाद लगभग 20 फीसदी के आसपास है और इस लिहाज से इनका किसी एक पार्टी की ओर जाना पूरे समीकरण को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन और बीएसपी की नजर इन्हीं वोटरों पर है. हैदराबाद के सांसद असद्दुद्दीन ओवैसी से लेकर बरेलवी तौकीर रज़ा और पीस पार्टी तक मुस्लिम वोट तक पैठ बनाने की कोशिश में हैं.

बस बीजेपी इस होड़ से पूरी तरह बाहर है. पार्टी ने न ही किसी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार बनाया है और न ही मुस्लिम समुदाय के मतदाता इस चुनाव में बीजेपी के साथ खड़े दिख रहे हैं.

मुस्लिमों को ये साथ पसंद है!

पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी लहर में सारी पार्टियों का सूपड़ा साफ हो गया था. मुलायम सिंह यादव केवल अपना कुनबा बचाने में सफल हो पाए थे, लेकिन, बीएसपी का तो खाता तक नहीं खुल पाया था.

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लेकिन, हकीकत में लोकसभा चुनाव के वक्त लगभग 20 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत सका. यही बात मुस्लिम समुदाय के लोगों को नागवार गुजर रही है.

UP CM Akhilesh elected Samajwadi party national president

मुस्लिम समुदाय के सामने एक बड़े विकल्प के रूप में अपने-आप को खड़ा करने में अखिलेश सफल रहे हैं.

अपने परिवार के झगड़े के बाद पार्टी के मुखिया बने अखिलेश को लगने लगा कि पांच साल के एंटी-इंकंबेंसी के बाद अपने-आप को रेस में बनाए रखने के लिए हाथ का साथ जरूरी है. अखिलेश ने राहुल का हाथ पकड़ा और राहुल ने साईकिल की हैंडल.

यह अखिलेश की मजबूरी ही थी जिसने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर मजबूर कर दिया. लेकिन, इस गठबंधन के जरिए मुस्लिम समुदाय के सामने एक बड़े विकल्प के रूप में अपने-आप को खड़ा करने में अखिलेश सफल रहे.

पश्चिमी यूपी से लेकर अवध क्षेत्र तक का दौरा करने के बाद लग रहा है कि अखिलेश की यह रणनीति काफी हद तक कारगर रही. मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद तो अखिलेश ही हैं. बलरामपुर क्षेत्र में अपना कारोबार करने वाले जाकिर हुसैन कहते हैं कि हम तो साईकिल को ही वोट करेंगे.

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गोंडा क्षेत्र में मोबाइल की दूकान चलाने वाले दिलशाद भी कहते हैं कि ‘हम तो साईकिल को ही वोट करेंगे. अखिलेश ने सही काम किया है.’

कुछ यही हाल बस्ती का भी है. बस्ती के रूधौली क्षेत्र के एक गांव में रहने वाली वहीदा खातून कहती हैं कि हम तो साईकिल को ही वोट देंगे. ‘अखिलेश ने तो समाजवादी पेंशन योजना शुरु किया है. इससे हमको फायदा हुआ है हम उन्हीं के साथ हैं.’

पार्टी के भीतर बेटे से लड़ाई हार चुके मुलायम सिंह यादव भी एक बार फिर से इस मुद्दे पर अपने पुराने रंग में दिखने लगे हैं. समाजवादी मुलायम कह रहे हैं कि हमने मस्जिद बचाने के लिए गोलियां चलवाई थीं. साफ है किस तरह सपा मुस्लिम वोटरों के लिए हर हथकंडे अपना रही है.

माया का दांव कितना कारगर?

अकेले अखिलेश ही मुस्लिम वोटों के सौदागर नहीं हैं. इस बार के चुनाव में मुस्लिम वोटों की सबसे बड़ी सौदागर बनकर उभरी हैं मायावती. माया ने 403 में से 99 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर सबसे बड़ा दांव चला है.

mukhtar mayawati

मुख्तार अंसारी के बीएसपी के साथ आने के बाद पूर्वांचल में मुस्लिम वोटरों का रूझान बीएसपी की तरफ बढ़ा है.

बीजेपी के साथ मिलकर तीन-तीन बार यूपी में सरकार बना चुकी मायावती हर मंच से बीजेपी के साथ नही जाने को लेकर सफाई देती फिर रही हैं. मायावती को शाही इमाम बुखारी का समर्थन भी मिल गया है. भले ही इस तरह के समर्थन का अब कोई मतलब नहीं रह गया हो लेकिन सांकेतिक रूप से ही सही इसको भुनाने की कोशिश मायावती की तरफ से हो ही रही है.

माया का दांव भी काफी हद तक कारगर साबित हो रहा है. जहां-जहां बीएसपी के मुस्लिम उम्मीदवार हैं वहां मुस्लिम बीएसपी की तरफ भी जा रहे हैं. उन्हें लगता है कि इस बार दलित वोट बैंक के साथ अगर मुस्लिम वोट बैंक मिल जाए तो सीट बीएसपी के खाते में जा सकती है. मकसद तो बस बीजेपी को ही हराना है.

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बहराइच के भोपतपुर गांव के रहने वाले डॉ. बच्चन कहते हैं कि ‘बीएसपी के पास पहले से दलित वोट है, अगर इस बार मुस्लिम उम्मीदवार को मुस्लिम वोट मिल जाए तो उन जगहों पर बीएसपी की सीट निकल जाएगी.’

बीएसपी ने जिन जगहों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं, उन जगहों पर मुस्लिम बीएसपी के साथ खड़े दिख रहे हैं. गोंडा जिले की 4 सीटों पर बीएसपी ने इस बार मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

इन इलाकों में जाने के बाद ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम इन सभी चारों सीटों पर बीएएसपी के साथ जा सकते हैं. लेकिन, उन्हें डर भी सता रहा है कि कहीं बीएसपी और एसपी के बीच वोटों का बंटवारा न हो जाए.

मुख्तार अंसारी के बीएसपी के साथ आने के बाद पूर्वांचल इलाके में मुस्लिम वोटरों का रूझान बीएसपी की तरफ बढ़ा है.

साफ लग रहा है कि इस बार मायावती के मुस्लिम कार्ड ने मुसलमानों के बीच कंफ्यूजन ज्यादा बढ़ा दिया है.

और भी कई हैं सौदागर

मुस्लिम वोटों के और भी कई सौदागर मैदान में हैं जो कि अपने-अपने हिसाब से इस बार दावे कर रहे हैं. एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भी मुस्लिम बहुल इलाकों में अपना उम्मीदवार उतारा है.

asaduddin owaisi

असद्दुद्दीन ओवैसी से लेकर बरेलवी तौकीर रज़ा और पीस पार्टी तक सबकी अपनी-अपनी नजर मुस्लिम वोट पर बनी हुई है.

बरेली और आसपास के इलाकों में आईएमसी के तौकीर रजा और कई दूसरे इलाकों में पीस पार्टी के उम्मीदवार भी ताल ठोंक रहे हैं. लेकिन, मुस्लिम मतदाताओं के बीच इनकी छवि वोटकटवा से ज्यादा कुछ भी नहीं दिख रही.

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रणनीति के तहत करेंगे वोटिंग!

अक्सर ये कहा जाता है कि मुस्लिम मतदाता उसी पार्टी को वोट करेंगे जो बीजेपी को हराने की हालत में होगी. अलग-अलग सीटों पर अलग-अलग तरह के रुझान से साफ लग रहा है कि अखिलेश और मायावती में किसी एक को मुस्लिम एकतरफा वोटिंग नहीं करने जा रहे हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े प्रदेश से अपना एक भी प्रतिनिधि नहीं चुना जाना उन्हें अंदरखाने कचोट रहा है, जो कि बातचीत के दौरान खुलकर बाहर भी आ जाता है. तभी तो उनकी तरफ से ये कहा जा रहा है कि 'पहले भाई फिर सपाई.'

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