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यूपी चुनाव 2017: मेरठ में और भी गम हैं हिंदू-मुस्लिम वोट के सिवा

अब मेरठ सड़कों पर फैली बदहाली की वजह से जाना जाता है.

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Feb 11, 2017 10:36 AM IST

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यूपी चुनाव 2017: मेरठ में और भी गम हैं हिंदू-मुस्लिम वोट के सिवा

मेरठ शायरों का शहर है. एक वक्त था जब मेरठ और उसका इर्दगिर्द का इलाका दंगों और अपराध की वजह से जाना जाता था. अब मेरठ सड़कों पर फैली बदहाली की वजह से जाना जाता है.

पुरानी बस्ती में घंटों जाम लगना आम बात है. हाशिमपुरा के आसपास की बस्ती में गंदगी का अंबार और बदइंतजामी नाक और आंख दोनों के लिए तकलीफदेह है, पर चुनाव के माहौल में यह एक मुद्दा नहीं है.

अखिलेश यादव का ‘काम बोलता है’, यहां पर क्रूर मजाक लगता है, पर सांप्रदायिकता में बंटे समाज के लिए यह मुद्दा नहीं है. आमतौर पर मुसलमान वोटरों के लिए अखिलेश अच्छे नेता हैं. क्यों हैं?

इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. मलियाना, हाशिमपुरा के अपराधियों को सजा नहीं हुई, तो क्या हुआ? अखिलेश के बारे में दावा है कि वो मुसलमानों के लिए काम करेंगे. क्या करेंगे? इसका पता नहीं. अलबत्ता बीजेपी को हराना ही एक मकसद है.

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विकास नहीं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के भरोसे नेता

कमोबेश यही स्थिति हिंदू बाहुल्य जगहों में है. मुसलमान अपराधियों का आतंक है. लड़कियों से छेड़खानी की घटनाएं आम हो गई हैं. आरोप यह है कि छेड़खानी में लिप्त ज्यादातर मुसलमान लड़के होते हैं. लिहाजा इन इलाकों में ध्रुवीकरण मुसलमानों के विरोध में है.

नए इलाकों में साफ-सफाई अपेक्षाकृत बेहतर है, पर रोड और अन्य नागरिक व्यवस्था काफी खराब है. बीजेपी के लिए वोट की आस सिर्फ सांप्रदायिकता के ज्वार पर है. पार्टी का वोट बढ़ेगा अगर ध्रुवीकरण बढ़ता है.

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मेरठ में और पश्चिम उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में शनिवार को मतदान होगा. चुनावी कहानी इस पूरे इलाके में लगभग एक जैसी ही है. किसी भी इलाके में जाएं. कहानी एक ही तरह की है. हकीकत तो यह है कि लगभग तीन दशक से इस इलाके की राजनीतिक कहानी एक ही प्लाट के इर्दगिर्द घूम रही है.

नेता इसी कहानी पर वोट मांगते रहे हैं और जनता भी इस कहानी को सुनते-सुनते इतनी अभ्यस्त हो गई है कि और विषय पर ध्यान ही नहीं देती. मेरठ जैसे शायर मिजाज शहर के लिए यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने अपने महबूब से शिकवा करते हुए कहा था, ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग.’

जाहिर है शायर समाज में फैली गरीबी और बदहाली से ज्यादा बावस्ता था. शायद मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का वोटर भी वोट मांगते हुए नेताओं से फैज़ जैसी साफगोई से बोल सकता है, ‘और भी गम हैं जमाने में एक वोट के सिवा.’

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