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यूपी चुनाव 2017: हर वोट कीमती है तो चुनाव बहिष्कार को सीरियसली लीजिए

चुनाव आयोग कहता है मतदान जरूर करे ऐसे में चुनाव बहिष्कार को गंभीरता से लेना जरूरी है

Updated On: Mar 03, 2017 08:09 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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यूपी चुनाव 2017: हर वोट कीमती है तो चुनाव बहिष्कार को सीरियसली लीजिए

यूपी का चुनाव अपने छठे चरण की तरफ बढ़ चला है. हर चरण की वोटिंग खत्म होते ही सिर्फ एक खबर हर तरफ घूमने लगती है कि रिकॉर्ड वोटिंग हो रही है. लोग जोर देकर कहते हैं कि पिछले बार से ज्यादा मतदान हुआ है.

रिकॉर्ड वोटिंग होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है. लेकिन इस वोटिंग प्रतिशत के बीच उन गिने-चुने लोगों की आवाज दब जाती है जिन्होंने चुनाव का बहिष्कार किया है. हालांकि, यह संख्या इतनी छोटी भी नहीं है कि इसे बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाए.

कई जगहों से आई खबरें

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अभी तक अलग-अलग चरणों में सीतापुर में भिठौली, पतौंजा, बसेती, आम्बा, महमूदाबाद केसरीपुर गांवों में कई बूथों के अलावा ललितपुर में महरौनी विधानसभा क्षेत्र के गदनपुर गांव के मतदाताओं ने ही नहीं बल्कि, इसके साथ ही बारचोन, बमराना, सकतु, बुदनी, गदनपुर गांवों के बूथों, जालौन जिले के मंडोरी गांव, आगरा के डुडूकरा गांव से चुनाव बहिष्कार की खबरें आईं.

इसके अलावा बुलंदशहर में रतनपुर-परवाना, बरमदपुर-बागवाल समेत नौ गांवों ने चुनाव बहिष्कार किया. हरदोई में सुनासी बढ़िया गांव. फतेहपुर की खागा विधानसभा में बूथ नंबर 105 और 106 पर पर चुनाव बहिष्कार की खबरें आयी हैं.

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कन्नौज की तिर्वा विधानसभा का एक गांव...जिला बांदा, ब्लॉक नरैनी, ग्राम पंचायत कुलशारी, मजरा बलदेव पुरवा में वोट नहीं डाला गया. उत्तराखंड के सोमेश्वर के भेटा वडसिला गांव में चुनाव बहिष्कार किया गया. प्रतापगढ़ के झिंगुरा थानाभवन विधानसभा में नोनांगली गांव भी इस तरह के बहिष्कार में शामिल हैं.

हजारों की संख्या में लोग कर रहे है वोट का बहिष्कार

ऊपर दिए गए नाम बानगी हैं. सारी जगहों की लिस्ट नहीं दी जा सकती. लेकिन यह बेहद त्रासद है कि जब यूपी में काम बोलता है जैसे नारों की वजह से अखिलेश यादव प्रदेश में अपनी छवि चमकाने में लगे हैं तो ठीक उसी समय उनके राज्य के हजारों की संख्या में लोग वोट का बहिष्कार कर रहे हैं.

आप अंदाजा लगाइए कि वही एक दिन था जिस दिन वोटर अपनी ताकत दिखा सकता था. इन गांव के लोगों ने अपनी तकलीफों को लेकर बहिष्कार किया और ताकत दिखाने की कोशश भी की. लेकिन शायद ही कोई उम्मीदवार इन लोगों की तकलीफ सुनने गया हो. हां, जिला प्रशासन की तरफ से चुनाव बहिष्कार करने वालों को नसीहत जरूर मिलती है कि अगर अपनी ताकत दिखानी है तो वोट देकर दिखाइए.

ज्यादा दिन नहीं जब 11 मार्च भी आ जाएगा. चुनाव के नतीजे आने के बाद चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बने लेकिन एक बात तय है कि चुनाव का बहिष्कार करने वालों को कोई याद नहीं रखेगा. शायद ही कोई उनसे इस लोकतांत्रिक पर्व में असहमति का कारण पूछेगा

लेकिन क्या इसे राजनीतिक रूप से इतनी सहजता के साथ लिया जाना चाहिए? संवैधानिक रूप से इस देश में अब नोटा का अधिकार जनता के पास मौजूद है. लेकिन चुनाव बहिष्कार का कदम निश्चित रूप से कोई तभी उठाता होगा जब उसे लगता होगा कि शायद इसके जरिए उसकी बात सुनी जाएगी. नेताओं को रिएक्शन देखकर तो ये कतई नहीं लगता कि अभी तक कोई भी बड़े स्तर का नेता इसे सीरियसली ले रहा है.

2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ था नोटा का इस्तेमाल

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2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल 1.1 प्रतिशत यानी 60 लाख वोटरों ने किया. यानी पूरे देश के चुनाव में साठ लाख लोग ऐसे भी थे जिन्हें कोई भी राजनीतिक पार्टी पसंद नहीं थी.

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लेकिन कमाल की बात ये है कि नोटा का इस्तेमाल करने वाले लोगों का डेटा तो आ जाता है लेकिन चुनाव बहिष्कार का कोई डेटा नहीं आता. चुनाव बहिष्कार करने वाले लोग अनाम ही रह जाएंगे न ही उनका कोई आकड़ा कभी सामने आएगा.

राज्य या केंद्र में बैठे लोगों को कम से कम इस बात की व्यव्सथा तो जरूर करवानी चाहिए कि जो लोग चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं, उनकी सुध जरूर ली जाए. इसका कारण भी है. दरअसल चुनाव बहिष्कार में ज्यादातर स्थानीय समस्याओं के लिए स्लोगन दिखाई दिए.

मतलब लोगों का गुस्सा स्थानीय प्रशासन पर है न कि केंद्र या राज्य सरकार के खिलाफ. यानी ये चुनाव बहिष्कार माओवादियों द्वारा नहीं किया गया है जो लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया में भरोसा ही नहीं करते.

इन चुनाव में जो लोग बहिष्कार कर रहे हैं, वो चुनाव प्रक्रिया और सरकार में भरोसा करते हैं. इसलिए सरकार को भी इनकी सुध लेनी चाहिए.

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