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यूपी चुनाव: और अब बारी है बाहुबलियों की...

मतदान का मौसम पश्चिमी उत्तरप्रदेश से होता हुआ पूर्वी अंचलों तक आ पहुंचा है.

Nazim Naqvi Updated On: Feb 22, 2017 08:28 AM IST

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यूपी चुनाव: और अब बारी है बाहुबलियों की...

खिसकते-खिसकते ईवीएम की मशीनें अब आ पहुंची हैं उन इलाकों में जहां बाहुबलियों का जोर है.

मतदान का मौसम पश्चिमी उत्तरप्रदेश से होता हुआ पूर्वी अंचलों तक आ पहुंचा है. हरिशंकर तिवारी, अतीक़ अहमद, ब्रजेश सिंह, राजा भैया, मुख्तार अंसारी और धनंजय सिंह ये महज नाम नहीं हैं, यह इन इलाकों में कानून की किताबें हैं. ये सलाखों के पीछे हों या बाहर, चुनाव में खड़े हों या नहीं, अपने इलाके के चुनावों में इनका असर और इनकी नजर हर बटन दबाने वाली उंगली पर होती है.

इन्हें कानून के रिकॉर्ड में कानून का दुश्मन समझा जाता है, फिर भी ये विधानसभा में पहुंचकर उसी जमात का हिस्सा बन जाते हैं, जो प्रदेश की व्यवस्था चलते हैं, कानून बनाते हैं. खौफ के ये चेहरे हर जाति में हैं, हर दल में हैं. क्या आपको नहीं लगता कि सियासत के खिलाड़ी अपनी बाजी जीतने के लिए लोकतंत्र को जुर्म की भट्टी में झोंकने का काम कर रहे हैं?

इनसे बाहुबलियों से परहेज करना मुश्किल है. हर सौ और दो सौ किलोमीटर पर ऐसे बाहुबली अपना जाल बिछाए बैठे हैं. जिस तरफ रूख कीजिए उस तरफ मील के पत्थर के साथ साथ बाहुबली भी बदलते रहते हैं.

17 फीसदी उम्मीदवार आपराधिक छवि वाले

अपराधी मुक्त राजनीतिक दलों की तो कल्पना भी करना मुहाल है. राजनीति में अपराध खत्म करने की सारी कवायद इन आंकड़ों पर आकर इतिश्री कर लेती है कि ‘अपराधी उम्मीदवारों में कितना इजाफा हुआ है या कितनी कमी आई है.'

उत्तरप्रदेश के इन चुनावों में, लोकतांत्रिक सुधारों के लिए समर्पित संस्था ‘एडीआर’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘चौथे चरण के 12 जिलों में होने जा रहे मतदान में 17 प्रतिशत यानी 116 उम्मीदवार आपराधिक छवि वाले हैं. इनमें से 95 उम्मीदवार गंभीर अपराधों में लिप्त हैं.'

23 तारीख को होने वाले मतदान में 21 निर्वाचन क्षेत्र तो ऐसे हैं जिन्हें अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना गया है. संवेदनशीलता मानने का पैमाना है, ऐसे क्षेत्र जहां तीन या तीन से अधिक गंभीर आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार चुनाव में प्रत्याशी हैं.

राजा भैया (प्रतापगढ़) के इलाके में मशहूर है कि 'कुंडा में रहना है तो राजा भैया कहना है'.'

राजा भैया अखिलेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

राजा भैया अखिलेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

बसपा जैसी पार्टी जो हाथी के पैर से गुंडों को कुचलने का दम भरती है, बदली हुई परिस्थितियों में मुख्तार अंसारी के घरवालों को अपना चुनाव चिह्न देकर मैदान में उतारती है. यही नहीं मायावती बड़े फख्र से मुख्तार अंसारी को रॉबिनहुड कहती हैं. मऊ के लोग तो कहते ही थे, अब तो खुद मायावती मुख्तार अंसारी को रॉबिनहुड का खिताब दे चुकी हैं.

आखिर कैसे बनता है बाहुबली

अक्सर गुंडों और बाहुबली में फर्क करना, हम भूल जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि दोनों ही खौफ का पर्याय हैं. दरअसल हमारी व्यवस्था का ताना-बाना ऐसा है कि गुंडों पर तो काबू पाया जा सकता है, उन्हें किसी हद तक हाशिये पर भी लाया जा सकता है लेकिन बाहुबलियों का मुकाबला करने में हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, कम से कम अभी तक तो नाकाम साबित हुई है. इन्हीं स्थितियों से उठता है ये सवाल, कि ऐसा क्यों है?

इस सवाल पर ‘बनारस बार एसोसिएशन’ के पूर्व अध्यक्ष आलोक कुमार श्रीवास्तव का कहना था कि 'बाहुबलियों को देखने का हमारा चश्मा ही ठीक नहीं है. हम समाज में या राजनीति में विद्यमान बाहुबलियों को तो देखते हैं, उन्हें लोकतंत्र की मर्यादाओं को कुचलते हुए भी देखते हैं लेकिन उस जमीन पर निगाह नहीं डालते हम कि जहां से इनका जन्म होता है. हमारी नजर उन लोगों पर नहीं जाती जो इन्हें बाहुबली बनाते हैं.'

मुंबई, वीरा देसाई रोड पर स्थिति, कंट्री-क्लब में एक मुलाकात में फिल्मी लेखक विशाल ने लगभग डायलॉग के अंदाज में बताया 'वो बाहुबली कहलाता है, क्योंकि वो किसी के बेटे को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाता है. किसी मजबूर के दिल का ऑपरेशन करवाता है, स्कूल चलाता है, खेल के मैदान बनवाता है और अपने इलाके की गरीब बेटियों के दहेज की ज़िम्मेदारी उठाता है.'

पास बैठे इलाहाबादी दोस्त भास्कर ने मुख्तार अंसारी का बायोडाटा कुछ इस अंदाज में बयान किया 'दादा राष्ट्रवादी, पिता साम्यवादी और खुद अपराधी, क्या फिल्मी किरदार है ये गुरू.'

मुंबई की यही खासियत है यहां जो आता है डायलॉग मारने लगता है.

रॉबिनहुड की जरूरत क्यों

मोटे तौर पर ये बाहुबली जमींदाराना सोच का नतीजा हैं. ये एक ऐसी सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो खून में डीएनए बनकर दौड़ती है. जो किसी के लिए मदद में भी अपनी हुक्मरानी चाहती है. आका और गुलाम की सोच. सिर्फ और सिर्फ अपने नाम की सोच.

कभी इस मुल्क की आवाम से अकेले में बात कीजिए और उसके दिल की आवाज सुनने की कोशिश कीजिए तो आपको समझ आएगा कि यहां किसी को ऐसे रॉबिनहुड नहीं चाहिए, जब तक ऐसा हो पाए, इसी से काम चलाइए की तर्ज पर ये सिलसिला कायम है.

मुख्तार अंसारी की पार्टी इस बार मायावती के साथ है.

मुख्तार अंसारी की पार्टी इस बार मायावती के साथ है.

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, जो इंसानियत के लिए एक नया मजहब बनकर आई थी. हमारा संविधान, जिसमें, ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता को समर्पित’ जैसा कलमा लिखा गया. जिसे कतार में खड़े आखिरी आदमी तक को ये एहसास दिलाना था की गुलामी की जंजीरें काट दी गई हैं. अब हमारी सोच में व्यक्तिगत हुक्मरानी के लिए कोई जगह नहीं है.

लेकिन जैसा कि कहते हैं, हमने सोचा तो बहुत अच्छा लेकिन पिछले 70 सालों में भी हम कतार के उस आखिरी आदमी तक आजादी का एहसास लेकर नहीं पहुंच पाए हैं.

यही है वो खाद जो व्यक्तिवाद को सींचती है. यही व्यक्तिवाद गरीबों का रॉबिनहुड बनकर अपने इलाके का बाहुबली बनता है. यही कहर ढाता है, यही रहमत बनकर आता है, इसी की वकालत है, इसी की अदालत है. ये लोकतंत्र का नया जमींदार है. इसका वोटबैंक शाश्वत है. क्योंकि मतदाता ये मान चुका है कि पार्टियां ऐसे ही चलती हैं.

जरा सोचिए अगर हमारी व्यवस्था पूरी ईमानदारी से कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति के दुख-दर्द में शमिल हुई होती तो क्या उसे किसी मुख्तार अंसारी और किसी हरिशंकर तिवारी की जरूरत पड़ती?

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