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यूपी चुनाव 2017: क्या उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराया जा सकता है?

लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन से विपक्ष का कमोबेश सफाया ही कर दिया था.

Updated On: Jan 07, 2017 05:02 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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यूपी चुनाव 2017: क्या उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा और सितंबर 2014 में राज्य में हुए उपचुनावों के नतीजों पर नजर डालनी होगी. ये उपचुनाव लोकसभा चुनावों के कुछ महीनों बाद ही हुए थे. लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन से विपक्ष का कमोबेश सफाया ही कर दिया था.

सितंबर 2014 में उन 11 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव हुए थे, जो बीजेपी विधायकों के सांसद चुने जाने से खाली हुई थीं. इन सीटों में से समाजवादी पार्टी ने आठ सीट जीत ली थी. बीजेपी को केवल तीन सीटें ही हासिल हुई थीं.

जिन सीटों पर बीजेपी चुनाव हारी थी उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र की रोहनिया विधानसभा सीट भी थी. समाजवादी पार्टी ने उपचुनाव में मैनपुरी लोकसभा सीट भी जीत ली थी, जो मुलायम के इस्तीफे से खाली हुई थी.

इस साल भी दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की. उसने बीजेपी को अच्छे खासे अंतर से शिकस्त दी थी.

इन नतीजों से साफ है कि पिछले चुनाव के नतीजों के आधार पर आगे की जीत की कोई गारंटी नहीं. हर चुनाव का अपना अलग समीकरण होता है. उसका नतीजा कई बातों पर निर्भर करता है.

2014 में बीजेपी का शानदार प्रदर्शन

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पूरे विपक्ष का सफाया करते हुए राज्य में अपने सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर 73 सीटें जीती थीं. बीजेपी को 43 फीसद वोट मिले थे. लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 81 फीसद विधानसभा क्षेत्रों यानी 328 सीटों पर बढ़त हासिल हुई थी. यूपी के हालिया चुनावी इतिहास में किसी भी पार्टी को इतनी बड़ी जीत नहीं हासिल हुई थी. ऐसा आखिरी बार 1977 में हुआ था. जब जनता पार्टी ने 80 प्रतिशत विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी.

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2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी से था

लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा था, तो सवाल ये है कि 2014 से 2016 के बीच क्या बदला? 2014 की शानदार जीत के फौरन बाद बीजेपी को बड़ी हार का सामना क्यों करना पड़ा? 13 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में से 10 समाजवादी पार्टी ने कैसे जीत ली?

लोकसभा चुनाव के मुकाबले उपचुनावों में सबसे बड़ा फैक्टर था मायावती की गैरमौजूदगी. बीएसपी इन उपचुनावों में नहीं लड़ी थी. इसलिए ये समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला था. 2014 के मुकाबले वोटिंग पैटर्न भी बदल गया.

सितंबर 2014 में समाजवादी पार्टी का वोट बढ़कर 44.7 प्रतिशत हो गया. ये लोकसभा चुनाव से 20 फीसदी ज्यादा था. वहीं बीजेपी का वोट घटकर 38.4 फीसद रह गया. जबकि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने सहयोगी के साथ मिलाकर करीब 48 प्रतिशत वोट मिले थे. 2016 में दो सीटों पर हुए उपचुनावों में समाजवादी पार्टी को करीब 50 फीसद वोट मिले. वहीं बीजेपी को 41.5 प्रतिशत.

वोट में फेरबदल

ये आंकड़े दो बातें जाहिर करते हैं. पहली तो ये कि पिछले पांच चुनावों में पार्टियों को मिलने वाले वोट में जबरदस्त फेरबदल देखने को मिला है. हर बार चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं. दूसरी बात ये कि सीधे मुकाबले में बीजेपी विरोधी वोट एक ही पार्टी के खाते में जाते हैं. इससे बीजेपी को उन सीटों पर भी हार का सामना करना पड़ता है, जहां वो पिछले चुनाव में जीती थी.

फोटो. पीटीआई.

2014 के उपचुनाव में मायावती की पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया था

साफ है कि बीजेपी को तभी हराया जा सकता है जब इसकी विरोधी सभी पार्टियां आपस में हाथ मिला लें. या फिर बीएसपी चुनाव मैदान से हट जाए. लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में मायावती की भी वापसी की तगड़ी दावेदारी है.

ये कहना गलत होगा कि मायावती के चुनाव लड़ने से सिर्फ बीजेपी विरोधी पार्टियों को नुकसान होता है. बीएसपी के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी का विरोधी रहा है. सीधे मुकाबले में बीएसपी के वोट बैंक का ये बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में चला जाता है. साफ है कि 2017 के चुनाव में बीएसपी की मौजूदगी का असर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के वोटों के हिस्से पर पड़ेगा.

इससे दो हालात बन सकते हैं. इनमें कांग्रेस का रोल अहम हो जाता है.

पहली बात तो ये कि बीजेपी 2014 में मिले वोटों का अपना हिस्सा बचाए रखती है. ऐसे हालात में बीजेपी तभी हार सकती है जब उसके विरोधी सारे वोट मायावती को मिलें या फिर बीएसपी के वोटर उस उम्मीदवार के हक में वोट डालें जो बीजेपी को हरा सकता हो. यानी बीजेपी को तगड़ा झटका उसी सूरत में लग सकता है जब समाजवादी पार्टी या बीएसपी में से एक पार्टी पूरी तरह से कमजोर हो जाए.

एक दूसरी स्थिति बीजेपी के हक में जा सकती है. ये है कांग्रेस की मौजूदगी. कांग्रेस यूपी में बेहद कमजोर है. इसका कुल वोट शेयर 8 से 12 फीसद के बीच ही है. लेकिन अगर ये अलग से चुनाव लड़ती है तो समाजवादी पार्टी या बीएसपी का पूरी तरह से सफाया भी बीजेपी की हार को नहीं रोक सकेगा.

दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि खुद बीजेपी के वोट के हिस्से में कमी हो. बीजेपी में मोदी युग की शुरुआत से पहले बीजेपी का यूपी में वोट शेयर लगातार घट रहा था. 1996 में बीजेपी को 32.51 फीसद वोट मिले थे. वहीं 2002 में ये हिस्सा महज 20.12 प्रतिशत रह गया. 2007 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को केवल 16.97 फीसद वोट मिले थे. वहीं 2012 में ये केवल 15 फीसद रह गया. हालांकि वोटों की हिस्सेदारी में इतनी बड़ी गिरावट फिलहाल कमोबेश नामुमकिन है. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर अक्सर घट जाता है.

बहुकोणीय मुकाबला

तो अगर बीजेपी लोकसभा चुनावों में मिले 43 फीसद वोट से कम वोट हासिल करती है. तो बहुकोणीय मुकाबले में नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि बीजेपी को कितना नुकसान होगा और इसका फायदा किसको मिलेगा. 2012 में अखिलेश यादव ने सिर्फ 29.5 फीसद वोट लेकर समाजवादी पार्टी को बहुमत दिलाया था. यानी बीजेपी 10-12 फीसद वोट का नुकसान उठाकर भी राज्य के चुनाव में बहुमत पा सकती है. ऐसे में नतीजे उस सूरत में बदल सकते हैं जब किसी गठबंधन की पार्टियों के वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हों.

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एसपी की अंदरूनी लड़ाई का फायदा बीजेपी और बीएसपी दोनों को हो सकता है

फिलहाल अगर कोई पार्टी यूपी में जूनियर पार्टनर बनने को बेकरार है तो वो कांग्रेस है. बीएसपी से उसका गठजोड़ हो नहीं सकता क्योंकि मायावती ने 300 सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं. ऐसे में सिर्फ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठजोड़ की संभावना ही बचती है.

करीबी लड़ाई में अगर बीजेपी 2014 के मुकाबले कमजोर भी होती है और केवल 30 फीसद के आस-पास वोट हासिल करती है. फिर कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ती है, तो भी ये नतीजों को काफी हद तक बदल सकती है. अगर कांग्रेस के वोट बीजेपी के साथ न जाकर समाजवादी पार्टी के साथ जाते हैं तो समाजवादी पार्टी को 30 फीसद से ज्यादा वोट मिलेंगे जो कि 2012 में उसे मिले वोटों से ज्यादा होंगे. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस से समझौता करने को बेकरार सी दिखती है. शायद इस पर सहमति बन भी चुकी है. बस ऐलान होना बाकी है.

फिर भी सवाल वही है कि क्या बीजेपी 2017 के यूपी चुनाव में हार सकती है?

इसका जवाब है हां. मगर ये कई बातों पर निर्भर करेगा. यहां एक बात याद रखनी होगी. 2014 से पहले किसी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन 1977 में किया था. उस साल जनता पार्टी 80 फीसद विधानसभा सीटों पर आगे रही थी. और पार्टी ने यूपी और आज के उत्तराखंड को मिलाकर सारी यानी 85 सीटें जीती थीं. जनता पार्टी को 68 फीसद वोट मिले थे. लेकिन उसके बाद क्या हुआ...इसका इतिहास गवाह है.

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