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परियोजनाओं के हवाई किले से जमीनी जंग नहीं जीत पाएंगे अखिलेश

पांच-सात फीसद मुस्लिम वोट चुनाव के नतीजों को इधर से उधर करने का माद्दा रखती है

Updated On: Feb 03, 2017 05:56 PM IST

Vivek Awasthi

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परियोजनाओं के हवाई किले से जमीनी जंग नहीं जीत पाएंगे अखिलेश

उत्तरप्रदेश के वोटर के मन में जगह बनाने की हड़बड़ी में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मात्र दो दिनों के अंदर 300 प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया. सूबे की राजधानी में एक दिन में चार घंटे के भीतर सात जगहों पर 6000 करोड़ की परियोजनाओं की आधारशिला रखी.

इनमें कोई प्रोजेक्ट अस्पताल का था तो कोई स्टेडियम का, कोई किसान-बाजार का था तो कोई दूध की प्रोसेसिंग यूनिट का. बहुत से प्रोजेक्टस अन्य शहरों के लिए भी थे.

चुनाव की तारीख के एलान और सूबे में चुनाव आयोग के हाथों आचार-संहिता के लागू होने के तुरंत पहले अखिलेश की यह उद्घाटनी रेस पूरे रफ्तार से जारी थी.

यहां आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे नाम की महत्वाकांक्षी परियोजना का जिक्र करना भी जरूरी है. 21 नवंबर के दिन अखिलेश ने बड़े धूम-धड़ाके के साथ इस परियोजना का शुभारंभ किया. उस घड़ी लड़ाकू विमान जमीन चूमकर गुजरे.

गोमती रिवरफ्रंट नाम के प्रोजेक्ट का भी खूब हल्ला है. उन्होंने इसका भी उद्घाटन किया और लखनऊ मेट्रो के ट्रायल रन को हरी झंडी दिखायी. इन सबका मकसद यूपी के वोटर को यह संदेश देना था कि अखिलेश सरकार सूबे के सम्पूर्ण विकास के बारे में सोचती है.

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शायद एक मकसद यह भी रहा हो कि लोगों का ध्यान यादव-कुनबे में जारी घमासान से हट जाए. शायद कोशिश यह की जा रही थी कि सूबे में पांच साल से जारी समाजवादी शासन को लेकर लोगों के मन में कोई नाराजगी हो तो वह खत्म हो जाए. लेकिन क्या इन कोशिशों को काफी कहा जाएगा?

क्या इन कोशिशों से राजनीति के समझदार और सयाने यूपी के वोटर को लुभाया जा सकेगा? वोटर के मन में कई चीजें बड़ी गहराई से जमी हुई हैं और 11 फरवरी से शुरु होने वाले चुनावों में इन चीजों को वोटर के दिमाग से हटाना बहुत मुश्किल है.

Sultanpur: Uttar Pradesh Chief Minister and Samajwadi Party President Akhilesh Yadav arrives for an election rally in an helicopter in Sultanpur on Tuesday. PTI Photo (PTI1_24_2017_000129B)

अखिलेश यादव का बड़ा जोर इमेज क्रिएशन को लेकर है

कानून-व्यवस्था

कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर समाजवादी पार्टी इस बार भी बुरी तरह नाकाम रही. इस मोर्चे पर लोगों के मन में यह बात घर कर चुकी है कि बीते पांच सालों में सत्ताधारी दल अपराध का ग्राफ नीचे लाने में नाकाम साबित हुआ है.

इस छवि के रंग को और गहरा बनाने के लिए राइफल चमकाते कुर्ता-पायजामा धारी कार्यकर्ता भी हैं जो महंगी गाड़ी पर पार्टी का झंडा लहराते और वीआईपी का सायरन बजाते सड़क पर पूरी शान से निकलते हैं.

जब वे ऐसा करते हैं तो लगता है कि मानो बाकी राहगीरों को धमका रहे हों कि हमारे लिए रास्ता नहीं छोड़ा तो तुम्हारी खैर नहीं. यह सीन सूबे के हर शहर में आम हो चला है.

अंदरखाने का हंगामा

लग रहा था कि अखिलेश की राह आसान हो चली है. पार्टी का राजकुमार अब खुद ही राजा है और कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर चली खींचतान अब तालमेल में बदल चुकी थी.

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पार्टी के भीतर साईकिल को लेकर अभी भी दो गुट बने हुए हैं

लेकिन कभी पार्टी के सुप्रीमो कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने ठीक ऐसे ही वक्त में अपना मुंह खोल दिया. मुलायम सिंह यादव ने साफ कर दिया है कि जो कुछ चल रहा है उससे वे न तो खुश हैं और न ही उसको देख चुप्पी साध सकते हैं.

उन्होंने खुलेआम कहा है कि, इस बार वे पार्टी के लिए प्रचार नहीं करने वाले और ऐसे में अखिलेश के लिए मुश्किल खड़ी हो गई हैं.

शिवपाल का विद्रोह

मुलायम सिंह के चहेते भाई शिवपाल यादव के विद्रोही तेवर अब भी ठंडे नहीं पड़े. वे झुकने को तैयार नहीं, अखिलेश को पार्टी का सर्वमान्य नेता मानने से उन्होंने इनकार कर दिया है.

उन्होंने बिना कोई ओट किए इस बात पर तंज कसा है कि होने जा रहे चुनावों में उम्मीदवारी के लिए अखिलेश ने उन्हें टिकट दिया है.

शिवपाल यादव यह तक कहने से नहीं कतराये कि वोटों की गिनती खत्म होते ही वे एक नई पार्टी बनाएंगे.

कांग्रेस को एक सौ से ज्यादा सीट देने की बात पर उन्होंने अखिलेश को फटकार लगाई और कहा कि कांग्रेस तो सूबे में चार सीटों के लायक भी नहीं है. शिवपाल ने वचन दिया है कि पार्टी के जिन नेताओं के टिकट कटे हैं वे किसी और पार्टी या बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते हैं तो उनका प्रचार करेंगे.

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शिवपाल यादव विद्रोह गुट का नेतृत्व कर रहे हैं

धुरंधरों के तेवर

बात जब टिकट के बंटवारे की आई तो अखिलेश के खेमे ने मुलायम सिंह यादव या शिवपाल यादव के प्रति निष्ठावान पार्टी के दिग्गज नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

ऐसे में कद्दावर नेता अंबिका चौधरी विरोधी बहुजन समाज पार्टी में चले गए और वह भी ठीक उसी वक्त जब मायावती लखनऊ में प्रेस-कांफ्रेस कर रही थीं.

दूसरी तरफ एक और बड़े नेता नारद राय को अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल की ओर से चुनाव लड़ने का टिकट मिला है. ऐसे कई नाम और हैं जो आगे के दिनों में समाजवादी पार्टी की राह में कांटा बनने वाले हैं.

मीडिया-मैनेजमेंट 

लगता है इस बार अखिलेश की टीम का मीडिया मैनेजमेंट पर बहुत ज्यादा जोर है और भरोसा भी.

हार्वर्ड के प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग भले ही अखिलेश के मीडिया सलाहकार हों लेकिन अखिलेश एक बात भूल रहे हैं कि मीडिया में पैदा किए जा रहे इस नये-नवेले धूम-धड़ाके से गुजरे चार सालों से चल रहे कुशासन के पाप को नहीं मिटाया जा सकता.

बहुत मुश्किल है वोटर के लिए यह भूल पाना कि तकरीबन साढ़े चार साल से सूबे पर साढ़े चार मुख्यमंत्रियों का शासन चल रहा है.

यहां यह जिक्र कर देना भी ठीक रहेगा कि साढ़े चार सालों में अखिलेश की गिनती पूरे में नहीं बल्कि आधे मुख्यमंत्री के रुप में रही है.

Election

ओपिनियन पोल में अखिलेश और राहुल के गठबंधन को पॉजिटिव प्रतिक्रिया मिली है

ओपिनियन पोल कितना सही

टीवी चैनल पर ओपिनियन पोल की भीड़ लगी है लेकिन वोटर के दिमाग पर उसके जरिए असर डालना मुश्किल है.

तीन महीने पहले एक न्यूज चैनल का दावा था कि मायावती की बीएसपी लखनऊ में सरकार बनाने के दौड़ में सबसे आगे है.

उसी न्यूज चैनल ने हाल में ठीक इसका उलटा दावा किया कि सरकार बनाने की दौड़ में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस(आई) का गठबंधन आगे चल रहा है.

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सियासी तौर पर सयाने यूपी जैसे सूबे में वोटर ऐसे ओपिनियन पोल या सर्वे को खास तवज्जो नहीं देते.

अब से पहले भी ऐसे कई सर्वे और ओपिनियन पोल मुंह के बल धड़ाम हुए हैं और उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

यूपी की सियासत का फैसला मुस्लिम वोट से होना है

सूबे में समाजवादी पार्टी हमेशा ही मुस्लिम-यादव वोट के भरोसे रही है.

पार्टी की मुस्लिम वोट पर निर्भरता इतनी ज्यादा है और उस तरफ झुकाव भी इस दर्जे का रहा है कि मुलायम सिंह यादव को यूपी में मुल्ला मुलायम सिंह कहा जाता है.

मुलायम सिंह यादव अब एक किनारे हो गये हैं और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव का नाम पार्टी के स्टार-प्रचारकों में नहीं है. ऐसे में राह उतनी आसान नहीं होगी जितनी कि अखिलेश ने समझ लिया है.

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यूपी चुनाव के नतीजे मुसलमान वोट के जरिए तय होते हैं

सूबे में मुस्लिम वोट 20 प्रतिशत हैं और मुस्लिम वोटर के मन में शक की हल्की- भी लकीर खींचती है तो यह अखिलेश के लिए गड्ढ़ा खुदने जैसी बात होगी.

समाजवादी पार्टी की घोर विरोधी मायावती की बीएसपी ने 403 सीटों में 100 पर मुस्लिम को टिकट दिए हैं. फिर ये टिकट बाकी पार्टियों के रेस में उतरने से बहुत पहले ही दे दिए गए थे.

अब तक चलन कहता है कि जो पार्टी बीजेपी को शर्तिया हराती दिखती है मुस्लिम वोटर उसी को चुनता है.

इस समूह का वोट इकट्ठा पड़ता है और उस आदमी के खाते में जाता है जो मुस्लिम मतदाताओं की नजर में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की हालत में हो.

अगर मुस्लिम मतदाताओं का हल्का सा भी झुकाव बीएसपी की तरफ होता है तो फिर केवल पांच-सात फीसद मुस्लिम वोटों के इधर से उधर होने भर से बहुत से चुनावी पंडित और उनकी भविष्यवाणियां इस बार यूपी की जमीन पर चारों खाने चित्त नजर आएंगी.

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