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यूपी की दलित राजनीति पर ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट-8): दलित शादियों में दूल्हों को घोड़ी चढ़ने से कौन रोक रहा है?

क्या दलितों के साथ ऊंची जातियों के भेदभाव की ऐसी कहानी वही सदियों पुरानी वाली है या अब हालात बदले भी हैं? यूपी के कुछ इलाकों में हमने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

Updated On: May 14, 2018 01:47 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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यूपी की दलित राजनीति पर ग्राउंड रिपोर्ट (पार्ट-8): दलित शादियों में दूल्हों को घोड़ी चढ़ने से कौन रोक रहा है?

एडिटर नोट: बीजेपी, इसकी वैचारिक शाखा आरएसएस और दलितों से पहचानी जानी वाली पार्टियां यहां तक कि बीएसपी भी, पिछले कुछ महीनों में दलित समुदाय से दूर हो रही है. इस समुदाय ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों और समाज में खुद को स्थापित करने का नया रास्ता खोजा है. फ़र्स्टपोस्ट यूपी में घूमकर दलित राजनीति का जायजा लेगा. गांवों, शहरों और कस्बों में क्या है दलित राजनीति का हाल, जानिए हमारे साथ:

पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामली के छोटे से गांव बिरालसी के एक दलित के घर शादी थी. खूब रौनक और तड़क-भड़क के साथ शादी संपन्न हुई. मुजफ्फरनगर के सूरज बैंड वालों के यहां से शादी वाला बैंड गया था. आज मेरे यार की शादी है गाने पर बारातियों ने जमकर डांस भी किया. बाबुल की दुआएं लेती जा... वाले गाने पर लड़की वालों की आंखों में आंसू भी आए. ये बिल्कुल आम शादियों की तरह था. दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर अपनी दुल्हन को लेने उसके दरवाजे पर पहुंचा था. बिना किसी हिल-हुज्जत के शांतिपूर्ण तरीके से शादी संपन्न हुई.

एक सवाल उठता है कि वो कौन लोग हैं, जो दलितों को घोड़ी चढ़ने से रोक रहे हैं? क्या ये सिर्फ यूपी के कासगंज का मामला है, जिसमें एक दलित युवक ठाकुरों की बस्ती से बारात निकालने की लड़ाई लड़ रहा है और दलितों की जिंदगी की सच्चाई बयां कर रहा हैं? क्या दलितों के साथ ऊंची जातियों के भेदभाव की ऐसी कहानी वही सदियों पुरानी वाली है या अब हालात बदले भी हैं? यूपी के कुछ इलाकों में हमने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

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3 साल पहले शादी के दौरान हुई जातीय झगड़े की सच्चाई क्या है?

 मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर थाने में आता है सोनटा गांव. शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर इस गांव में दलितों, पिछड़ों और ऊंची जातियों की मिलीजुली आबादी है. 3 हजार की आबादी में जाटों की संख्या सबसे ज्यादा है, दूसरे नंबर पर दलित समुदाय आता है. 3 साल पहले यहां एक घटना बड़ी चर्चित हुई थी. गांव में दलितों की बस्ती में फिरोजपुर से बारात आई थी. अखबारों में खबर आई कि बारात द्वार पर लगने के वक्त तेज आवाज में डीजे बज रहा था.

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ऊंची जाति के कुछ लोगों ने तेज आवाज में म्यूजिक बजाने पर आपत्ति जताई. मामला बढ़ गया और इसने जातीय झगड़े का रूप ले लिया. 3 साल बाद जब हमने इस घटना के बारे में मालूमात हासिल की तो अलग ही कहानी सामने आई. गांव के दलित समाज से आने वाले अजय कहते हैं कि दरअसल झगड़ा शादी वाले परिवार का आपसी था. इसमें ऊंची जाति वाला एंगल था ही नहीं. पूरी घटना को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया.

3 साल बाद अब वो परिवार इस पर बात नहीं करना चाहता. गांव के दलित भी इस पर कुछ कहने से बचते हैं लेकिन एक बात सभी साफ तौर पर बताते हैं कि इसमें ऊंची जाति और दलित के बीच झगड़े जैसा कुछ नहीं था.

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बारातियों और बाकी जातियों के बीच क्यों रखा जाता है भेदभाव

 गांव के दलित समुदाय की सुरेंदरी देवी ने पिछले साल जुलाई में अपनी बेटी की शादी की है. चरथावल के घिस्सूखेड़ा से बारात आई थी. दूल्हे राजा सन्नी घोड़े पर सवार होकर गाजे-बाजे के साथ अपनी दुल्हन ले जाने आए थे. सुरेंदरी देवी कहती हैं,‘ शादी में बढ़िया खाना-पीना और खूब गाना-बजाना हुआ था. सारे गांव वालों ने मदद की थी. किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई थी.’

 सोनटा गांव के दलितों की बारात रविदास मंदिर में रुकती है. वहीं बारातियों के खाने-पीने का इंतजाम होता है. जबकि बाकी जातियों के लिए एक अलग बारातघर है. मैं पूछता हूं- क्या ये भेदभाव नहीं है? दलित शादियों के बारात का इंतजाम अलग क्यों किया गया है? गांव के मुकेश जैन कहते हैं- ‘दलित अपनी शादियों में नॉनवेज बनाते हैं. जबकि दूसरी जाति की शादियों में नॉनवेज बिल्कुल नहीं बनता. इसलिए दलित शादियों में बारात रुकने की व्यवस्था रविदास मंदिर में है. अगर कोई दलित अपनी शादी में नॉनवेज नहीं बनाता तो हमें दूसरा बारातघर उन्हें इस्तेमाल करने देने में कोई आपत्ति नहीं है.’

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 इलाके के लोग बताते हैं कि दलित शादियों में कुछ अलग नहीं होता. बस लोग अपनी हैसियत के मुताबिक शादियों में खर्च करते हैं. दलित शादियों में भी दूल्हे खूब घोड़ी चढ़ते हैं. बग्घी पर शानदार बारात निकलती है. मुजफ्फरनगर में शादियों में बैंड-बाजे का काम करने वाले संजीव कुमार कहते हैं, ‘इस इलाके में कभी कासगंज की तरह घटना तो मैंने नहीं सुनी. हमारे पास हर जाति के लोग बैंड-बाजे के लिए आते हैं. हमें क्या फर्क पड़ता है कि वो किस जाति के हैं. भेदभाव करेंगे तो खाएंगे कहां से. इसी से तो हमें रोजगार मिलता है.’

बैंड बाजे वाले बुकिंग के वक्त पूछते हैं जाती

मुजफ्फरनगर में शादी में बैंड-बाजे देने का काम करने वाली करीब 50-60 दुकानें होंगी. यहां से शामली और कैराना तक के लोग शादियों में बैंड बाजे का इंतजाम करने आते हैं. सदर बाजार में आतिशबाजी की दुकान चलाने वाले मोहम्मद शहाब आलम कहते हैं कि शादियों में अंतर बस आतिशबाजी को लेकर आया है. प्रदूषण की वजह से पटाखों को लेकर हाल में जो पाबंदियां लगाई गई हैं, उसके बाद शादियों में पटाखे कम चलाए जा रहे हैं. शहाब आलम अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए शादियों में फूलों से डेकोरेशन का काम करने लगे हैं.

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 यहां सुरेश बैंड वाले का बड़ा नाम है. शादियों में बैंड-बाजे और घोड़ी-बग्घी का इंतजाम करने वाली ये पुरानी दुकान है. दुकान चलाने वाले नरेश कहते हैं कि मैं शादियों में बैंड-बाजे देते वक्त ये पूछता हूं कि वो हरिजन हैं, अग्रवाल हैं या किसी दूसरी जाति से आते हैं. मैं हैरान होते हुए कहता हूं कि आप ऐसा क्यों करते हैं. वो कहते हैं कि इसका ऊंची या नीची जाति से कोई लेना-देना नहीं है.

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दरअसल जाति पूछने से हमें उनके इलाके तक पहुंचने में आसानी होती है. हमें उनका पता ढूंढ़ने में आसानी रहती है. नरेश कुमार कहते हैं कि यहां वाल्मिकी समाज के लोग भी शादियों में घोड़ी चढ़ते हैं. जाति नहीं अपने बजट के हिसाब से लोग खर्च करते हैं. कोई 20 हजार खर्च करना चाहता है तो कोई 40 हजार.

जाति को लेकर कोई मसला नहीं

नरेश कुमार नाई समुदाय से आते हैं. वो बताते हैं कि बैंड-बाजे का काम दलित या पिछड़ी जाति के लोग ही कर रहे हैं. मुस्लिम शेख बिरादरी के लोग बैंड बजाने के काम में हैं. बादी या नट जो दलित समुदाय में आता है, ये लोग भी बैंड बजाने और लाइटें ढोने के काम में हैं. शादियों का काम नहीं रहता है तो ये लोग रिक्शा चलाने और दूसरी तरह के मेहनत मजदूरी वाले कामों में लग जाते हैं.

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नरेश कुमार कहते हैं, ‘42 साल से इस पेशे में हूं. जमाना पहले से बदल गया है. पहले लोग ज्यादा पैसे नहीं खर्च करते थे. बारात में पैदल ही चले जाते थे. या फिर ढोल वाले को बुला लेते थे. अब ऐसा कुछ नहीं है. अब बजट के हिसाब से काम करते हैं. 15 बैंड बाजे वाले नहीं तो 10 मंगा लिए. बग्घी नहीं मंगाई तो घोड़ी मंगा ली. अब दलितों की शादी में भी ठीकठाक तड़क भड़क होती है.’

 शादियों में घोड़ी उपलब्ध करवाने वाले अलग लोग होते हैं. इन्हें घोड़ीसाज कहते हैं. इस काम में ज्यादातर मुसलमान या दलित हैं. जनता घोड़ीसाज को 60-65 साल के बुजुर्ग नजीर चलाते हैं. इनके पास एक ही घोड़ी है. नजीर बताते हैं कि हर जाति के लोग अपनी शादियों में घोड़ी किराए पर ले जाते हैं.

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 मुजफ्फरनगर के पेड़वाली गली में बहादुर घोड़ीसाज रहते हैं. उनके पास एक बग्घी और दो घोड़ियां हैं, जिन्हें ये शादियों में किराए पर देते हैं. आज उनकी घोड़ियों और बग्घी की बुकिंग किसी शादी में नहीं है, इसलिए वो मेहनत मजदूरी करने निकल पड़े हैं. हमारी मुलाकात उनकी बेगम शमशीदा से होती है. वो कहती हैं कि जिसके पास पैसा है, वो अपनी शादी में घोड़ी-बग्घी ले जाता है. ज्यादातर हिंदू ही ले जाते हैं मुस्लिम शादियों में घोड़ी-बग्घी का ज्यादा चलन नहीं है.dalit (4)

शमशीदा के 3 लड़के और 2 लड़कियां हैं. वो बताती हैं कि इस पेशे में किसी तरह से गुजारा चल जाता है. उनके घर में दो घोड़ियां बंधी हैं. उनकी ओर इशारा करते हुए शमशीदा कहती हैं, ‘ शादियों के सीजन में ये घोड़ियां हमें खिलाती हैं और सीजन खत्म हो जाता है तो हमें इन्हें खिलाना पड़ता है.

अब देखिए ये बैठे-बैठे खा रही हैं. ’ एक घोड़ी रखने में इन्हें महीने के 5 हजार का खर्च है. कभी कभार जब ये खर्च नहीं उठा पाते हैं तो घोड़ी बेच भी देते हैं और सीजन में जब मांग बढ़ती है तो कोई नई घोड़ी खरीदकर ले भी आते हैं. शमशीदा कहती हैं कि आजकल हर कोई शादियों में घोड़ी ले जा रहा है. यहां जाति को लेकर कोई मसला नहीं है.

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