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हर चीज का रंग भगवा नहीं है...जरा चश्मा तो उतारिए जनाब!

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के हर फैसले की आलोचना हो रही है

Vivek Anand Updated On: Mar 24, 2017 02:13 PM IST

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हर चीज का रंग भगवा नहीं है...जरा चश्मा तो उतारिए जनाब!

साहब ये तो ज्यादा हो गया. मतलब ठीक है... आप आलोचना कीजिए लेकिन सिर्फ आलोचना करने के लिए किसी भी बात पर रगड़ देना, ये ठीक नहीं है.

आलोचना करने के लिए आप अपना पक्ष जो दबा के दिए जा रहे हैं तो जनाब उसका दूसरा पक्ष तो देख लीजिए. आपने भगवा रंग का चश्मा पहन लिया है तो आपको कोई और रंग दिखेगा ही नहीं. फिर आपको जंगल भी भगवा दिखेगा, झाड़ भी भगवा... खर पतवार भी भगवा... आप अपना चश्मा उतार नहीं रहे.... बस कहते फिर रहे हैं, वो देखो भगवा रंग में रंग दिया. भइया चश्मा उतार कर तो देखो...कई रंग नजर आएंगे.

अब लीजिए... यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने स्कूलों को लेकर कुछ निर्देश जारी किए हैं. सीएम के दिशानिर्देश पर सूबे के शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों के लिए कुछ गाइडलाइंस तय किए हैं. इसके मुताबिक सरकारी स्कूलों के गुरुजी जींस पैंट न पहनें, टीशर्ट से परहेज करें. फॉर्मल कपड़ों को अपनाएं. गुटखे तंबाकू के अपने शौक के निशान स्कूल की दीवारों पर न छोड़ें. मोबाइल फोन का इस्तेमाल बहुत जरूरी हो तभी करें. अब इन गाइडलाइंस की आलोचना भी होने लगी है.

स्कूल टीचर्स के लिए जारी इन गाइडलाइंस पर भी कुछ लोग कहने लगे हैं कि ये भगवाकरण है. योगी आदित्यनाथ स्कूली शिक्षा-व्यवस्था को गुरुकुल के टाइम में लेकर जा रहे हैं. सरकारी टीचर्स के कपड़ों से उन्हें क्या प्रॉब्लम होने लगी. अरे जनाब प्रॉब्लम तो बच्चों के कपड़ों से भी नहीं होनी चाहिए फिर तमाम स्कूलों में बच्चों के स्कूल ड्रेस क्यों जरूरी कर दिए जाते हैं. और ये कोई नहीं बात तो है नहीं कि टीचर्स को उनके पहनावे को लेकर कुछ सलाह मशविरा दे दिया गया है. सरकारी स्कूलों की छोड़ दीजिए, पांच सितारा स्कूलों में भी टीचर्स के पहनावे को लेकर गाइडलाइंस होते हैं. उन पर कोई बवाल नहीं करता, न कोई आलोचना होती है.

कभी आपने किसी कॉन्वेंट या हाईफाई अंग्रेजी स्कूल के टीचर को धोती कुर्ते में देखा है... नहीं न... तो फिर... उनके यहां भी पहनावे को लेकर कुछ गाइडलाइंस तो है ही. फिर सरकार ने अपनी निगरानी में चलने वाले सरकारी स्कूलों में टीचर्स के पहनावे पर कुछ सलाह दे डाली तो क्यों कयामत टूटे जा रही है.

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मेरे एक सहयोगी अपनी कहानी सुना रहे थे. उनके पिताजी भी एक सरकारी स्कूल में टीचर हैं. उन्होंने कहा कि आज बेकार ही बावेला खड़ा किया जा रहा है. उन्हें याद है कि झारखंड के एक पिछड़े इलाके के सरकारी स्कूल में शिक्षक रहे उनके पिता को भी सर्दियों में ब्लेजर पहनना होता था. एक बार तो उनके पिताजी को अपने बेटे यानी मेरे सहयोगी के ब्लेजर को ही पहनकर स्कूल जाना पड़ा, उनके पिताजी के पास उस वक्त कोई ब्लेजर था ही नहीं.

स्कूल के अनुशासन को बनाए रखने में उन्हें पहनावे को लेकर इस मजबूरी से कोई शिकायत नहीं थी. होनी भी नहीं चाहिए. अगर आप बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए उन पर कुछ जरूरी चीजें अपनाने को कह रहे हो. तो फिर आप खुद क्यों नहीं अपना सकते.

लेकिन नहीं... योगी आदित्यनाथ के हर कदम पर मीनमेख निकालने वाले उनके इस कदम को अठाहरवीं सदी की मानसिकता बताने पर तुले हैं. लग रहा है जैसे उनकी इस सलाह पर सरकारी स्कूलों को गुरुकुलों में बदलने की साजिश चल रही है. जैसे फॉर्मल पहनने को नहीं कह दिया, संन्यास लेने को कह दिया हो. अब इतनी भी आलोचना नहीं होनी चाहिए.

गुटखे-तंबाकू की कौन वकालत कर सकता है... बुरी आदत है तो है. कुछ गुरुजी भी इनके चपेट में होते हैं. सोचिए कि मुंह में पान या गुटखा दबाए अपने बच्चों को अनुशासन, संयम, सदाचार, आचार व्यवहार की सीख देने के बीच में पिच्च-पिच्च करते गुरुजी की बात का बच्चे कितना मान रखेंगे. गुरुजी ने इधर पिच्च से गुटखा थूका उधर बच्चों ने उनका ज्ञान... सो बुरी आदतों पर गुरुजी को संयम रखने की सीख दे दी गई तो क्या कयामत हो गई. लेकिन नहीं...लोगों को इस सलाह में भी भगवाकरण दिख सकता है.

आप यूपी की शिक्षा व्यवस्था पर सरकार को कोसो. जीभर के कोसो. क्या हालत बना रखी है सरकारी स्कूलों की. ये बात किसी से छिपी नहीं है. लेकिन अगर उसे बेहतर करने के लिए कुछ कदम उठाए जा रहे हैं तो उसकी तो आलोचना मत करो.

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हमारे स्कूल में संस्कृत के शिक्षक थे उपाध्याय जी. सफेद झक धोती कुर्ता में आते... संस्कृत के भारीभरकम श्लोक सुनाकर माहौल बनाते. बच्चों में संस्कृत का डर था या उनका रौब कहना मुश्किल है, लेकिन बच्चे उनका सम्मान करते. थोड़ी संगीत की भी जानकारी थी. सो तबले पर ठेक लगाते तो उनकी सर्वगुण संपन्नता का जोरदार असर पड़ता.

एक दिन अचानक उनका कायाकल्प हो गया. देखा तो उपाध्याय जी मस्त जिंस पैंट-शर्ट में चले आ रहे हैं. जिसको देखो वही हैरान..भई ये कैसे हुआ. बच्चे चौड़ी आंखों से उन्हें देखने लगे. उन दिनों नया-नया जिंस का क्रेज चढ़ा था. लेकिन उसकी दीवानगी उपाध्यायजी पर चढ़ेगी किसी को भरोसा न था. किसी ने पूछ लिया कि उपाध्यायजी ये गजब कैसे हुआ. कहने लगे, अरे क्या बताएं. बिटिया की जिद की वजह से ये रूप धरना पड़ा है. हम तो अपने पुराने लिबास में खुश थे. बिटिया जबरदस्ती मॉर्डन बनाने पर तुली है. आखिर में प्रिंसिपल साहब को कहना पड़ा, उपाध्यायजी आप पुराने लिबास में ही आया करें, बच्चे दबी जुबान आपकी हंसी उड़ाते हैं. उपाध्यायजी ने बुरा नहीं माना. अगले ही दिन से अपने पुराने रूप में लौट आए.

तो कहने का मतलब है कि पहनावा तो व्यवस्थित, हल्काफुल्का और शरीर पर फबने वाला होना चाहिए. लेकिन सरकारी दफ्तरों या प्राइवेट कंपनियों में पहनावे को लेकर कुछ गाइडलाइंस भी तय कर लिए जाते हैं. उनका काम बस इतना भर होता है कि माहौल में एकरुपता रहे, अनुशासन का माहौल बना रहे या एक अलग पहचान झलकती रही.

उस पर इतना बावेला मचाना ठीक नहीं. योगीजी की सरकार ने सरकारी स्कूलों को लेकर बहुत छोटी सी पहल की है. सरकारी स्कूलों की हालत बदलने में कितने ही काम किए जाने बाकी हैं. छोटी सी ही सही कोई अच्छी पहल की है तो तारीफ कीजिए न...क्यों भगवा ...भगवा की रट लगाए हैं जनाब. सब्र कीजिए, थोड़ा देख तो लीजिए.

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