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यूपी निकाय चुनाव नतीजे: शांत होकर वापस लौट रहा हाथी

उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऊंट अब करवट बदल रहा है, देखना होगा कि आने वाला लोक सभा चुनाव किसके लिए क्या और कितना लाभ लेकर आता है.

Utpal Pathak Updated On: Dec 01, 2017 07:14 PM IST

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यूपी निकाय चुनाव नतीजे: शांत होकर वापस लौट रहा हाथी

अब तक उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यह बात सार्वजनिक रूप से होती थी कि बीएसपी प्रमुख मायावती पंचायत और नगर निकायों के चुनाव को गंभीरता से नहीं लेती हैं. लेकिन करीब दो दशक के बाद बहुजन समाज पार्टी ने अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़कर न सिर्फ सबको चकित किया है बल्कि आने वाले लोक सभा चुनावों के इस सेमीफाइनल में अपनी मजबूती से बीजेपी समेत एसपी को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.

बीएसपी के खाते में अलीगढ़ शहर की महापौर सीट के अलावा मेरठ की भी सीट आई है और कई सीटों पर बीजेपी को जीत के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा है. बीएसपी का मुस्लिम चेहरा कहे जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी से निकाल दिए जाने के बाद मची गहमागहमी के बाद अब पार्टी के हालात सामान्य हैं और यह काफी हद तक निकाय चुनाव के नतीजों से साफ जाहिर है.

नए अंदाज ने दिलाया फायदा

उत्तर प्रदेश में हुए नगर निकाय चुनाव को लेकर इस बार बसपा एकदम अलग अंदाज में चुनावी मैदान में थी. पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए बीएसपी ने नगर निकाय चुनाव में नगर निगम महापौर की सभी 16 सीटों सहित नगर पंचायत और नगर पालिका की सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पार्टी छोड़ने और तमाम अन्य आरोपों के बाद कभी बैकफुट पर रही बीएसपी ने अब दो कदम आगे बढ़ते हुए जिस तरह नगर निकाय चुनाव को लेकर अपनी दावेदारी पेश की है, उससे साफ जाहिर है कि आगामी लोक सभा चुनाव में बसपा मजबूत होकर चुनाव में उतरेगी.

बदली हुई रणनीति

Mayawati

मायावती ने कुछ महीने पहले ही सहारनपुर में हुई हिंसक घटनाओं के बाद राज्‍यसभा सदस्यता से इस्‍तीफा भी दे दिया था. उनके इस कदम को संगठन और पार्टी को एकजुट करने और उसके मनोबल को बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा गया था.

प्रत्याशियों की घोषणा के समय लखनऊ में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर ने भी इस बात को बार बार दोहराया था, 'नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कारण कई लोग लगातार पार्टी से नाराज थे और पार्टी छोड़कर जा रहे थे लेकिन उन्हें हटाए जाने के बाद अब बहुत सारे लोगों की पार्टी में वापसी हो रही है.'

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बसपा ने न सिर्फ अपनी पार्टी के बागियों को शांत किया बल्कि अन्य दलों के बागियों पर भी नजर रखी. इसके अलावा बसपा नेतृत्व ने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी के हर कद्दावर नेता को अपने अपने मंडलों में प्रभार संभालना होगा, जिसका नतीजा यह हुआ कि वरिष्ठ नेता लालजी वर्मा समेत राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ, पूर्व मंत्री नकुल दुबे, प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर, पूर्व मंत्री अनंत मिश्रा तथा शमसुद्दीन राइन जैसे नेता पार्टी प्रत्याशियों के लिये प्रचार कर रहे थे. दूसरी तरफ पूर्वांचल में अफजाल अंसारी एवं अब्बास अंसारी समेत अंसारी बंधुओं की टीम ने मोर्चा संभाला हुआ था.

बीएसपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया, 'हमारी पार्टी की मुखिया बहन मायावती नगरीय निकाय चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही थी और उन्होंने मंडलीय पदाधिकारियों के साथ लगातार बैठकें कर के प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप दिया था. ज्यादातर टिकट बहन जी ने खुद ही तय किए हैं और उसका नतीजा आपके सामने है.

विधानसभा चुनाव से पहले हमारे वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और आर.के चौधरी समेत कई अन्य नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी और हमें विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा था. लेकिन अब स्थिति वापस सामान्य है और मतदाताओं का विश्वास जीतने में हम कामयाब हुए हैं.'

नगर निकाय चुनावों में कई सीटों पर मिली भारी मतों से जीत और बढे हुए मत प्रतिशत के बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर ने दूरभाष पर बातचीत में बताया -'देखिए हमारा वोटों का प्रतिशत विधानसभा में भी नहीं घटा था, इस सरकार ने प्रदेश वासियों को सब्ज़बाग दिखाकर अपनी और तो किया था लेकिन छह महीने में ही उन्हें सच दिखाई देने लगा. आज प्रदेश में लगातार जिस तरह से कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है, सर्व समाज को अब सिर्फ बहन जी से ही उम्मीदें बची हैं जिसका नजारा आपने आज नतीजों में देखा. आने वाले लोक सभा चुनाव में में ऐसे ही मजबूती से लड़ेंगे और एक बड़ा उलटफेर करेंगे.'

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गौरतलब है कि वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव और इस साल के शुरू में हुए विधानसभा चुनाव में बीएसपी के लिए काफी खराब नतीजे आए थे. पिछले लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खाता भी नहीं खुला था, वहीं उत्तर प्रदेश में इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में 403 में से महज 19 सीटें ही हासिल हुई थीं. हालांकि गत विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत के मामले में बीएसपी 22.2 प्रतिशत के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. और बीएसपी के वोटों एक प्रतिशत सभी दलों के लिए खासी चिंता का विषय था.

शुरुआती रुझानों से ही बीएसपी का मजबूती से उभरना राजनीतिक विश्‍लेषकों के लिए अजीब रहा, क्योंकि अधिकांश लोग बीजेपी के बाद समाजवादी पार्टी को दूसरे नंबर की पार्टी मान कर चल रहे थे और एक पूर्वाग्रह भी था कि बीएसपी की पैठ शहरी तबके में कुछ खास नहीं रही. लेकिन नतीजों के बाद यह सभी मिथक टूट चुके हैं और बीएसपी को कई सीटों पर मिल रही बढ़त यह बताती है कि बीजेपी को जो नुकसान हो रहा है, उसका सीधा फायदा बीएसपी को हो रहा है.

चल गया दलित मुस्लिम फार्मूला 

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आंकड़ों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि बीएसपी को मुस्लिम दलित गठजोड़ का फायदा मिला है. विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद और नसीमुद्दीन के पार्टी से निकाले जाने के बाद बीएसपी ने कई मुस्लिम नेताओं को पार्टी में शामिल भी किया जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद के अलावा पूर्व सांसद मंसूर अली खान भी रहे.

इसके अलावा निकाय चुनाव से ऐन पहले अलीगढ़ से पूर्व विधायक हाजी जमीर उल्लाह समाजवादी पार्टी छोड़कर बीएसपी में शामिल हो गए. विधानसभा चुनावों से सबक लेते हुए बीएसपी ने मुस्लिम समुदाय के जातिगत समीकरणों को भी ध्यान में रखते हुए प्रत्याशियों की घोषणा की.

लौट रहा है पश्चिम का गढ़

बीएसपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत वापसी की है और अधिकांश इलाकों में भाजपा को कड़ी चुनौती दी है. पश्चिम में अधिकांश सीटों पर मेयर और चेयरमैन की लड़ाई केवल बीजेपी और बीएसपी के बीच रही.

समाजवादी के प्रत्याशी कुछ चुनिंदा सीटों पर तीसरे नंबर पर रहे और कुछ सीटों पर चौथे स्थान पर पहुंच गए. मेरठ के अलावा सहारनपुर, मुरादाबाद और गाजियाबाद में सपा तीसरे या चौथे पायदान पर चल रही थी. निकाय चुनाव में नतीजों से साफ है कि समाजवादी मुकाबले में ही नहीं थी और इस इलाके में चुनावी मुकाबला केवल बीजेपी और बीएसपी के बीच ही था.

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बीएसपी की यह वापसी एक साथ कई इशारे करती है, पश्चिम के अलावा पूर्वांचल के भी कुछ महत्वपूर्ण इलाकों में बीएसपी को मिले वोटों का प्रतिशत समाजवादी पार्टी समेत बीजेपी को भी चकित कर देने के लिए काफी है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा की प्रचंड जीत के बाद कांग्रेस को आड़े हाथों लेते रहे लेकिन बीएसपी के बारे में अब तक उन्होंने या किसी अन्य शीर्ष नेता टिप्पणी नहीं दी है.

माना जा रहा है कि बीएसपी सुप्रीमो जल्द ही संगठनात्मक बदलाव करेंगी और कुछ नए पुराने चेहरों को जिम्मेदारियां देंगी. उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऊंट अब करवट बदल रहा है, देखना होगा कि आने वाला लोक सभा चुनाव किसके लिए क्या और कितना लाभ लेकर आता है.

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