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यूपी उपचुनाव: फूलपुर में कमल खिलने से पहले उछला कीचड़

बीजेपी ने जैसे ही फूलपुर उपचुनाव के लिए कौशलेन्द्र सिंह को प्रत्याशी बनाया, उनकी पहली पत्नी ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाए

Updated On: Feb 22, 2018 08:24 AM IST

Utpal Pathak

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यूपी उपचुनाव: फूलपुर में कमल खिलने से पहले उछला कीचड़

बीजेपी ने इलाहाबाद जिले की फूलपुर संसदीय सीट के उपचुनाव में वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेन्द्र सिंह को प्रत्याशी बनाया है. प्रत्याशी बनाए जाने के बाद अचानक से मीडिया समेत बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं को यह पता चला कि वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेन्द्र सिंह युवा कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय माने जाते हैं.

बहरहाल, उनकी लोकप्रियता का पैमाना क्या है और कैसे है इसका तुलनात्मक अध्ययन अभी जरूरी नहीं हैं. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की कुर्मी जाति से होने के कारण उन्हें लगातार दूसरी बार बीजेपी प्रदेश संगठन में मंत्री बनाया गया. उन्हें गोरखपुर में लोकसभा संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव के लिए संगठन की ओर से प्रभारी बनाया गया था, लेकिन अचानक से उनका नाम फूलपुर उपचुनाव के लिए सामने आते ही बीजेपी के अंदरखाने में भी चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है.

कौशलेन्द्र के नाम की घोषणा होने के तुरंत बाद ही लखनऊ में उनके पहली पत्नी ऋतु सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि कौशलेन्द्र उन्हें प्रताड़ित करते थे और बेटी के जन्म लेने के बाद मारते-पीटते थे. उनकी पहली पत्नी ऋतू सिंह ने जबरन तलाक देने भी आरोप लगाए हैं और बिना तलाक दिए दूसरी शादी करने के सवाल पर कौशलेन्द्र समेत वरिष्ठ बीजेपी नेता भी मौन हैं.

वाराणसी में यह चर्चा पहले से आम है कि कौशलेन्द्र की पहली पत्नी की बेटी गांव के सरकारी स्कूल में मिड डे मील खाकर रह रही है और उनकी दूसरी पत्नी से हुआ बेटा ठाट से एक नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ रहा है. यह आरोप उन पर महापौर चुनाव के दौरान भी लगा था लेकिन मीडिया मैनेजमेंट और लखनऊ के कुछ प्रभावशाली लोगों की कृपा के कारण वे बच निकले थे.

मीडिया में कौशलेन्द्र के नाम की घोषणा होने के बाद से ही यह बात भी उछली कि कौशलेन्द्र को डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का करीबी माना जाता है. हालांकि यह नजदीकियां कब शुरू हुईं, इस बाबत किसी ने भी कोई टिपण्णी करने से इंकार किया लेकिन जानकार बताते हैं कि कौशलेन्द्र कभी मुरली मनोहर जोशी के भी खास थे और 2014 के चुनाव के दौरान उन्होंने बीजेपी के काफी करीब माने जाने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के समक्ष भी कई साल गणेश परिक्रमा की थी.

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कौशलेन्द्र मिर्जापुर सीट से टिकट चाहते थे लेकिन उनकी जगह अनुप्रिया पटेल को टिकट मिला और उन्हें इंतजार करने को कहा गया. 2017 में पुनः उन्होंने मिर्जापुर की चुनार और वाराणसी की रोहनिया विधानसभा से टिकट की दावेदारी पेश की थी और अपने नाम के आगे पटेल शब्द का इस्तेमाल करना भी शुरू किया था लेकिन इस बार भी उन्हें टिकट नहीं मिल पाया.

विधानसभा चुनाव के दौरान कौशलेंन्द्र को काशी प्रांत की परिवर्तन यात्रा की जिम्मेदारी दी गई थी. इस दौरान वे काशी प्रांत के सभी जिलों में परिवर्तन यात्रा लेकर गए थे. हाल ही में हुए निकाय चुनाव में वे बरेली महानगर के प्रभारी के रूप में कार्य कर चुके हैं और उस वक्त तक उनका नाम फूलपुर के लिए चर्चा में नहीं था.

कौन हैं कौशलेन्द्र 

कौशलेन्द्र का जन्म मिर्जापुर के मगरहां गांव में हुआ. बीजेपी के कद्दावर नेता ओम प्रकाश सिंह भी इसी गांव से हैं, लिहाजा कौशलेन्द्र की शुरुआती राजनीतिक महत्वाकांक्षा ओमप्रकाश को देखकर बलवती हुई. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक तक की पढ़ाई के बाद उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से राजनीति में कदम रखा.

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इसके बाद उन्हें बीजेपी के युवा मोर्चा में प्रदेश कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई जिसके पीछे भी ओम प्रकाश सिंह की भूमिका थी. इसी दौरान उन्हें वाराणसी से मेयर का टिकट दिया गया. बीजेपी के पूर्व मंत्री ओम प्रकाश सिंह ने कौशलेंन्द्र को राजनीति का ककहरा सिखाया लेकिन धीरे-धीरे कौशलेन्द्र उन्हें बाईपास करके आगे बढ़ने में लग गए. पार्टी में अन्य पिछड़ी जातियों वरिष्ठ नेताओं का एक खेमा लंबे समय से कौशलेन्द्र का विरोध करता आया है और इसी कारण उन्हें 2012 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिल पाया था.

जातिगत रस्साकशी बनाम कुर्मी वोटों का ध्रुवीकरण

हालिया दौर की चर्चाओं को अगर मानें तो कौशलेन्द्र को न तो ओमप्रकाश सिंह का खेमा पसंद करता है और न ही अनुप्रिया पटेल का खेमा उन्हें आगे बढ़ते देखना चाहता है. साल 2014 लोकसभा चुनाव के छह महीने के अंदर हुए रोहनियां विधानसभा के उपचुनाव में कौशलेन्द्र ने टिकट की दावेदारी की थी. मगर इस सीट पर अनुप्रिया पटेल ने बीजेपी-अपनादल गठबंधन के नाते अपनी मां कृष्णा पटेल को चुनाव में उतारा था.

कौशलेन्द्र ने कृष्णा पटेल का खुल कर विरोध किया और कुर्मी जाति के वोटों को उनके विरुद्ध लामबंद किया था जिसके कारण कृष्णा पटेल को हार का मुंह देखना पड़ा और इस सीट से एसपी के पूर्व मंत्री सुरेन्द्र पटेल के छोटे भाई महेन्द्र पटेल को जीत मिली थी. उन चुनावों के बाद से ही अनुप्रिया पटेल व कौशलेन्द्र के बीच राजनीतिक रिश्ते कभी मधुर नहीं रहे. गौरतलब है कि कौशलेन्द्र का मूल निवास अनुप्रिया के संसदीय क्षेत्र में ही पड़ता है.

ठीक उसी तरह वरिष्ठ बीजेपी नेता ओम प्रकाश सिंह ने भी कौशलेन्द्र के लिए रास्ते कठिन कर दिए और 2017 विधानसभा चुनाव में कौशलेन्द्र ने जब रोहनियां के अलावा चुनार विधानसभा सीट से भी टिकट की दावेदारी की थी. मगर कौशलेन्द्र को दोनों स्थानों में से किसी एक से भी टिकट नहीं मिल पाया और इसके पीछे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सिंचाई मंत्री रहे ओमप्रकाश सिंह का हाथ बताया जाता है.

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ओमप्रकाश सिंह व कौशलेन्द्र रिश्ते में चाचा-भतीजे हैं, दोनों परिवार आज के समय में राजनीतिक रूप से धुर विरोधी हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार बीते विधानसभा चुनाव में ओमप्रकाश सिंह ने कौशलेन्द्र के टिकट को लेकर खुला विरोध किया और अंततः अपने बेटे अनुराग सिंह को टिकट दिलाने में कामयाब रहे, जिन्हें बाद में जीत भी मिली.

क्यों दिया गया बनारस से इंपोर्टेड नेता को टिकट 

अंदरखाने में चल रही चर्चाओं के अनुसार कौशलेन्द्र को पिछड़े वर्ग की राजनीति की नई खेमेबाजी का फायदा मिला है, पार्टी में उनके विरोधी उन्हें 'मैनेजर' कहते हैं. और शायद इसी कारण चुनार और वाराणसी का होने के बावजूद उन्हें फूलपुर से टिकट दिया गया. फूलपुर लोकसभा सीट के लिए बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने पूरी ताकत लगा रखी थी और हाल ही में बीएसपी छोड़ कर आईं केशरी देवी पटेल को तो चुनाव की तैयारी करने के लिए कह दिया गया था. लेकिन अंतिम समय में कौशलेन्द्र के नाम की घोषणा ने सबको चकित कर दिया.

फूलपुर में करीब ढाई लाख पटेल वोटर हैं लेकिन पटेल समुदाय में अंतर्जातीय गुटबाजी भी चरम पर है इसी कारण से पटेल वोटों का बंटवारा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इलाहाबाद में सिंगरौर कुर्मियों की संख्या अधिक है और वे अपने को कुर्मियों में उच्च मानते हैं. जबकि कौशलेन्द्र जैसवार कुर्मी हैं. ऐसे में उन्हें इलाहाबाद के कुर्मी स्वीकार नहीं कर रहे.

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वहीं दूसरी तरफ अनुप्रिया पटेल की नजर इसी सीट पर से अपने पति को लड़ाना चाहती थीं लेकिन उन्हें टिकट न मिलने के कारण अब यह तय है कि अनुप्रिया का खेमा भी विरोध में ही रहेगा. हालांकि, बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व मान कर चल रहा है कि उन्हें कोइरी (कुशवाहा, मौर्या, शाक्य) वोट मिलेंगे. बीजेपी यह भी मानती है कि अगर कांग्रेस के प्रत्याशी मनीष मिश्रा मजबूत चुनाव नहीं लड़ पाए तो सवर्ण वोट काफी हद तक बीजेपी के साथ ही रह जाएगा. जो फिलहाल बीजेपी से खासा नाराज है.

समाजवादी पार्टी बनाम बीजेपी 

समाजवादी पार्टी ने भी कुर्मी समुदाय के नागेंद्र पटेल को टिकट दिया है, जो पेशे से ठेकेदार हैं मगर उनकी राजनीतिक जमीन बहुत मजबूत नहीं रही है. कुछ महीने पहले हुए ब्लॉक प्रमुख चुनाव में वे अपने भाई को नहीं जिता पाए थे. हालांकि, इस चुनाव में समीकरण अलग हैं क्योंकि एसपी के पास करीब ढाई लाख यादव वोट हैं जिस कारण वे खुद को लड़ाई में मान रहे हैं. वैसे भी फूलपुर सीट का यह उपचुनाव समाजवादी पार्टी के लिए किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं और बीजेपी से सीट छीनने के लिए पार्टी ने अपने सभी दिग्गजों को प्रचार में उतारने का फैसला किया है.

कुछ दिन पहले ही अखिलेश ने स्वामी प्रसाद मौर्य के भतीजे प्रमोद मौर्य को पार्टी में शामिल किया है. प्रमोद फूलपुर से सटे प्रतापगढ़ से जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं. प्रमोद के जरिए एसपी की कोइरी वोट पर नजर है. 2014 मोदी लहर में समाजवादी पार्टी फूलपुर में दूसरे नंबर पर थी और वोटों का अंतर अधिक था.

क्या कांग्रेस कुछ कर पाएगी 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आखिरी सांसे गिन रही कांग्रेस ने ब्राम्हण कार्ड खेलते हुए मनीष मिश्रा को उम्मीदवार बनाया है. मनीष पिछले 15 सालों से कांग्रेस में सक्रिय हैं और इनके पिता श्री जेएन मिश्रा इंदिरा गांधी के एपीएस थे और कमलापति त्रिपाठी जब रेल मंत्री बने तो उनके भी पीएस रहे. इस दौरान इन्होंने इलाहाबाद और आसपास के बहुत लोगों को रेल में नौकरियां दी थीं, जिस कारण आज भी उन्हें स्थानीय लोग याद करते हैं. गांधी परिवार से नजदीकियां होने के कारण जेएन मिश्रा इलाहाबाद में कई बार विधान सभा का चुनाव लड़े, लेकिन कभी जीत नहीं पाए. पटेल वोटों के बाद इस सीट में ब्राह्मण वोट सबसे ज्यादा हैं और इस नजरिए से मनीष को कुछ अतिरिक्त दलित वोटों के सहारे जीत की आस है.

क्या है फूलपुर का जातिगत गणित

फूलपुर संसदीय क्षेत्र में पटेल मतदाता करीब सवा दो लाख से ढाई लाख के बीच हैं. मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है. इसके अलावा लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता भी हैं. फूलपुर लोकसभा की सोरांव, फाफामऊ, फूलपुर और शहर पश्चिमी विधानसभा सीट ओबीसी बाहुल्य हैं. इन विधानसभा क्षेत्रों में कुर्मी, कुशवाहा और यादव वोटर सबसे अधिक हैं.

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फूलपुर सीट पर समाजवादी पार्टी का भी मजबूत जनाधार है, 1996 से लेकर 2004 तक समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार यहां से लगातार जीतता रहा है. फूलपुर लोकसभा सीट से कुर्मी समाज के कई सांसद बने हैं. प्रो. बी.डी. सिंह के बाद रामपूजन पटेल तीन बार सांसद बने उनके बाद जंग बहादुर पटेल दो बार एसपी के टिकट पर सांसद रह चुके हैं. इसके बाद एसपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक अहमद को फूलपुर से प्रत्याशी बनाया, वो जीते भी. इसके बाद 2009 के चुनाव में बीएसपी के टिकट पर पंडित कपिल मुनि करवरिया चुने गए और 2014 में बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल की.

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बहरहाल पिछले चुनावों की रिकार्ड जीत और जातिगत समीकरण को देखें तो बीजेपी का पलड़ा अब भी भारी है. पटेल, मौर्य, कायस्थ और कुछ हद तक सवर्ण अब भी बीजेपी की तरफ हैं. लेकिन अगर मुसलमान वोट एक साथ समाजवादी पार्टी की तरफ झुके तो एसपी भी कमजोर नहीं पड़ेगी. ऐसे में जीत की चाबी दलितों के पास है और दलित वोट जिस तरफ रुख करेगा उसे फूलपुर में जीत मिलेगी. हालांकि, दलित समुदाय समाजवादी पार्टी से परहेज रखता है और अगर उसके सामने सिर्फ एसपी और कांग्रेस का ही विकल्प हुआ तो वो कांग्रेस पर ही मुहर लगाएगा.

बीएसपी के इस उपचुनाव में न होने कारण लड़ाई और भी रोमांचक स्थिति में है. स्थानीय बाहुबली अतीक अहमद के भी मैदान में उतर जाने से अब यह लड़ाई चतुष्कोणीय हो चली है क्योंकि अतीक इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं और उन्हें इस क्षेत्र की आबोहवा का भान भी है. जवाहरलाल नेहरू से लेकर अतीक अहमद तक और उसके बाद कपिल मुनि करवरिया से लेकर केशव मौर्य तक फूलपुर की सीट ने ऐतिहासिक चुनाव देखे हैं. देखना होगा कि इस बार फूलपुर से कौन जीत का फूल लेकर संसद में जाता है.

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