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यूपी: फूलपुर में बागी तो गोरखपुर में कांग्रेस ने बिगाड़ा 'साइकिल' का खेल

यूपी मे दो लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए 11 मार्च को मतदान किया जाएगा

Syed Mojiz Imam Updated On: Feb 22, 2018 08:33 AM IST

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यूपी: फूलपुर में बागी तो गोरखपुर में कांग्रेस ने बिगाड़ा 'साइकिल' का खेल

यूपी मे दो लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए 11 मार्च को मतदान किया जाएगा. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन न होने की वजह से गोरखपुर और फूलपुर में त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना है. कांग्रेस बीजेपी और समाजवादी पार्टी मैदान में हैं. बीएसपी चुनाव नहीं लड़ रही है, लेकिन मायावती ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. बीएसपी के नेताओं का कहना है कि पार्टी उपचुनाव नहीं लड़ती है.

यूपी की दोनों सीटों के लिए बीजेपी ने गोरखपुर से उपेंद्र शुक्ला और फूलपुर से कौशलेन्द्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है. जबकि कांग्रेस ने गोरखपुर से सुरहिता करीम और फूलपुर से मनीष मिश्रा को टिकट दिया है. वहीं समाजवादी पार्टी ने दोनों ही सीट पर पिछड़ों पर दांव लगाया है. गोरखुर से प्रवीण निषाद और फूलपुर से नागेन्द्र पटेल को मैदान में उतारा है, लेकिन आखिरी वक्त में समाजवादी पार्टी के बागी अतीक अहमद ने फूलपुर से पर्चा दाखिल कर दिया. जिससे समाजवादी पार्टी की दिक्कत बढ़ गई.

अतीक अहमद ने क्यों भरा पर्चा

बाहुबली से नेता बने अतीक अहमद फूलपुर से सांसद रह चुके हैं. 2014 में समाजवादी पार्टी ने अतीक अहमद को श्रावस्ती से टिकट दिया लेकिन अतीक चुनाव नहीं जीत सके. एसपी के वर्तमान अध्यक्ष अखिलेश यादव अतीक को चुनाव लड़ाने के पक्ष में नहीं थे. उपचुनाव में अतीक अहमद का उतरना बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. क्योंकि एसपी के सजातीय उम्मीदवार खड़ा करने से बीजेपी के मुश्किल बढ़ गई थी. अतीक अहमद इस सीट पर दावा इसलिए भी करते रहे हैं क्योंकि इलाहाबाद की दो विधानसभा इस लोकसभा में शामिल हैं. समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि इससे चुनाव पर असर नहीं पड़ेगा.

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समाजवादी पार्टी का गड़बड़ाया गणित

समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के चयन से बीजेपी सकते में थी लेकिन पार्टी का खेल दोनों जगह बिगड़ता दिखाई दे रहा है. गोरखपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार से समाजवादी पार्टी को नुकसान हो सकता है. कांग्रेस की उम्मीदवार सुरहिता करीम जानी मानी डॉक्टर हैं. 2012 में बीजेपी के मेयर उम्मीदवार को जबरदस्त टक्कर भी दे चुकी हैं. माना जा रहा है सुरहिता करीम समाजवादी पार्टी के वोट में सेंध लगा सकती हैं.

बीजेपी ने उपेंद्र शुक्ला को सोच समझकर मैदान में उतारा है. पार्टी ने उपेंद्र शुक्ला की उम्मीदवारी से ब्राह्मण वोट को साधने की कोशिश की है. वहीं फूलपुर में बीजेपी ने कुर्मी उम्मदीवार उतारा जिसके जवाब में एसपी ने सजातीय नागेंद्र पटेल को मैदान में उतारा. कांग्रेस के ब्राह्मण उम्मीदवार से बीजेपी को और नुकसान हो सकता था लेकिन अतीक अहमद के आने से समाजवादी पार्टी का राजनीतिक गणित गड़बड़ हो गया है.

मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की साख दाव पर

गोरखपुर सीट योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से खाली हुई है. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ विधान परिषद के सदस्य हैं. गोरखपुर परपंरागत रूप से बीजेपी की सीट है. 1989 से बीजेपी के कब्जे में ये सीट है. योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद चुने गए. इससे पहले तीन बार महंत अवैद्यनाथ सांसद थे. जाहिर यहां का समीकरण बीजेपी के पक्ष में लगातार रहा है, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री की साख दांव पर है. 2014 में योगी आदित्यनाथ ने 3 लाख से ज्यादा वोट से इस सीट पर विजय दर्ज की थी. वहीं फूलपुर बीजेपी के लिए पहली बार 2014 में केशव मौर्य ने जीता.

इस जीत के बाद केशव मौर्या का पार्टी में कद भी बढ़ा और प्रदेश अध्यक्ष भी बनाए गए. बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग का नायाब तरीका विधानसभा चुनाव में निकाला. जिससे बीजेपी को प्रदेश में 300 से ज्यादा सीट मिली. लेकिन फूलपुर में विधानसभा चुनाव में बीजेपी को लोकसभा के मुकाबले कम वोट मिले. जिससे बीजेपी परेशान है. इसलिए फिर से पिछड़े उम्मीदवार पर दांव लगाया गया है. केशव प्रसाद मौर्या को 2014 में तीन लाख से ज्यादा वोट से जीत मिली थी. इससे पहले 2009 में बीजेपी उम्मीदवार को सिर्फ 44000 वोट मिले थे. बीजेपी इस सीट को हर हाल में जीतना चाहती है.

योगी सरकार का लिटमस टेस्ट

Yogi Adityanath Keshav prasad maurya

बीजेपी सरकार के एक साल पूरे हो रहे हैं. ऐसे में सरकार के कामकाज का असर इस चुनाव में होने वाला है. हालांकि सरकार का दावा है कि यूपी में काम खूब हुए हैं लेकिन सरकार अपराध रोकने में कामयाब नहीं हो पा रही है. यूपी सरकार पर एनकाउंटर में भी भेद भाव का आरोप लग रहा है. कासगंज में 26 जनवरी को हिंसा भी हुई. समाजवादी पार्टी का आरोप है कि योगी सरकार ने विकास का कोई काम नहीं कराया है बल्कि समाजवादी पार्टी की सरकार मे किए काम का श्रेय ले रही है.

नेहरू की सीट है फूलपुर

कांग्रेस से लिए ये सीट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योकि जवाहर लाल नेहरू इस सीट से चुने गए. बाद में विजय लक्ष्मी पंडित और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी सांसद बने लेकिन ये सीट समाजवादी पार्टी के कब्जे में काफी दिन तक रही. 2009 में बीएसपी ने ये सीट जीती. जाहिर है कि कांग्रेस चाहती है कि उनका उम्मीदवार इस सीट से चुनाव जीते.

अखिलेश के लिए भी कड़ा इम्तिहान

फूलपुर में जातीय समीकरण कुर्मी बिरादरी के पक्ष में है. यहां सबसे ज्यादा कुर्मी वोट है. इसलिए अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के नेता बेनी प्रसाद वर्मा के घर पहुंच कर जन्मदिन की बधाई भी दी. अखिलेश यादव ने 2017 नें बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र राकेश वर्मा को पार्टी का टिकट नहीं दिया था. ब्राह्मण वोट भी करीब डेढ़ लाख है. जो पासा पलट सकता है. समाजवादी पार्टी के लिए दोनों में से एक सीट जीतना अखिलेश यादव की प्रतिष्ठा बढ़ाएगा.

दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री की आम चुनाव से पहले साख बढ़ेगी. समाजवादी पार्टी अभी अपने आप को बीजेपी के मुकाबले खड़ा कर रही है. समाजवादी पार्टी विरोधी मतों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है. एसपी नेताओं का कहना है कि बीजेपी को सिर्फ वहीं टक्कर दे सकते हैं. इसलिए अखिलेश यादव ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ लिया है.

Mayawati

बीएसपी निकाय चुनाव में ताकत बनकर उभरी है. लेकिन विधानसभा चुनाव में मायावती के कोर वोट में बीजेपी ने सेंध लगा दिया है. मायावती को फिर से पैर जमाने में वक्त लग सकता है. कांग्रेस-समाजवादी पार्टी-बीएसपी के साथ आम चुनाव में गठबंधन को लेकर इच्छुक है. कांग्रेस को लग रहा है कि बीजेपी को रोकने के लिए बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनने से बात बनेगी लेकिन ये आसान नहीं है. किसी भी तरह के गठबंधन को करने के लिए कांग्रेस को पहल करनी पड़ेगी.

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