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गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव में मतदाताओं के ‘मौन’ के पीछे छिपा है कौन सा 'तूफान'?

एसपी-बीएसपी का गठबंधन यदि उपचुनाव की सीट निकाल लेता है तो इसका संदेश ये जाएगा कि विपक्ष अगर आपसी मतभेद भुलाकर तबीयत से पत्थर उछाले तो शायद बीजेपी के आसमां में सुराख हो सकता है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 14, 2018 11:04 AM IST

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गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव में मतदाताओं के ‘मौन’ के पीछे छिपा है कौन सा 'तूफान'?

गोरखपुर और फूलपुर में उपचुनाव हो गए हैं. 14 मार्च को नतीजे आ जाएंगे. लेकिन नतीजे आने से पहले मतदाताओं का मौन कई सवाल खड़े कर रहा है. दोनों जगहों पर कम मतदान को देखकर ये समझना मुश्किल हो गया है कि आखिर जनता का मूड क्या कहता है?

दरअसल चार साल पहले गोरखपुर में लोकसभा चुनाव के वक्त 54.67 प्रतिशत वोटिंग हुई थी जबकि इस बार उपचुनाव में ये गिरकर 47.45 फीसदी हो गई. जिस ‘मोदी लहर’ में यूपी में बीजेपी ने 73 सीटें हासिल की थीं उसी यूपी में 4 साल बाद मतदाताओं का नीरस मतदान किस दिशा में संकेत दे रहा है? ऐसी क्या वजह है कि चार साल बाद हुए उपचुनाव में वोटिंग का स्तर इतने नीचे रहा?

गोरखपुर की सीट इसलिए भी मायने रखती है क्योंकि ये सीट यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की वजह से खाली हुई थी.योगी आदित्यनाथ इस सीट पर 5 बार सांसद रह चुके हैं. योगी आदित्यनाथ बाद में विधान परिषद के लिए चुन लिए गए. ऐसे में उपचुनाव में इस बार यहां के मतदाताओं से प्रचंड उत्साह की अपेक्षा थी.

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इसी तरह फूलपुर के उपचुनाव में भी इस बार मात्र 37.40 फीसदी मतदान हुआ. जबकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ये 50.20 फीसदी था. फूलपुर की सीट ने भी यूपी को एक डिप्टी सीएम दिया है. यहां से सांसद रहे केशव प्रसाद मौर्य ने इस्तीफा देकर यूपी के उपमुख्यमंत्री का पद संभाला है. मौर्य भी यहां से चुनाव जीतने के बाद विधान परिषद के लिए चुन लिए गए थे. यहां भी देखा जाए तो मतदाताओं से भारी तादाद में वोटिंग की अपेक्षा थी.

वीआईपी सीटों पर शांत क्यों शहरी वोटर?

दोनों वीआईपी सीटें न सिर्फ बीजेपी बल्कि योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की साख से जुड़ी हुई हैं. गोरखपुर ने यूपी को सीएम दिया तो फूलपुर ने डिप्टी सीएम. इसके बावजूद शहरी वोटर की तरफ से ज्यादा निराशा हाथ लगी. आखिर ऐसी क्या वजह है कि शहरी मतदाता घरों से बाहर नहीं निकले? जबकि शहरी वोटर में बीजेपी की पकड़ मजबूत मानी जाती है. गोरखपुर में बीजेपी के लिए शहरी वोटर ने उत्साह कम दिखाया. क्या इसकी बड़ी वजह ये है कि योगी आदित्यनाथ के चुनाव मैदान में न होने से मतदाताओं में वो ऊर्जा नहीं दिखी?

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फूलपुर में रहा है एसपी-बीएसपी का दबदबा

पांच विधानसभा वाली फूलपुर की सीट पर एसपी और बीएसपी का दबदबा देखा गया है. एसपी की तरफ से अतीक अहमद, धर्मराज पटेल और जंग बहादुर यहां से सांसद रहे हैं. जबकि सोशल इंजीनियरिंग के बूते बीएसपी ने भी साल 2009 की ये सीट कपिल मुनि करवरिया के जरिए जीती थी.

इन उपचुनावों की अहमयित इसी बात से समझी जा सकती है कि एसपी-बीएसपी ने अनौपचारिक गठबंधन कर इसे रोमांचक बना दिया था. इसके बावजूद गोरखपुर में जहां 7 फीसदी कम वोटिंग हुई तो फूलपुर में 13 फीसदी मतदान कम हुआ. फूलपुर में भी कम मतदान होना सांकेतिक रूप से किसी भी दल के लिए सुखद नहीं है. फूलपुर लोकसभा के इलाहाबाद पश्चिमी क्षेत्र में 31 प्रतिशत जबकि इलाहाबाद उत्तर में 21.6 फीसदी मतदान हुआ.

हालांकि इन उपचुनावों से केंद्र और राज्य सरकार की सेहत पर असर नहीं पड़ता है लेकिन जब साख का सवाल हो तब ये जरूर मायने रखता है. यही वजह थी कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने 22 साल पुरानी रंजिश को भुला कर इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मायावती के समाजवादी पार्टी को समर्थन देने के पीछे सियासी गणित कम बल्कि मजबूरी ज्यादा थी. तभी जीत किसी भी कीमत के फॉर्मूले क तहत अगर समाजवादी पार्टी अपने कोर वोटर्स को पोलिंग बूथ ले जाने में कामयाब रहती है तो कम वोटिंग के बावजूद उसके लिए मतगणना की 14 मार्च की तारीख 'अच्छा दिन' साबित हो सकती है.  ऐसे में इलाहाबाद में शहरी इलाकों में कम वोटिंग का फायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है. पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी यहां दूसरे स्थान पर रह चुकी है.

लेकिन फूलपुर में 13 फीसदी मतदान की गिरावट बीजेपी के खिलाफ बने गठबंधन के लिए भी सवाल है. क्या मतदाताओं को गठबंधन रास नहीं आया?  या फिर वोटिंग की गिरावट के बावजूद गठबंधन का प्रयोग साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए हिट फॉर्मूला साबित हो सकता है?

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अगर एसपी-बीएसपी का गठबंधन उपचुनाव की सीटें निकाल लेता है तो इसका राष्ट्रीय स्तर पर संदेश जाएगा. ये माना जाएगा कि विपक्ष अगर आपसी मतभेद भुलाकर आसमान में तबीयत से पत्थर उछाले तो शायद बीजेपी के आसमां में सुराख हो सकता है. लेकिन वोटिंग प्रतिशत देखकर एसपी-बीएसपी के गठबंधन को भी निराशा हाथ लगी होगी. जबकि बीजेपी दूसरी तरफ ये सोच कर खुश हो सकती है कि सूबे में सत्ता विरोधी लहर न होने की वजह से वोटिंग सामान्य रही.

जबतक नतीजे नहीं आ जाते तबतक बीजेपी, एसपी और बीएसपी की सांस अटकी रहेगी. दरअसल ये दोनों ही सीटें जातीय समीकरणों के भंवरजाल में उलझी हुई थीं. ऐसे में एसपी-बीएसपी का सियासी चौसर पर गठजोड़ और उसके बाद कम मतदान चुनावी नतीजों को रोमांचक बना सकता है. अब 14 मार्च को मतगणना के बाद ही ये साफ हो सकेगा कि मतदाताओं के मौन में आखिर कौन सा राज छिपा हुआ था?

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