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यूपी की हार के लिए अखिलेश ही हैं जिम्मेदार: सीपी राय

नेताजी के प्रचार किए 3 जगहों में से हम 2 स्थान पर जीते हैं, इसका मतलब है कि लोगों के बीच उनकी साख है

Updated On: Mar 17, 2017 11:00 AM IST

Sanjay Singh

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यूपी की हार के लिए अखिलेश ही हैं जिम्मेदार: सीपी राय

उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनावों में करारी हार ने अखिलेश यादव के लिए स्थिति संकटपूर्ण बना दी है. चुनाव से चंद महीने पहले उन्होंने अपने पिता और पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया था और खुद को पार्टी की सर्वोच्च पद पर ला बिठाया था.

उनके प्रदर्शन में पार्टी 177 से सीटों से गिरकर मात्र 47 सीटों पर पहुंच गई है जो अब तक की उसकी सबसे कम सीटें हैं. अब हालत ऐसे पैदा हो गए हैं कि अखिलेश के नेतृत्व क्षमता की खुले तौर पर भीतर और बाहर से सवाल उठाए जा रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट के राजनीतिक संपादक संजय सिंह ने सीपी राय से सीधी और स्पष्ट बातचीत की. सीपी राय वही हैं जिन्होंने आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी के निर्माण की पेशकश की थी.

इसके साथ ही इस पार्टी के जन्म से ही वह इसके महासचिव रहे हैं. वह इस पार्टी के प्रवक्ता और मुलायम सिंह यादव के एक भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर भी जाने जाते हैं.

सीपी राय ने राहुल गांधी से गठबंधन करने की अखिलेश की राजनीतिक समझ पर और उसके बाद कुछ एग्जिट पोल के नतीजों के आधार पर बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए मायावती से जुड़ने की मंशा पर सवाल खड़े किये.

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मुलायम सिंह का गठबंधन के लिए प्रचार नहीं करना भी हार की वजहों में से एक है (फोटो: पीटीआई)

उनका ख्याल है कि, बीजेपी ने मंडल और कमंडल को एक साथ मिला कर बड़ी ही चतुराई से कई मोर्चों पर अपना उल्लू सीधा किया.

राय ने अखिलेश से अपील की है कि वह मुलायम सिंह को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर वापिस आने दें और फिर से सभी समाजवादियों को एक साथ मिलकर साथ काम करने दें. इस तरह अखिलेश को भी अपने विकास के लिए पूरा समय मिल सकेगा.

फ़र्स्टपोस्ट: आपको क्या लगता है कि बीजेपी को इस तरह की भारी जीत कैसे मिली और क्यों समाजवादी पार्टी की चुनाव में करारी हार हुई?

राय: कुछ चीजें हैं जो आत्मनिरीक्षण के लिए हमारे पास आनी चाहिए. मैंने मुलायम सिंह यादव को बताया था कि एक बात हमें बीजेपी की तो माननी ही पड़ेगी कि उस पार्टी में किसी भी समय कोई भी कुछ भी हो सकता है, चाहे उसका उपनाम कोई भी हो. हम नहीं जानते कि मोदी और अमित शाह की जाति क्या है.

बीजेपी एक संदेश देने में सफल रही कि एसपी के लिए पिछड़े वर्ग का मतलब केवल यादव होता है और मायावती का दलित सिर्फ जाटव होता है. ये दोनों ही मुसलमानों के समर्थन से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. मुलायम सिंह यादव का अपमान भी एक मुद्दा था और उसके कारण भी कुछ यादव बीजेपी की तरफ छिटक गए.

फ़र्स्टपोस्ट: यह मुलायम सिंह यादव ही थे जिन्होंने 1989 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था और हाशिये पर ला पटका था. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी के लिए संपत्ति बन गई?

राय: कांग्रेस में शीला दीक्षित जैसे लोग दिल्ली के लोगों के लिए जोरदार हो सकते हैं. कांग्रेस में पुराने थके हुए लोग हैं जो पचास साल से पार्टी से जुड़े हुए तो हैं और लेकिन जिन्होंने पार्टी के लिए किया कुछ भी नहीं है. वहां बस वो ही नजर आते हैं. ऐसे लोगों को तो उनके पड़ोसी भी पसंद नहीं करते.

ये कांग्रेस की संस्कृति है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि वहां राहुल गांधी को नेता बनाने की कोशिश चल रही है. मैंने राहुल गांधी के बारे में कहा है कि वह महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी हैं.

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गांधीजी ने 1947 में कहा था कि स्वतंत्रता की लड़ाई खत्म हो गई है अब समय आ गया है कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए. राहुल गांधी कांग्रेस के असली अनुयायी बन कर गांधीजी के शब्दों को सार्थक करेंगे.

इस दौरान अब उनको मोदी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश जारी रहेगी. बीजेपी और मोदी जान-बूझकर राहुल को बहुत महत्व देते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि जब तक उस तरफ राहुल हैं कोई भी बीजेपी को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता.

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अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था (फोटो: पीटीआई)

फ़र्स्टपोस्ट: लेकिन अखिलेश यादव कहते थे कि ये दो नौजवानों और साथ आ रही दो शक्तिशाली ताकतों के बीच का गठबंधन है.

राय: इसके पीछे एक मामूली सच छुपा हुआ है. वास्तव में अखिलेश यादव राहुल गांधी जैसे ही राजनीतिक व्यक्ति हैं. अगर हम अपने आप में नहीं लड़े होते तो हम इन चुनावों में अच्छी हालत में होते. हम अगर चुनाव हार भी जाते तो भी हमें लगभग 140 सीटें मिलतीं.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आप यह कह रहे हैं कि अखिलेश राजनीतिक नहीं हैं?

राय: होता ये है कि जब आपको अचानक सत्ता मिल जाती है तो आपको नौकरशाही का भारी नशा हो जाता है. आप इस बात को रिकॉर्ड्स में जांच लें कि कोई भी दिन ऐसा नहीं होगा जब अखिलेश जी ने इंदिरा प्रतिष्ठान, ताज होटल और दूसरी जगहों पर दो-तीन कार्यक्रमों में भाग नहीं लिया होगा और उन सभी कार्यक्रमों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होगा.

ऐसा नौकरशाहों द्वारा उनको अपने साथ व्यस्त रखने के लिए जानकर किया गया था. सूट-टाई वाले, अंग्रेजी बोलने वाले लोग वहां हुआ करते थे जो कि तारीफों के पुल बांधा करते थे. नतीजतन उनके पास अपने ही लोगों से और अपनी पार्टी के लोगों से बात करने का समय नहीं होता था.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या अखिलेश अपनी पार्टी के नेताओं को जरूरत के मुताबिक वक्त नहीं दे रहे थे? क्या वे उनसे पर्याप्त बातचीत नहीं कर रहे थे, उनसे प्रतिक्रिया नहीं ले रहे थे?

राय: मेरे जैसा व्यक्ति, जो पार्टी का महासचिव था, एक साल तक उनके साथ बात नहीं कर सका. कई मंत्रियों को उनसे मिलने के लिए समय नहीं मिलता था. कोई भी पार्टी इस तरह से नहीं चलती और उनके आसपास के युवा लोग मुंह देखी बातें ही करते थे जिनमें नौकरशाह भी शामिल थे.

ये लोग उनसे कहते रहते थे कि भैया आप ही जीत रहे हैं आप प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. इसका परिणाम यह होता है कि जब आप अपने दरवाजे के बाहर जिंदाबाद का शोर सुनते हैं तो उस शोर में वास्तविकता की आवाज दब जाती है. आपके घर के बाहर खड़े 1000-1500 व्यक्तियों के अलावा दूसरी तरफ 22 करोड़ की आबादी भी है लेकिन वो हिस्सा आपको दिखाई नहीं देता.

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यूपी चुनाव में बीजेपी की जीत के नायक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे (फोटो: पीटीआई)

फ़र्स्टपोस्ट: तब आप इससे सहमत होंगे कि, 'काम बोलता है' का नारा गलत था. वो कुछ ऐसा था जो सिर्फ नुकसान ही पहुंचा सकता था.

राय: आप बताइये, कैसे बलिया और गाजीपुर के लोग एक किलोमीटर या पांच किलोमीटर लंबी मेट्रो के साथ अपनी पहचान जोड़ पाएंगे. दूर के वो लोग जिन्होंने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे नहीं देखा है...वे भला किस तरह एक्सप्रेस-वे से अपने आपको जोड़ सकेंगे. आगरा के भीतर की जगहें और आगरा से जुड़ने वाली दूसरी जगहें टूटी-फूटी और धूल से भरी सड़कों की समस्या से ग्रस्त हैं.

क्या आपको लगता है कि उन क्षेत्रों के लोग बहुत संतुष्ट होंगे कि पास ही एक एक्सप्रेस-वे बनाया गया है. क्या आप बलिया-गाजीपुर-आजमगढ़ से होकर तेजी से जा सकते हैं?  जब वहां के लोगों के पास बुनियादी सुविधा ही नहीं है तो उनके लिए एक्सप्रेस-वे का क्या मतलब है.

एक्सप्रेस-वे को हमारे पैसे से बनाया गया है, किसी पूंजीवादी के पैसे से नहीं और तो और नौकरशाहों ने इस सड़क को 48 करोड़ रूपये प्रति किलोमीटर के खर्चे से बनाया है. जबकि ऐसी सड़कें आमतौर पर 15 करोड़ रूपये प्रति किलोमीटर की दर पर बनती हैं.

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मुख्यमंत्री ने बहुत पैसा खर्च कर गोमती के किनारे लाइटें लगा कर उसको सुंदर बनाने की कोशिश की लेकिन जो लोग गंदगी में रहते हैं उन्हें पीने के लिए पानी चाहिए, वो गोमती की लाइटें देखने नहीं आएंगे. ऐसी सतही चीजों पर काम कर के आप विकास का दावा नहीं कर सकते.

फ़र्स्टपोस्ट: इसका मतलब है कि बीजेपी का काम आसान था. उनके पास नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व भी था और अमित शाह की तरह संगठनात्मक संरचना को संभालने वाला शख्स भी. क्या उससे उनको कोई फायदा हुआ? क्या समाजवादी पार्टी के पास उनको टक्कर देने के लिए कुछ नहीं था?

राय: बीजेपी ने कई मोर्चों पर मुद्दों की तरफ ध्यान दिया था. एक तरफ तो वे सभी जातियों गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलितों के लोगों तक पहुंचे. दूसरी तरफ उन्होंने हिंदू समुदाय के दूसरे हिस्सों की चिंताओं को लक्ष्य किया.

इस तरह उन्होंने एक बार में ही मंडल और कमंडल को साध लिया. तीसरे मोर्चे पर मोदी को गरीबों के मसीहा के रूप में रख कर उन्होंने समाजवादियों के तख्त को हथिया लिया.

उनके पास उस समय ऐसे लोग भी थे जो अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग वर्गों के लोगों के साथ काम कर रहे थे. लेकिन एक जगह तो हैरानी मुझे भी है. वो इस बात की है कि जहां वोट केवल मुसलमानों के थे, बीजेपी के वोट थे ही नहीं - वहां बीजेपी कैसे जीत गई ये वाकई जांच का विषय है.

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चुनाव में हार से मायावती की पार्टी बीएसपी राजनीतिक तौर पर हाशिए पर चली गई है (फोटो: पीटीआई)

फ़र्स्टपोस्ट: अखिलेश को क्या हुआ था. क्या मुलायम सिंह ने अपने उम्मीदवारों का जो बोझ अखिलेश पर डाला था उससे उनकी परेशानी बढ़ गई थी?

राय: बात करें उन 45 नेताओं की जो एसपी के टिकट पर जीते हैं तो उनमें से चार-पांच को छोड़कर बाकी सभी वो ही जीते हैं जिनको नेताजी द्वारा टिकट दिए गए थे. शिवपाल यादव को हराने की सारी कोशिशें हुईं लेकिन नेताजी ने वहां प्रचार किया और शिवपाल 52 हजार मतों के अंतर से जीते.

पारसनाथ यादव जौनपुर में बहुत पीछे थे, लेकिन जब नेताजी वहां गए तो वे जीत गए. नेताजी के जाने के बाद भी लखनऊ कैंट से अपर्णा यादव हार गईं जबकि अखिलेश ने भी वहां प्रचार किया था. वजह साफ है, कैंट हमारी सीट कभी थी ही नहीं. वो एक कुलीन वर्ग की सीट है. तो अगर नेताजी तीन जगहों पर जाते हैं जिसमें से हम दो स्थान पर जीते हैं इसका यही मतलब है कि लोगों के बीच उनकी साख है.

फ़र्स्टपोस्ट: आप मानते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन एक बड़ी गलती थी. अखिलेश ने ऐसा क्यों किया और दूसरी बात कि इससे उनकी किस तरह की परिपक्वता नजर आती है, जब वह एग्जिट पोल के अनुमानों के आधार पर बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए मायावती के साथ गठबंधन की चाहत दिखाते हैं?

राय: ये सब अधकचरेपन और गैर-जिम्मेदार, गैर-राजनीतिक होने की निशानी है, उसके लक्षण हैं, प्रमाण हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: तो क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन एक बड़ी गलती थी...

राय: लोकसभा चुनाव के परिणाम देखें. उस परिणाम से साफ संकेत मिलता है कि लोगों का मानना था कि कांग्रेस सबसे भ्रष्ट पार्टी है और एक ऐसी पार्टी है जो लाखों करोड़ रुपये के घोटाले में शामिल थी. विनोद राय (सीएजी) की रिपोर्ट ने ये बात सबको बता दी थी. इसलिए देश में जिस किसी ने भी कांग्रेस का साथ लिया उसकी बुरी तरह से हार हुई है.

अगर हम मोदी लहर की बात करें तो वो बात सिक्के का एक पहलू है. इसका दूसरा पहलू ये है कि खुद कांग्रेस और उसके अलावा जो भी कांग्रेस का साझेदार बना, बुरी तरह हारे. जो लोग कांग्रेस के साथ नहीं थे जैसे कि ओडिशा में बीजेडी, तमिलनाडु में एआईएडीएमके - उनकी पार्टियां जीतीं और वो भी दो-तिहाई बहुमत के साथ.

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लेकिन हमने उनसे कोई सबक नहीं सीखा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. मैं कांग्रेस को सलाम करना चाहूंगा जो अपने-आपको खत्म करती नजर आ रही है लेकिन वो बिना राहुल गांधी के नेतृत्व के ऐसा नहीं कर पाएंगे.

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इस बार के यूपी चुनाव में एसपी और बीएसपी मुस्लिम मतदाताओं को लुभा पाने में कामयाब नहीं रहीं

फ़र्स्टपोस्ट: आपको क्या लगता है कि अखिलेश को आगे क्या करना चाहिए?

राय: अखिलेश जी ने चुनावों से पहले वादा किया था कि चुनाव तक के लिए पार्टी का अध्यक्ष पद मेरे पास रहने दें चुनाव के बाद मैं नेताजी को जीत उपहार में दूंगा और पार्टी अध्यक्ष का पद उन्हें सौंप दूंगा, आपको ये बात याद रखनी चाहिए.

इसलिए मैं अखिलेश जी से हाथ जोड़ कर निवेदन करता हूं कि मैं तो जहर का घूंट पी लूंगा और अपने जोखिम वाले इस निवेदन की वजह से होने वाले हर तरह के नुकसान को भुगतने को तैयार हूं, लेकिन अखिलेश जी को अपना वादा पूरा करना चाहिए और पार्टी को नेताजी को सौंप देना चाहिए.

हमने एक टीम के रूप में काम किया, पार्टी बनाई और कई बार सरकार बनाई है. हम फिर से पार्टी का निर्माण करेंगे और अखिलेश के भविष्य पर काम करना हमारी चिंता होगी. आखिरकार वे पार्टी का भविष्य बनने जा रहे हैं. दूसरा, मैं रामगोपाल यादव की नकारात्मक भूमिका और नकारात्मक चरित्र का विरोध करता हूं.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपको लगता है कि पार्टी के टुकड़े होंगे, जैसा कि शिवपाल यादव ने चुनाव से पहले कहा था?

राय: हम चाहते हैं कि पार्टी एकजुट रहे. हम सभी नेताजी के लिए प्रतिबद्ध हैं. फ़ारूख़ अब्दुल्ला को छोड़कर किसी दूसरे नेता ने अपनी विरासत (मुख्यमंत्री पद) बेटे को नहीं सौपी और केंद्र में मंत्री बने. किसी दूसरे नेता ने ऐसा नहीं किया लेकिन नेताजी ने ऐसा किया और आपको लगता है कि नेताजी आपके दुश्मन हैं?

मुझे पता है कि मैंने आज जिस दिशा में बात की है वो मुझे नुकसान पहुंचाएगी लेकिन मैं एक समर्पित समाजवादी हूं. वैसे भी किसी को तो इसकी शुरुआत करनी ही थी. मैं चाहता हूं कि पार्टी एकजुट रहे, बिखरे नहीं.

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