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यूपी चुनाव नतीजे 2017: बीजेपी की जीत से केंद्र की राजनीति पर क्या फर्क पड़ेगा?

बीजेपी पहली बार पूरे देश में एक अदम्य राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रही है

Updated On: Mar 11, 2017 04:32 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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यूपी चुनाव नतीजे 2017: बीजेपी की जीत से केंद्र की राजनीति पर क्या फर्क पड़ेगा?

चुनाव अभियान के रफ्तार पकड़ने के बहुत पहले बीजेपी नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के परिवार में अचानक मची खींचतान से हैरान रह गया था. चुनाव से ठीक पहले लखनऊ में हुए इस नाटक ने बीजेपी के राजनीतिक समीकरणों को बिगाड़ दिया था.

लग रहा था कि परसेप्शन की लड़ाई में अखिलेश यादव ने मीडिया की मदद से बढ़त बना ली है. जोरदार विज्ञापनों की मदद से नए नारे और जुमले गढ़े गए ताकि अखिलेश की छवि एक 'पीड़ित' की बने. बीजेपी के रणनीतिकार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन से भी विचलित हो गए थे.

बीजेपी के रणनीतिकार उस अंदरूनी सर्वे से भी परेशान थे जिसमें बताया गया था कि गठबंधन के पक्ष में करीब-करीब 90 फीसदी मुसलमान वोट कर सकते हैं. यह बड़ी बात थी क्योंकि मतदाताओं के प्रतिशत में थोड़ा सा भी बदलाव सीटों की संख्या में बड़ा बदलाव कर सकता है.

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यह सच है कि समाजवादी पार्टी के पास मुस्लिम-यादव समीकरण के 30 फीसदी वोट तो थे ही, यह भी डर था कि कांग्रेस के पारंपरिक वोटों का एक हिस्सा अगर समाजवादी पार्टी को मिला तो इसकी सीटों की संख्या और बढ़ सकती है.

मुसलमानों की दुविधा

यहीं से बीजेपी की जवाबी रणनीति की शुरुआत हुई जिसने समाजवादी पार्टी-कांग्रेस को मात दे दी. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी का प्रदर्शन सुधारने के लिए कई अस्त्रों से सजी-धजी एक रणनीति तैयार की. अब उन तथ्यों पर नजर डालिए जो सिर्फ संयोग नहीं नजर आते.

उदाहरण के लिए मीडिया में इस बात ने जोर पकड़ा कि मायावती ने सबसे ज्यादा (97) टिकट मुसलमानों को दिए हैं. यह भी संयोग नहीं था कि अखिलेश का प्रचार जब चरम पर था तब कुछ मुसलमान धर्म गुरुओं ने बसपा और मायावती को समर्थन दिया.

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इन लोगों ने मुसलमानों से अपील की कि वो बसपा को वोट दें. पहली बार मुसलमानों ने एक सामाजिक समूह के तौर पर अपने आप को समाजवादी पार्टी-कांग्रेस और बसपा में से किसी एक को चुनने को लेकर दुविधा में पाया.

जैसे-जैसे प्रचार आगे बढ़ा ये दुविधा बढ़ती चली गई क्योंकि अखिलेश-राहुल का गठबंधन जमीनी स्तर पर रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा था. उदाहरण के लिए कांग्रेस के परंपरागत सवर्ण मतदाताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया और बीजेपी ने अति पिछड़ी जातियों को जोड़ने के लिए लगातार अभियान चलाया.

उत्तर प्रदेश में करीब 36 फीसदी मतदाता अति पिछड़ी जातियों के हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी ने गैर जाट पिछड़ी जातियोें को अपने पाले में लाते हुए जाटों के गुस्से का भी फायदा उठा लिया.

शानदार बूथ मैनेजमेंट

ये भी सच है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की शानदार जीत के लिए सिर्फ अमित शाह की अगुवाई वाले पार्टी संगठन का बूथ माइक्रो मैनेजमेंट ही जिम्मेदार है.

लोकसभा चुनावों में जीत के ठीक बाद, अमित शाह ने बीजेपी संगठन में बदलाव किया था, जो कि बीजेपी के संघ से प्रेरित पारंपरिक सांगठनिक मॉडल से बिल्कुल अलग था. अलग-अलग जातियों के नेताओं को जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी को देखते हुए जोड़ा गया और जिम्मेदारी दी गई.

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अमित शाह ने जिस तरह से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से, पार्टी के संगठन में बदलाव किए उससे पार्टी के पुराने नेता नाराज थे. लेकिन उनके एतराज को यह समझते हुए नजरअंदाज कर दिया गया कि बीजेपी के स्वाभाविक विस्तार के लिए उसका सामाजिक दायरा बढ़ना बेहद जरूरी है.

इस बात को उम्मीदवारों के चुनाव में अगड़ी जातियों के कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद अहमियत दी गई.

साथ ही साथ, बूथ स्तर पर माइक्रो-मैनेजमेंट भी गजब का था. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सभी पारंपरिक गढ़ों की पहचान की गई और उन्हें छोटे से छोटे स्तर पर शानदार तैयारी के साथ भेदा गया.

कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रमोद तिवारी की प्रतापगढ़ जिले की सीट रामपुर खास को बीजेपी ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात देने के लिए चुना. तिवारी को इलाके में घूमने का मौका नहीं दिया गया और उनका असर खत्म कर दिया गया. इसी तरह वाराणसी की पिंडरा सीट पर अजय राय को निशाना बनाया गया और कांग्रेस का असर खत्म कर दिया गया.

मोदी का अथक प्रचार

असल में, करीब 600 स्वयंसेवकों की एक टीम बनाई गई और हर चरण के चुनाव के बाद तैनात की गई. इसका काम था चुनाव में धांधली और मतदाताओं को ललचाने की कोशिशों को रोकना.

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बीजेपी के एक रणनीतिकार ने कहा था, 'हमने ये सब चीज़ें पहले ही प्लान कर रखी थीं और अपने पत्ते संभल कर चले.' बेशक, गोपनीयता सबसे अहम थी. कभी-कभी तब भी असहज पल आए जब पार्टी को ये खबरें मिलीं कि उसने वाकई में पहले चरण में अच्छा प्रदर्शन किया है.

हालांकि, पार्टी तेजी से उबरी और उसने अगले चरण के चुनाव में प्रचार में हिंदुत्व का रंग मिलाते हुए कसाब-कब्रिस्तान बहस छेड़ी और अपने सबसे बढ़िया मोहरे चले.

बीजेपी के पक्ष में जिस चीज ने चुनाव को मोड़ दिया वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अथक प्रचार था जिन्होंने आम कार्यकर्ता की तरह जमकर मेहनत की. ये तय है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे देश की राजनीति का रुख बदलने वाले हैं क्योंकि बीजेपी पहली बार पूरे देश में एक अदम्य राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रही है.

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