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यूपी में कांग्रेस को जिंदा कर पाने में फेल राहुल गांधी

यूपी की सत्ता से 27 साल से बाहर रहने के बाद भी कांग्रेस अपनी चली आ रही कमजोरियों का हल नहीं ढूंढ पाई है

सुरेश बाफना Updated On: Jan 06, 2017 08:07 AM IST

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यूपी में कांग्रेस को जिंदा कर पाने में फेल राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से जिंदा करने के लिए कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले साल सितंबर-अक्टूबर माह में एक महीने तक अपनी किसान यात्रा की. इसके तहत उन्होंने राज्य की 141 विधानसभा क्षेत्रों में छोटी-बड़ी 700 जनसभाएं कीं और 26 रोड शो किए.

किसान यात्रा से पहले राहुल ने कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. साथ ही कहा था कि दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित मुख्‍यमंत्री पद की उम्मीदवार होंगी.

दावेदारी वापस लेने को तैयार

यूपी समेत पांच राज्यों में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होने के बाद शीला दीक्षित ने एक टीवी चैनल के साथ इंटरव्यू में कहा, ‘एसपी के नेता और प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव पद के लिए मुझसे बेहतर दावेदार होंगे. इसलिए मैं उनके पक्ष में अपनी दावेदारी वापस लेने के लिए तैयार हूं’.

Sheila-Dikshit

शीला दीक्षित ने ऐसे समय यह बयान दिया, जब राहुल गांधी विदेश में नए साल की छुटि्टयां बिता रहे हैं.

पिछले 27 साल से कांग्रेस यूपी की राजनीति में हाशिए पर पहुंच गई है. चुनावों में उसका वोट 7 से 15 फीसदी के बीच झूलता रहता है. 2012 के ‍विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट 11.65 फीसदी. 2014 के लोकसभा में केवल 7.5 फीसदी रहा था. लोकसभा की सीटें 21 (2009) से घटकर 2 (अमेठी और रायबरेली) रह गई थीं.

7.5 फीसदी के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के बाद राहुल गांधी ने साहसिक निर्णय लिया था. उन्होंने दूसरे किसी दल से गठबंधन किए बिना कांग्रेस को 2017 के विधानसभा चुनाव में कम से कम 50 सीटों पर जीत दिलाकर यूपी में एक बार फिर पार्टी को प्रासंगिक बनाने की बात कही थी.

समाजवादी पार्टी से महागठबंधन की आस

बिहार में नीतीश कुमार को फिर से मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचाने वाले चुनाव विशेषज्ञ और प्रबंधक प्रशांत किशोर को राहुल ने कांग्रेस में जान फूंकने की जिम्मेदारी सौंपी है.

एक महीने तक किसान यात्रा में पसीना बहाने, शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाने और प्रशांत किशोर के नुस्खों के बाद कांग्रेस अब महागठबंधन की आस लगाकर मुख्यमंत्री अखिलेश के दरवाजे पर आकर बैठी हुई है.

Rahul Gandhi's Kisan Yatra in Mirzapur

PTI Photo

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने यह बयान देकर देश की जनता का खूब मनोरंजन किया है कि अब सभी धर्मनिरपेक्ष दलों पर दबाव आ रहा है कि वो बीजेपी को हराने के लिए एकजुट हों.

27 साल तक निरंतर कांग्रेस को जिंदा करने की कोशिशों के बाद भी यदि पार्टी अभी भी दूसरे दलों के कंधों पर बैठने को आतुर है. तो यह उनकी सामूहिक विफलता ही है.

राहुल गांधी को यह भ्रम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राजनीतिक हमला करने से कांग्रेस पार्टी को मजबूत किया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश में किसान यात्रा के दौरान राहुल ने अखिलेश सरकार की कमियों को उजागर करने की बजाय मोदी को निशाना बनाया.

यूपी के कांग्रेस नेताओं को राहुल से यह सवाल करना चाहिए कि यदि एसपी से गठबंधन बनाना ही मकसद था. तो शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री के तौर पर क्यों पेश किया गया ?

akhilesh-yadav-rahul-gandhi

राहुल और अखिलेश दोनों एक दूसरे के गुड बुक्स में हैं

अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के बाद यूपी के कई कांग्रेस नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की तैयारी की थी. अब गठबंधन के इरादों ने उनकी कोशिशों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है.

कई प्रयोग के बावजूद नाकामी हाथ लगी

कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने यूपी विधानसभा चुनाव में 425 में से 300 सीटें बीएसपी को देकर कांग्रेस पार्टी को रसातल में पहुंचाया था.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की मुख्‍य समस्या संगठन की कमजोरी और साफ राजनीतिक समझ का अभाव होना है. सत्ता से 27 साल के वनवास के बावजूद कांग्रेस अपनी सांगठनिक कमजोरियों का निदान नहीं निकाल पाई है.

संगठन के स्तर पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कई प्रयोग किए, लेकिन विफलता ही हाथ लगी.

कांग्रेस को कभी लगता है कि अकेले चुनाव मैदान में उतरने से, तो कभी लगता है कि गठबंधन करने से पार्टी को मजबूत किया जा सकता है. आज स्थिति यह है कि राहुल और सोनिया के संसदीय क्षेत्र अमेठी और रायबरेली की विधानसभा सीटों पर कांग्रेस हार हो रही है.

कांग्रेस के नेता समाजवादी पार्टी को जातिवादी पार्टी बताते हैं और कुछ दिनों बाद उससे चुनावी तालमेल के लिए बेताब होते हैं.

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