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यूपी चुनाव में मोदी का नया मंत्र-बीजेपी बनाम SCAM

चुनाव में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के लिए पीएम ने दिया फार्मूला

Updated On: Jan 25, 2017 11:14 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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यूपी चुनाव में मोदी का नया मंत्र-बीजेपी बनाम SCAM

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति पर हुई एक आंतरिक बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया फॉर्मूला दिया है. उन्होंने प्रचार प्रबंधकों को पूरी रणनीति बीजेपी बनाम स्कैम पर केंद्रित करने की सलाह दी है.

अब सवाल ये उठता है कि इस स्कैम का मतलब क्या है? इसके विस्तार में जाएं तो S यानी समाजवादी, C यानी कांग्रेस, A यानी अजित और M यानी मायावती. इस तरह के फार्मूले के पीछे का तर्क ये दिया गया है कि बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में जो मजबूत जनाधार प्राप्त किया था उसे न खोया जाए. पार्टी किसी भी सूरत में चुनाव की मुख्य धुरी से हटना नहीं चाहेगी.

अगर 1989 से देश के इस महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य पर नजर डालें तो पाएंगे कि यहां कभी भी राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव नहीं देखा गया. यहां मायावती और मुलायम सिंह यादव की पार्टियों ने देश की अहम पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस को मजबूत अंतर से पीछे रखा है. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में राजनीति के इस दुर्भाग्य को मोदी के जादू ने तोड़ा.

बीजेपी को हराने के लिए बेमेल गठबंधन

Rahul_Akhilesh

ये पहली बार है, जब राज्य में सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से बेमेल पार्टियों कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन हुआ है. इसका मकसद है बीजेपी को हराना. इसमें राहुल गांधी और यूपी सीएम अखिलेश के साथ आने का मुख्य मकसद मुस्लिम वोटरों को एक साथ वोट में अपने पक्ष में बदलना है.

दोनों ने चुनाव पूर्व साझीदारी कर अवसरवादिता का परिचय दिया है लेकिन दोनों ही पार्टियां दशकों पुरानी धर्मनिर्पेक्षता की आड़ में इसे छिपा रही हैं.

इन सबके बीच सबसे ज्यादा जिज्ञासा का विषय है कांग्रेस की राजनीतिक चाल पर नजर. शायद राहुल गांधी के लिए यूपी ही इकलौता राज्य है जहां वह सबसे ज्यादा मेहनत करते हैं. उनका मकसद रहता है खुद को नेहरू—गांधी के वंशज के रूप में योग्य साबित करना.

2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस सिर्फ 21 सीटें ही जीती थी तब लोगों को लगा था कि शायद अगले चुनाव में पार्टी फिर वापसी करे. पर ऐसा नहीं हुआ, 2012 विधानसभा चुनाव और 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का आकार और छोटा हो गया.

इसीलिए 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने खुद को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर पेश करने का चोला उतार फेंका है और कद बढ़ाने के लिए अखिलेश यादव के सहारे चुनावी दंगल में ताल ठोका है.

हमेशा से कांग्रेस विरोधी रहे हैं मुलायम

Mulayam Singh Yadav

अगर इतिहास पर नजर डालें तो देखेंगे कि सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव हमेशा से कांग्रेस विरोधी रहे हैं. दशकों पुराने कांग्रेस विरोध काल में मुलायम के कैडरों और कांग्रेस के बीच तनातनी ही दिखी है.

सपा के कैडर तो इसके लिए बकायदा प्रशिक्षित किए गए. इसलिए सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन निर्बाध होगा ये कहना मुश्किल है. दोनों दलों का सामाजिक आधार अलग है. उदाहरण के तौर पर यादवों का स्थानीय निकाय चुनाव में दबदबा.

हालिया चुनावों में खुलेआम यादव जाति के उम्मीदवारों को आगे बढ़ाया गया जिससे साबित होता है कि अखिलेश यादव ने इनके पक्ष में प्रशासनिक मशीनरी का बेजा इस्तेमाल होने दिया. इसी तरह सिविल सर्विस समेत नौकरशाही की अन्य परतों में भी यादवों की नियुक्ति. पूरे प्रदेश में तमाम महत्वपूर्ण पुलिस स्टेशनों पर यादव जाति के लोगों की तैनाती और बड़ी संख्या में भर्ती. ये चीजें ऐसी हैं, जिससे अखिलेश यादव सरकार के प्रति गैर यादव जातियों में गुस्सा पैदा हुआ है.

अखिलेश के उलट मुलायम सिंह यादव सटीक चाल चलते थे. वो कुर्मी, मल्लाह और कोईरी जाति के कद्दावर नेताओं को भी आगे बढ़ाते थे.

दूसरी ओर अखिलेश ने उच्च जाति के मध्य वर्ग के बीच अपनी पहचान कायम करने की कोशिश की जो परंपरागत तौर पर बीजेपी या कांग्रेस के वोटर रहे हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद वोटरों का यह तबका अखिलेश के साथ जाएगा ये कहना बेहद मुश्किल है. ये तबका पिछले पांच साल में सूबे में कानून और व्यवस्था की बदहाल स्थिति से गुस्से में रही है.

निश्चित तौर पर अखिलेश सत्ता विरोधी लहर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते. कांग्रेस के साथ जा कर एक बड़ा राजनीतिक समर्पण का फैसला करना इसका सबूत है. लेकिन इससे भी इनकार नहीं है कि इस गठबंधन से कुछ सामाजिक समूह साथ आएंगे तो कुछ छिटक जाएंगे.

बीएसपी की चुप्पी उत्सुकता बढ़ाने वाली

ऐसे में बीएसपी की चुप्पी उत्सुकता बढ़ाने वाली है. अब तक बीएसपी ने बीजेपी को ही मुख्य दुश्मन माना है. इसके कारण भी है. राज्य में सांप्रदायिक हिंसा का हालिया इतिहास और मौजूदा सांप्रदायिक तनाव बीएसपी के लिए रणनीतिक तौर पर ज्यादा अहम है.

उसे चिंता है कि इस ध्रुवीकरण के माहौल में दलित वोटों का एक हिस्सा बीजेपी के साथ न चला जाए. ऐसा 2014 के लोकसभा चुनावों में हुआ भी है. लेकिन साथ ही बीएसपी मुसलमान वोट पाने की जुगत में है जो अखिलेश के नेतृत्व में सपा सरकार से क्षुब्ध हैं. इसीलिए यूपी में बीएसपी ने सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे हैं.

अब तक सभी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ सामाजिक समीकरण तैयार करने में ही अपनी उम्मीदें ढूंढती नजर आई हैं. बीजेपी राज्य में एक दशक से ज्यादा समय से किनारे की राजनीति करती आई है. 2014 का चुनाव अपवाद है.

इसीलिए मोदी का बीजेपी बनाम स्कैम फॉर्मूला राज्य में पार्टी की जड़ें फिर से जमाने की रणनीति का हथियार है. हालांकि आखिर में ये कहना भी मुनासिब होगा कि यूपी की जनता किसी भी राजनीतिक परिदृश्य को वोटों की गिनती वाले दिन गलत साबित कर सकती है.

 

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