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‘यूपी के लड़के’ मुलायम सिंह को नहीं पसंद, गठबंधन में नेताजी ने डाली ‘पहली गांठ’

मुलायम ने दो वोटों से हरा कर अजीत सिंह से छीन लिया था यूपी का ताज

Updated On: Jan 30, 2017 04:51 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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‘यूपी के लड़के’ मुलायम सिंह को नहीं पसंद, गठबंधन में नेताजी ने डाली ‘पहली गांठ’

कौन कहता है कि मुलायम सिंह सिर्फ मार्गदर्शक बन कर रह गए हैं?

माना कि अब वो न सपा प्रमुख हैं और  पार्टी में उनके वफादार हाशिये पर हैं. माना कि वो सपा के घोषणापत्र जारी करने के मौके पर नजर आए और न ही कांग्रेस के साथ गठबंधन के वक्त दिखे.

इसका मतलब ये नहीं कि नेताजी पहलवानी भूल गए. मुलायम सिंह ने नया दांव मारा है. मुलायम सिंह को राहुल और अखिलेश का साथ पसंद नहीं है.

अखिलेश भले ही राहुल को साइकिल का दूसरा पहिया बताएं या फिर राहुल अखिलेश की दोस्ती को गंगा-जमुना का मिलन कहें लेकिन मुलायम सिंह की नजर में ये दोस्ती बचकानी है जिसकी उमर लंबी नहीं.

मुलायम सिंह ने साफ कह दिया कि बिना इस गठबंधन के भी यूपी में अखिलेश की सरकार बनना तय था.

ऐसे में मुलायम ने पहली गांठ तो बांध ही दी. साथ ही उन्होंने ये भी कह दिया कि वो इस गठबंधन के लिये प्रचार नहीं करेंगे. अखिलेश के लिये ये बड़ा झटका है. अखिलेश ये जानते हैं कि यूपी में मुस्लिम वोट सिर्फ मुलायम के नाम से ही कमाए जा सकते हैं.

कांग्रेस विरोध का प्रतीक रहे हैं मुलायम

तकरीबन पांच दशक की राजनीति में मुलायम सिंह कांग्रेस विरोध के प्रतीक रहे हैं. 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर वो सबसे कम उम्र में विधायक बने थे. 1989 में उत्तर प्रदेश के पहली दफे मुख्यमंत्री बने.

मुलायम की सियासत ही सूबे में कांग्रेस विरोध और मुस्लिम-पिछड़ों को साथ जोड़ कर ऊंचाई पर पहुंची है. अगर यूपी में कांग्रेस का किसी ने सफाया किया है तो वो हैं मुलायम सिंह यादव.

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मुलायम सिंह यादव ने यूपी के सीएम की कुर्सी बेटे अखिलेश को सौंपी थी

कांग्रेस के वोटबैंक को मुलायम सिंह ने अपना वोटबैंक बनाया. ऐसे में मुलायम की सियासी नजर में अखिलेश ने राहुल से हाथ मिलाकर यूपी में कांग्रेस को मजबूत होने का मौका दे दिया है. कांग्रेस मजबूत होगी तो समाजवादी पार्टी कमजोर होगी.

यही वजह है कि मुलायम ने खुलकर कांग्रेस पर हमला बोला और ये तक कह डाला कि कांग्रेस की वजह से देश पिछड़ा हुआ है.

अखिलेश ने कई सपा कार्यकर्ताओं को बेरोजगार कर दिया

मुलायम ने सपा के कार्यकर्ताओं को लेकर भी अखिलेश को आड़े हाथ लिया. उन्होंने कहा कि सपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं का भविष्य अखिलेश ने खराब कर दिया.

यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सीटों के बंटवारे में सपा के कई कार्यकर्ताओं का पत्ता ही कट गया है. कांग्रेस 105 और समाजवादी पार्टी 298 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

अगर ये गठबंधन नहीं होता तो 403 सीटों पर सपा और मुलायम के निष्ठावान चुनाव लड़ते. लेकिन अब मुलायम अखिलेश के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि जिनके टिकट काटे गए हैं वो पांच साल तक क्या करेंगे ?

अखिलेश युवा हैं और जोश में हैं. अखिलेश को बनी बनाई पार्टी मिली है तो यूपी का ताज भी चांदी की थाली में सज कर मिला था. अखिलेश ने सियासत के वो उतार चढ़ाव नहीं देखे जिन्हें देखने में मुलायम की पूरी उम्र ही गुजर गई.

न ही कभी अखिलेश की  सियासी समझ किसी भी एक फैसले से नुमाया हो सकी है.

मुलायम ने अपना राजपाट, साइकिल-सिंबल-पार्टी सबकुछ बेटे की जिद के चलते सौंप दिया लेकिन मुलायम की राजनीति का तजुर्बा अखिलेश के हिस्से में अभी नहीं आया है. मुलायम राजनीति के पुरोधा हैं. उन्होंने राजनीति के बनते-बिगड़ते रिश्तों को करीब से देखा है. मुलायम राजनीति के महारथी नहीं होते तो शायद यूपी के सीएम ही नहीं बन पाते.

जब मुलायम ने जीती सीएम बनने की पहली रेस

आज से 28 साल पहले जाड़े के वो सर्द दिन थे लेकिन सियासी तपिश में नेता पसीने-पसीने थे क्योंकि सवाल था यूपी के सीएम का.

यूपी के मुख्यमंत्री की रेस में चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह सबसे आगे थे तो मुलायम सिंह को उप मुख्यमंत्री पद का ऑफर था. मांडा के राजा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह का समर्थन अजित सिंह को था. लेकिन गुप्त मतदान ने समीकरण ही बदल दिये. मधु दंडवते, मुफ्ती मोहम्मद सईद और चिमन भाई पटेल मतदानाके पर्यवेक्षक थे.  ऐन मौके पर  मुलायम ने ऐसा चरखा दांव मारा कि अजित सिंह खेमे के 11 विधायकों को अपने खेमे में खींच लाए. कहा जाता है कि डीपी यादव और  बेनी प्रसाद वर्मा ने इस मुकाबले में मुलायम का जोरदार साथ दिया.

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तत्कालीन भारत के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के साथ सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव

मतदान हुआ और मुलायम दो वोटों से अजित सिंह को पटखनी दे चुके थे. 5 दिसंबर 1989 को मुलायम पहली दफे यूपी के सीएम बने. वक्त का तकाजा देखिये कि मुलायम की बनाई समाजवादी पार्टी के भविष्य पर अब बेटा अखिलेश फैसला कर रहा है. छोटे लोहिया का तमगा रखने वाले मुलायम बेबस दिखाई दे रहे हैं.

मुलायम ने इमरजेंसी का वक्त भी देखा तो लोहिया, चरण सिंह जैसे नेताओं से राजनीति के गुर भी सीखे. लेकिन अखिलेश आत्ममुग्धता में सियासी दांव-पेंचों को समझने में नादानी दिखा रहे हैं.

अखिलेश के सोचने के लिये इतना ही काफी है कि 'गंगा-जमुना मिलन' की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल आखिर तक मायावती को लेकर इतने श्रद्धावान क्यों रहे?  क्या राहुल के मन में चुनाव बाद के गठबंधन की कोई दूसरी खिचड़ी पक रही है जिसे अखिलेश तो नहीं समझ सके लेकिन मुलायम जरूर समझ गए.

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