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यूपी चुनाव 2017: बीएसपी को भरोसा है कि वह दलितों के दिल में है

बीएसपी को उम्मीद है कि उसका सामाजिक आधार का किला इस बार भी नहीं डोलने वाला है

Akshaya Mishra Updated On: Feb 11, 2017 02:16 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: बीएसपी को भरोसा है कि वह दलितों के दिल में है

यूपी की चुनावी सियासत में एक बात पक्की है, बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देने में दलित कभी पीछे नहीं रहते. एक भरा-पूरा वोट बैंक बीएसपी के पीछे हमेशा होता है इसलिए किसी चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जरूरत इसमें कुछ और जोड़ने भर की होती है.

यह ‘कुछ और’ मुस्लिम के रुप में हो सकता है और अगड़ी जाति के रुप में या फिर दोनों ही रूपों में. सूबे के चुनाव पर नजर रखने वाला आदमी भी आपको यह बात बता देगा.

पार्टियों का दलित प्रेम किसी से छुपा नहीं

बीएसपी के इस मजबूत किले में हर पार्टी सेंधमारी की कोशिश करती रही है लेकिन कोशिश कभी कामयाब नहीं हुई. राहुल गांधी के दलित के घर पहुंचने की कहानी तो खैर खूब मशहूर हुई लेकिन राहुल की यह कोशिश दलित समुदाय को कांग्रेस के करीब खींचने में कामयाब नहीं हो सकी.

BSP

बीजेपी ने भी इस समुदाय से दोस्ती गांठने के कम करतब नहीं किए. पिछले साल की बात याद है आपको जब उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में अमित शाह अपने समरसता स्नान में दलितों के साथ डूबकी लगा रहे थे? या फिर बनारस के गांव में दलित के घर उनके भोजन करने की ही बात याद कर लीजिए. या फिर यह याद कीजिए कि बीजेपी ने डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर की विरासत को अपना बनाने के लिए किस कदर जतन किए हैं! अब जाकर दोनों पार्टियों ने ऐसे जतन करने से हार मानी है.

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दलित चिंतक डॉ. बालेराम का कहना है 'दरअसल वे लोग बात को सिरे से ही नहीं समझते. ऐसी कोशिशों से दलितों को चोट पहुंचती है और इन पार्टियों से उनकी दूरी कुछ और बढ़ती है. सरपरस्ती के ऐसे बर्ताव के जरिए पार्टियां क्या साबित करना चाहती हैं ?'

बालेराम आगे कहते हैं 'दलित सम्मान चाहते हैं, चाहते हैं कि उनके साथ बराबरी का बरताव हो, वैसा ही बर्ताव जैसा समाज की अन्य उच्च जाति के लोगों के साथ होता है.ऐसे लोग जब दलितों के घर जाते हैं तो उससे यही झांकता है दलितों को अब भी हीन समझा जा रहा है. ये नेता जातियों के बीच कायम सामाजिक दूरी को कम नहीं कर रहे बल्कि और ज्यादा बढ़ा रहे हैं.'

ऐसे करतब अपने लक्ष्य श्रोता के मन में कड़वाहट ही घोलते हैं, दलितों के मन में अपने अपमान का भाव और गहरा होता है. बीएसपी के किसी भी जागरूक समर्थक से पूछकर देखिए वह आपसे यही बात कहता मिलेगा कि उनके लिए बीएसपी को वोट देना सिर्फ सियासी पसंद के इजहार भर का मामला नहीं है. यह दरअसल उनके आत्म-सम्मान का सवाल है.

बीजेपी नापसंद है तो भी वोट बीजेपी को करते हैं

बालेराम कहते हैं कि 'यादव और जाट सरीखी मंझोली जातियों ने हमें अपने सामाजिक एजेंडे से बाहर कर रखा है और यही बात अगड़ी जातियों के साथ है. इनका राब्ता दूसरी पार्टियों के साथ है. ऐसे में हमारे लिए क्या बचता है? वोट डालने के मामले में हमारा बर्ताव बिल्कुल मुसलमानों जैसा है. दोनों समुदायों के मन में अपने साथ हो रहे सौतेलेपन के बर्ताव को लेकर कसक है, दोनों की रहन-सहन में बहुत अन्तर नहीं है. लेकिन हमारे पास एक पार्टी है जिसे हम वोट डाल सकते हैं.'

बीएसपी सुप्रीमो मायावती की रैली में महिला समर्थक.

बीएसपी सुप्रीमो मायावती की रैली में महिला समर्थक.

क्या बीएसपी को लेकर दलित वोटर की निष्ठा उतनी ही अटूट है जितना कि बालेराम बता रहे हैं? दलितों के बीच सामाजिक ऊंच-नीच की सीढ़ी पर जो निचले पायदान पर हैं जैसे वाल्मिकी और पासी, आखिर वे बीजेपी को क्यों वोट डालते हैं?

बालेराम इस सवाल के जवाब में स्वीकार करते हैं कि यह दरअसल नेतृत्व की असफलता का मामला है. दलित समुदाय के एक हिस्से के वोट 2014 के चुनावों में बीजेपी को क्यों मिले? जवाब में बालेराम का कहना है कि यह नियम नहीं बल्कि अपवाद की स्थिति है. हम चाहे जिसे वोट डालें या सत्ता में जो भी पार्टी हो समाज की सीढ़ी पर हमारा दर्जा जस का तस बना रहता है.

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बालेराम ने जो बात पहले कही उसे अगर ध्यान में रखें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि यूपी में दलित और मुसलमान के बीच एका होना एक स्वाभाविक बात है.

मुस्लिम समुदाय दलितों की राजनीति के लिए एक स्थायी दोस्त साबित हो सकता है और ऐसे में दलित-मुस्लिम गठजोड़ एक ताकत के रुप में उभरकर सामने आती है. लेकिन बात इतनी सीधी है नहीं. बेशक दोनों ही समुदाय बीजेपी को नापसंद करते हैं लेकिन मुसलमानों का भरोसा समाजवादी पार्टी पर कुछ ज्यादा है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन से बीजेपी को हो सकता है नुकसान

दलित एक्टिविस्ट सतीश प्रकाश मानते हैं कि मुस्लिम मतदाता को रिझाना इस चुनाव में एक चुनौती है, खासकर उस सूरत में जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठजोड़ हो गया है और यह गठजोड़ यही सोचकर बनाया गया है कि कहीं मुस्लिम वोट किसी और तरफ ना चले जाएं.

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राहुल और अखिलेश को लगता है कि गठबंधन होने से वो बीजेपी को यूपी में रोक पाने में सफल होंगे (फोटो: पीटीआई)

सतीश प्रकाश कहते हैं कि 'बीएसपी बाकी पार्टियों से तेज साबित हुई हैं. पार्टी ने मुस्लिम-बहुल सीटों पर अपने उम्मीदवारों का चयन बहुत पहले ही कर लिया था. पार्टी ने चुनावी मैदान में 97 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. इससे मुस्लिम-समुदाय में अच्छा संदेश गया है. पार्टी पश्चिमी यूपी के मामले में खासतौर से सतर्क रही है क्योंकि मुस्लिम वोट के बंटने पर बीजेपी को फायदा होगा.'

सतीश प्रकाश का कहना है कि पश्चिमी यूपी में होने वाले मतदान के रुझान पूरे सूबे की वोटिंग पर असर डालेंगे. इसलिए पार्टी अपनी कोशिश में कोई कसर नहीं रखना चाहती.

सतीश  बताते हैं 'पहले पार्टी का आह्वान होता था ‘वन बूथ, वन यूथ’, पिछले विधानसभा चुनाव में कहा गया ‘ वन बूथ 20 यूथ', इस बार के चुनाव में कहा जा रहा है ‘ वन बूथ 50 यूथ’.'

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इसके बाद उन्होंने कहा 'मुख्यधारा मीडिया कभी नहीं मानेगी कि बीएसपी भी एक राजनीतिक ताकत है. लेकिन, पहले चरण के चुनाव के बारे में सोशल मीडिया पर यह बात चल निकली कि बीएसपी ने अच्छा कर दिखाया है तो फिर यह रुझान पूरे सूबे में फैल जाएगा.'

बीएसपी को भरोसा है कि दलितों का समर्थन उसे ही मिलेगा

बीएसपी को अच्छा कर दिखाने का भरोसा है, भले इस भरोसे का ढोल नहीं पिटा जा रहा है. भरोसे की वजह बताते हुए दलित एक्टिविस्ट संजय कुमार ने कहा 'पिछले विधानसभा चुनाव में ज्यादातर सीटों पर बहुत थोड़े से वोटों से हमारी हार हुई थी.

मायावती की रैली में बीएसपी समर्थक.

मायावती की रैली में बीएसपी समर्थक.

उन्होंने कहा '48 सीटों पर तो हम बस 500 या इससे भी कम वोट से हारे थे. 200 सीटों पर वोटों का यह अन्तर 3000 या इससे कम था. इस बार पार्टी के कार्यकर्ताओं को ठीक से लामबंद करके इस अन्तर को भरा जा सकता है. आपको याद रखना चाहिए कि बीएसपी 350 सीटों पर प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी के रुप में चुनावी होड़ में है.'

पार्टी को भरोसा है कि चाहे जो हो जाये दलितों का समर्थन उसे हर हाल में मिलना है. सतीश प्रकाश और संजय कुमार भी बालेराम की बात पर कहते हैं : दूसरी पार्टियों ने हमें अपने खेमे से बाहर रखने की सियासत की है, ऐसे में हमारे लिए बीएसपी ही विकल्प है.

मतलब कोई जोर चाहे कितना लगा ले बीएसपी के सामाजिक आधार का किला इस बार भी नहीं डोलने वाला.

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