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क्या सपा-कांग्रेस गठबंधन बिहार की सफलता दोहरा पाएगा?

बिहार में बसपा जैसी कोई तीसरी ताकत नहीं थी. इसलिए मतों का तीन-तरफा विभाजन भाजपा के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकता है.

Suresh Bafna Updated On: Jan 23, 2017 12:45 PM IST

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क्या सपा-कांग्रेस गठबंधन बिहार की सफलता दोहरा पाएगा?

दो दिनों तक चली सौदेबाजी के बाद उत्तर प्रदेश में सीटों पर बंटवारे को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच जारी गतिरोध अंतत: खत्म हो गया है. दोनों के बीच चली खींचतान का नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी को 99 की जगह 105 सीटें मिल गईं. दो दिन पहले समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल के बयान से यह जाहिर हुआ था कि बातचीत पूरी तरह टूट चुकी है.

लखनऊ में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर और सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने एक साथ किए प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि सांप्रदायिक ताकतों को परास्त करने के लिए यह गठबंधन किया गया है. दोनों ने यह जताने की कोशिश की कि यह गठबंधन वैचारिक आधार पर गठित किया गया है. सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मची सार्वजनिक खींचतान ने उनके इस दावे की पोल खोल दी है.

मोदी की जीत ने चेताया था 

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लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की भाजपा को 73 सीटों पर विजय मिली थी. इसके बाद ही सपा और कांग्रेस के नेताअों को इसका एहसास हो गया था कि यदि भाजपा-विरोधी दलों का गठबंधन नहीं बनाया तो मोदी के विजय रथ को रोकना संभव नहीं होगा.

बाद में बिहार में नीतिश कुमार के नेतृत्व में बने महागठबंधन की सफलता ने भाजपा-विरोधी दलों का उत्साह कई गुना बढ़ा दिया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी मोदी की भाजपा को रोका जा सकता है.

सपा के भीतर मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव के बीच जारी पारिवारिक राजनीतिक कलह का एक प्रमुख कारण यह भी था कि पुत्र कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर महागठबंधन बनाना चाहता था, वहीं पिता कांग्रेस के साथ जाने के पक्ष में नहीं थे. मुलायम सिंह यादव ने साफ तौर पर कहा था कि सपा अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेगी.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी चाहते थे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अकेले ही लड़ा जाए. उन्होंने दो महीने तक प्रदेश में किसान यात्रा की और शीला दीक्षित को मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश भी किया. प्रदेश में कांग्रेस संगठन की दुर्गति का अंदाजा लगने के बाद राहुल को भी लगा कि सपा के साथ गठबंधन करके ही मोदी के विजय रथ को रोका जा सकता है.

क्या खुद को कमजोर पा रही है सपा? 

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यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि उत्तर प्रदेश में कोई भी राजनीतिक दल विचारधारा की लड़ाई लड़ रहा है. लगभग सभी दल सत्ता पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पांच साल सत्ता में रहने के बाद सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया तो इसका सीधा अर्थ यह है कि वह राजनीतिक रूप से खुद को कमजोर स्थिति में पा रही है. वहीं 27 साल तक सत्ता से वनवास भोगने के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने विवशता में सपा का पुछल्ला बनने का विकल्प ही चुना है.

सपा को यह खतरा दिखाई दे रहा था कि यदि कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हुआ तो मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर बसपा की झोली में गिर सकते हैं.

बसपा नेता मायावती की एकमात्र उम्मीद मुस्लिम वोट पर ही है. मायावती ने तो यह अजीब आरोप लगाया कि भाजपा के इशारे पर सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन हो रहा है.

जिस कटु प्रक्रिया के साथ सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन बना है, उससे यह लगता है कि जमीन पर दोनों दलों के नेताअों व कार्यकर्ताअों के बीच उपयोगी तालमेल बन पाना संभव नहीं होगा.

बिहार में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के बीच एक मजबूत महागठबंधन बना था. उत्तर प्रदेश में यदि सपा और बसपा के बीच तालमेल होता तो उसे महागठबंधन कहना संभव था.

इस बात की संभावना भी काफी प्रबल है कि सपा और कांग्रेस दोनों दलों को बड़े पैमाने  पर बागी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ेगा. 2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों को 30 प्रतिशत से कम वोट मिले थे, वही भाजपा को 43 प्रतिशत मत मिले थे. बिहार का गठबंधन- गणित भाजपा के खिलाफ था, लेकिन उत्तर प्रदेश में स्थिति वैसी नहीं है.

उत्तर प्रदेश में बसपा एक मजबूत पार्टी के रूप में चुनाव मैदान में होगी. बिहार में बसपा जैसी कोई तीसरी ताकत नहीं थी. इसलिए मतों का तीन-तरफा विभाजन भाजपा के लिए फायदेमंद सिद्ध हो सकता है.

सपा के भीतर पिता-पुत्र के बीच चले संघर्ष का नकारात्मक प्रभाव पार्टी की चुनावी संभावनाअों पर जरूर पड़ेगा. चुनावी घोषणा-पत्र के दौरान मुलायम सिंह यादव की अनुपस्थिति इस बात का संकेत है कि सपा के भीतर अभी भी पारिवारिक तनाव बरकरार है.

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