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यूपी चुनाव कोई भी जीते, बुंदेलखंड तो हारता ही रहा है

अंकों के समीकरण में सोचने पर बुंदेलखंड बहुत छोटा नजर आता है

Updated On: Feb 18, 2017 07:59 AM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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यूपी चुनाव कोई भी जीते, बुंदेलखंड तो हारता ही रहा है

यूपी में किसकी जीत होगी, किसकी हार, आखिर कौन बनाएगा सरकार? सोचिए कि यह पूछकर सवाल करने वाले ने आपके दिमाग को किस तरफ मोड़ दिया!

यह सवाल मासूम जान पड़ सकता है, आखिर बात यूपी की है, देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य की! और फिर, हर कोई जानता है कि यूपी असेंबली के चुनाव के नतीजे यह भी सुराग देने वाले हैं कि केंद्र की मौजूदा सरकार का सिंहासन अगले लोकसभा चुनावों में डोलने वाला है कि नहीं.

सो, लग सकता है कि यह सवाल तो तकरीबन हर मतदाता का सवाल है, आम दिलचस्पी का सवाल, इसमें खास क्या है ?

चुनावी सवाल की राजनीति

नहीं, आम दिलचस्पी का इजहार करता यह सवाल मासूम कतई नहीं है. ध्यान दीजिए, ऊपर के सवाल में एक पुछल्ला सवाल जुड़ा है-‘किसकी बनेगी सरकार’? जबाब का व्याकरण इस पुछल्ले के भीतर ही तय हो गया.

जवाब में आप पार्टियों के नाम ले सकते हैं कि बीजेपी, बीएसपी या फिर एसपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने जा रही है. या फिर आप इन पार्टियों की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए पेश किए जा रहे चेहरों के नाम ले सकते हैं कि बीएसपी जीतेगी, मायावती की सरकार बनेगी, समाजवादी पार्टी फतहयाब होगी, अखिलेश की सरकार बनेगी...!

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आप लाख कोशिश करें लेकिन ऊपर के सवाल के जवाब में यह नहीं कह पाएंगे कि यूपी इलेक्शन के नतीजों के बाद बनने वाली सरकार में बुंदेलखंड का हिस्सा कितना होगा. क्या जो सरकार बनेगी वह बुंदेलखंड की विपदा की सुध लेगी?

किसकी हार-जीत, किसकी सरकार? ऐसे सवालों की एक राजनीति होती है. ये सवाल एक पूरे इलाके की चिंताओं को आपके सोच के दायरे से बाहर कर सकते हैं. आप ऊपर के सवाल के जवाब ढूंढ़ने के चक्कर में अंकों के समीकरण में सोचने लग जाते हैं और इस समीकरण में बुंदेलखंड बहुत छोटा नजर आता है, इतना छोटा कि नजरअंदाज किया जा सके!

चुनाव रेस का सबसे छोटा पड़ाव है बुंदेलखंड

UP poll

सीटों के अंकगणित की चौहद्दी में चलने वाली सोच यही कहेगी कि सरकार तो बहुमत हासिल करने वाले दल की बनती है. सो, ऊपर के सवाल पर आगे की बातचीत सीटों की संख्या पर आ टिकेगी.

लोग जानना चाहेंगे कि चुनावी मुकाबले की रेस में 202 सीटों का आंकड़ा कौन सी पार्टी पार करने वाली है? इस सवाल पर आपकी नजर यह खोजेगी कि सीटों के मामले में यूपी के किस चुनावी इलाके का वजन कितना भारी है.

आपकी नजर पूर्वी और पश्चिमी यूपी पर जाएगी जहां सीटों की संख्या सैकड़ा पार कर जाती है. मतलब सरकार बनाने की होड़ में लगी पार्टियों के लिए ये इलाके बहुत मानीखेज हैं. आपकी नजर रुहेलखंड पर टिक सकती है, सीटों की संख्या यहां भी अपना पचासा पूरी कर लेती है.

लेकिन बुंदेलखंड? क्या आपकी नजर बुंदेलखंड पर भी टिकती है? जबाब यही है कि नहीं टिकती है. सात जिलों वाले यूपी के हिस्से के बुंदेलखंड पर नजर टिकने की संभावना बहुत कम है.

यूपी विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा छूने के लिहाज से यहां गिनती की ही सीटें हैं. इस चुनावी इलाके में परिसीमन के बाद 21 से घटकर 19 सीटें रह गई हैं.

सीटों के जोड़-जमा के अंकगणित में सोचें तो यूपी विधानसभा की कुल सीटों में बस लगभग 5 प्रतिशत की हिस्सेदारी है बुंदेलखंड की. और, पांच फीसदी विधानसभा सीटों वाला बुंदेलखंड पार्टियों के लिए यूपी की बीते दस साल के चुनावी इतिहास को देखते हुए बहुत मायने नहीं रखता.

चुनावी गणित में मानीखेज नहीं 

rally

एक वजह तो यही कि 2007 से यूपी में सरकार बनाने के लिए चुनाव बाद गठबंधन करने की मजबूरी नहीं रही. जिस पार्टी की सरकार बनी उसे साफ-साफ जनादेश मिला है.

सो चुनावी होड़ में लगी पार्टियां मानकर चल सकती हैं कि इस बार भी चुनाव बाद गठबंधन करने की मजबूरी नहीं रहेगी. गठबंधन करके सरकार बनाने की मजबूरी रहती तो विधानसभा की पांच फीसदी सीटों वाला बुंदेलखंड पार्टियों की नजर में मानीखेज हो सकता था.

दूसरे, बीते दस साल में यूपी में दो पार्टियों का राज रहा और दोनों ने बड़े कम वोट शेयर के बावजूद पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई.

2007 में मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी ने 30 फीसद वोट शेयर के दम पर सरकार बनाई तो 2012 में समाजवादी पार्टी ने अखिलेश की सरकार 29 फीसदी वोटशेयर पर ही बना ली. यह यूपी में आजादी के बाद से 2012 तक सबसे कम वोटशेयर वाली सरकार थी.

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जब एक-तिहाई से भी कम वोटशेयर के बावजूद सरकार बन रही है और जनादेश इतना साफ मिल रहा है कि चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए किसी दूसरी पार्टी से साथ-संगत करने की मजबूरी भी न रहे, तो पार्टियों के चुनावी अंकगणित में वह बुदेलखंड कितनी अहमियत रखेगा जिसका हिस्सा यूपी विधानसभा की कुल सीटों में बस पांच फीसद का है?

वोटशेयर बढ़ाने के लिहाज से भी पार्टियों को बुंदेलखंड खास वजनदार नहीं लगेगा क्योंकि कुल सात जिलों को मिलाकर बनता है इस इलाके का मानचित्र.

मतलब, यूपी के कुल जिलों की संख्या का दस फीसदी से भी कम. पश्चिमी और पूर्वी यूपी की तुलना में वोटर की तादाद यहां इतनी ज्यादा नहीं कि पार्टियां इसे प्राथमिक मानकर फोकस करें.

चुनावी बयार के संकेत

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बुंदेलखंड से आने वाली चुनावी खबरों का भी इशारा यही है कि बुंदेलखंड प्रचार और सरोकार के लिहाज से पार्टियों के चुनावी एजेंडे में बहुत नीचे है. कोई नेता सीधे-सीधे अपनी चुनावी लड़ाई को बुंदेलखंड की विपदा की लड़ाई से जोड़ता नहीं दिखता.

मिसाल के लिए बीते दिसंबर महीने में खबर उड़ी कि अखिलेश यादव बुंदेलखंड की एक सीट से चुनाव लड़ सकते हैं.

15 दिसंबर को अखिलेश हमीरपुर पहुंचे और खबर छपी कि यहां के समाजवादी पार्टी के नेताओं ने उन्हें बांदा जिले के बेबरु विधानसभा सीट से लड़ने का न्यौता दिया है. लेकिन अखिलेश यादव ने तस्वीर उसी वक्त साफ कर दी कि ‘हम तो सूबे की हर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं.’

याद रहे कि अखिलेश यादव ने आठ दफे अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया लेकिन एक बार भी बुंदेलखंड के अपने किसी विधायक पर उनका भरोसा नहीं जागा.

अचरज नहीं कि इलाके में लोग आपसे कहते मिल जायेंगे कि 'बुंदेलखंड के लिए तो एसपी से अच्छी बीएसपी सरकार थी, जो आधा दर्जन मंत्री, एक दर्जन दर्जा प्राप्त मंत्री के अलावा विकास के नाम पर मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग, आईटीआई कॉलेज दिए थे.'

जातिगत समीकरण है चुनावी एजेंडा

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फिलहाल एसपी और बीएसपी बुंदेलखंड की सात-सात सीटों के साथ बराबरी पर हैं और उनके चुनावी एजेंडे पर इलाके की समस्याएं नहीं बल्कि यहां का जातिगत समीकरण है.

बीएसपी को उम्मीद है, पिछली बार की तरह इलाके की आबादी में 25 फीसदी से ज्यादा की तादाद में मौजूद दलित मतदाता उसका ही साथ देगा.

इलाके की सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में बीएसपी की इस उम्मीद को साफ-साफ पढ़ा जा सकता है.

यूपी वाले बुंदेलखंड़ अंचल के सात जिलों बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झांसी और ललितपुर की कुल 19 सीटों में 5 (बांदा की नरैनी, हमीरपुर की राठ, जालौन की उरई सदर, ललितपुर की महरौनी और झांसी की मऊरानीपुर) सीट आरक्षित श्रेणी की है.

बीएसपी ने 2012 के चुनाव में इन सीटों पर एक खास बिरादरी के उम्मीदवार उतारे थे और इस बार भी उसका भरोसा इसी जाटव बिरादरी के प्रत्याशियों पर है. हालांकि इलाके की सभी 19 सीटों पर जाटव के अलावा अन्य दलित जातियां जैसे कोरी, खटिक, भाट आदि बड़ी संख्या में हैं.

बीएसपी के इस भरोसे की काट में समाजवादी पार्टी को भी अपने पुराने जातिगत समीकरण और नये विकास के मुहावरे पर भरोसा है. और हो भी क्यों ना, इस बार उसे बड़भईया मानकर कांग्रेस छोटभईया के रुप में साथ जो हो गई है.

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बुंदेलखंड के कई राजपूत नेता कांग्रेस की छतरी के नीचे रहे हैं. बेशक इलाके में ठाकुरो की आबादी 5-7 फीसद के बीच है लेकिन सामाजिक दबदबा कम नहीं है और समाजवादी पार्टी मान सकती है कि इलाके में 23 फरवरी की वोटिंग के वक्त कांग्रेसी छतरी वाले राजपूत नेताओं का असर उसके पक्ष में काम करेगा.

कांग्रेस को 2012 में इस इलाके से 4 सीटें मिली थीं और वह इलाके में 10 से 12 फीसदी की तादाद में मौजूद ब्राह्मण मतदाताओं से भी उम्मीद बांध सकती है. आखिर कांग्रेस का इस जाति के मतदाताओं के बीच परंपरागत आधार रहा है.

अखिलेश और राहुल के साथ होने से एसपी-कांग्रेस गठबंधन यह उम्मीद लगा सकता है कि वोटिंग का रुझान 2012 की राह पर गया तो कम से कम 10 से 12 सीटें मिल ही जायेंगी.

ठीक इसी कारण ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ का नारा  गठबंधन की तरफ से बुंदेलखंड में भी लग रहा है. यहां लोग यह कहते हुए मिल जायेंगे कि ‘बेशक मायावती के राज में गुंडागर्दी पर अंकुश लग जाता है लेकिन अखिलेश भी अच्छे नेता हैं और उन्होंने गुंडागर्दी के खिलाफ अपने चाचा से भी लड़ाई मोल ली.’

बुंदेलखंड में जातिगत समीकरण और साफ-सुथरी छवि को आधार बनाकर मुख्य लड़ाई एसपी-कांग्रेस गठबंधन और बीएसपी के बीच है. बीजेपी पसोपेश में है कि बुंदेलखंड में चुनावी लड़ाई के लिए उसका मुहावरा क्या हो.

बुंदेलखंड में ही बुंदेलखंड मुद्दा नहीं  

Amit Shah at a rally

बीजेपी के प्रचार-अभियान के बोल नकार पर टिके हैं. बात बुंदेलखंड से शुरू होती है लेकिन चंद शब्दों की दूरी पार करते ही विषय बदलकर पूरी यूपी का बन जाता है.

मिसाल के लिए ललितपुर के गिनौटी बाग वाली हाल की सभा में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि 'अटल सरकार ने यूपी बुंदेलखंड को पैकेज दिया था, जो मप्र से 300 करोड़ रुपए ज्यादा था लेकिन राज्य की सरकारों ने सूरत नहीं बदलने दी.'

इस सभा में अमित शाह ने यह तो याद दिलाया, 'बुंदेलखंड के किसानों तक मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंची, भूमाफियाओं का बोल बाला है.' लेकिन इसके तुरंत बाद उनके शिकायती लहजे के भीतर विषय बुंदेलखंड से निकलकर पूरा यूपी हो गया.

गिनौटी बाग वाली सभा में अमित शाह ने कहा, 'हत्या के मामलों में यूपी नंबर वन है, हर रोज 13 हत्याएं, एक दिन में 23 बलात्कार होते हैं, यूपी को आत्महत्याओँ, लूट, फिरोती, अपहरण, कब्जे, गुंडई ने तबाह कर दिया है.'

शायद बुंदेलखंड का मतदाता भी भांप गया है कि बीजेपी के बोल नकार के हैं और इस बोल के केंद्र में बुंदेलखंड नहीं बल्कि यूपी है. मतदाता की यही मानस लोकनीति (सीएसडीएस) के एक हालिया सर्वे के तथ्यों से झांकता है.

अगस्त महीने के सर्वे में बुंदेलखंड के 25 फीसदी मतदाताओं ने एसपी को अपनी पहली पसंद बताया था और बीजेपी को पहली पसंद बताने वाले मतदाताओं की संख्या भी इतनी ही थी.

दिसंबर माह के सर्वे में एसपी तो बुंदेलखंड के 25 फीसदी मतदाताओं की पहली पसंद है लेकिन बीजेपी यहां के 23 फीसदी मतदाताओं की ही पसंद रह गई है. सर्वे में बीएसपी बुंदेलखंड के 21 फीसदी मतदाताओं की पहली पसंद बनकर तीसरे नंबर पर है और जबकि कांग्रेस 10 फीसदी मतदाताओं की पसंद के रूप में सर्वे में चौथे स्थान पर.

बुंदेलखंड की पहेली

Voting in Mathura

लोकनीति (सीएसडीएस) का सर्वे बुंदेलखंड के बारे में एक पहेली छोड़ जाता है. सर्वे के मुताबिक बुंदेलखंड के 21 फीसद मतदाता चार प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों की जगह किसी और को अपना वोट देना ज्यादा पसंद करेंगे.

यह आंकड़ा बीएसपी को पसंद करने वाले मतदाताओं के बराबर है और बीजेपी को पहली पसंद बताने वाले मतदाताओं की तुलना में महज 2 फीसदी कम.

तो क्या यह मानना ठीक होगा कि चुनावी होड़ की चार प्रमुख पार्टियां बुंदेलखंड के मतदाताओं की चिंता और सरोकार को दरकिनार करके चल रही हैं, सो वोटरों का एक बड़ा हिस्सा किसी और को अपने भरोसे का काबिल मान रहा है?

शायद हां, क्योंकि सूखा, अकाल और रोजगार की कमी के बीच लोगों के पलायन के शिकार बुंदेलखंड की हालत जानने के लिए 2015 के नवंबर महीने में स्वराज-अभियान ने एक सर्वे किया तो बड़े चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए.

इन निष्कर्षों ने बुंदेलखंड के विकास के नाम पर की जाने वाली राहत-पैकेज की राजनीति (चाहे वह किसी दल की हो) की पोल खोल दी.

इस सर्वे के मुताबिक 2015 के मार्च से अक्तूबर यानी 8 महीने में बुंदेलखंड के 53% गरीब परिवारों ने दाल नहीं खायी, 69% ने दूध नहीं पिया और हर पांचवा परिवार कम से कम एक दिन भूखा सोया.

होली के बाद से 60% परिवारों में गेहूं-चावल की जगह मोटे अनाज और आलू के भरोसे भूख मिटाई और हर छठे घर ने फिकारा (एक घास) की रोटी खाई. इस अवधि में बुंदेलखंड में 40% परिवारों ने पशु बेचे, 27% ने जमीन बेची या गिरवी रखी और 36% गांव में 100 से अधिक गाय भैंस को चारे की कमी के कारण छोड़ने की मजबूरी पेश आई.

सोचिए कि किसकी हार, किसकी जीत और किसकी बनेगी सरकार वाले सिंहासनी सवाल में बुंदेलखंड की इस जमीनी सच्चाई की बातें कितनी है!

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