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यूपी चुनाव 2017: सपा-कांग्रेस गठबंधन के बाद भी यूपी को कुछ और ही पसंद है

सूबे का सियासी माहौल ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मतदाता अखिलेश को दोबारा कुर्सी पर बिठा दे.

Updated On: Feb 19, 2017 09:08 AM IST

Sanjay Singh

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यूपी चुनाव 2017: सपा-कांग्रेस गठबंधन के बाद भी यूपी को कुछ और ही पसंद है

उत्तर प्रदेश में बदलाव की बयार बह सकती है. यह राज्य देश के सबसे आबादी वाले सूबे होने के साथ-साथ सियासी तौर पर हिंदी भाषी राज्यों में सबसे अहम है.

वैसे, तीसरे चरण के मतदान से पहले यहां ऐसे संकेत उभरकर सामने आ रहे हैं, जो शायद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की साझा उम्मीदों पर पानी फेर दे. क्योंकि अखिलेश और राहुल की जोड़ी जिसे लेकर पूरे सूबे में नारा दिया गया है कि ‘यूपी को ये साथ पसंद है‘, ये नारा वोटरों के साथ खास जुड़ाव पैदा नहीं कर पा रहा है.

क्या यूपी को सच में ये साथ पसंद है?

मतलब साफ है कि अखिलेश-राहुल की जोड़ी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए वोटरों के साथ जरूरी जुड़ाव नहीं हो पा रहा है. वैसे भी ये नारा सलमान खान की फिल्म सुल्तान के गाने ‘बेबी को बेस पसंद है’ से प्रेरित है.

हालांकि, सपा-कांग्रेस गठबंधन का मुख्य सामाजिक आधार यादवों और मुसलमानों को साथ लेकर है. जो शायद इस धुन को पसंद भी करे. लेकिन ज्यादातर लोगों का कई कारणों से फैसला यही है कि ‘बेबी को बेस नहीं पसंद है’. हो सकता है वो कहें कि 'यूपी को कुछ और पसंद है.'

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ये सच है कि अखिलेश यादव के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का माहौल नहीं है. लेकिन सूबे का सियासी माहौल ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि मतदाता अखिलेश को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दें.

मुस्लिम वोटर्स को लुभाने की कोशिश हिंदुत्व को सुलगा रही है

सपा कांग्रेस गठबंधन की मुस्लिम वोटरों को लुभाने की जबरदस्त कोशिश के चलते पूरे राज्य में हिंदुत्व की भावना को अंदर ही अंदर सुलगने का मौका दे दिया है.

रणनीतिकार इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि मुस्लिम मतदाता वोट डालते हैं. लेकिन मुस्लिम मतदाता अकेले नहीं हैं जो वोट डालते हैं. मायावती ने भी कुछ जगह पर गलतियां की हैं. थोड़ा सा कुरेदने पर गैर यादव और गैर जाटव समुदायों के बीच हिंदुत्व की सुलगती भावना का अहसास किया जा सकता है. ये जरूर है कि माहौल 2014 लोकसभा की तरह नहीं है. लेकिन जमीन पर ये भावना दिखती है जो बाद में बीजेपी के तरफ पलड़ा झुका सकता है.

नोएडा को छोड़कर अभी तक मतदान का प्रतिशत काफी बेहतर रहा है. ये साफ संकेत देता है कि हर समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़कर वोटिंग में हिस्सा लिया है.

मुकाबला सीधा-सीधा बीजेपी बनाम दूसरी पार्टियां हैं

समाज के हर वर्ग के लोगों और सूबे के हर हिस्से में अलग-अलग जाति के लोगों से बात करने के बाद इस लेखक के मुताबिक बीजेपी को दूसरी पार्टियों से बढ़त मिली हुई है. हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ सीटों को छोड़कर जहां मुस्लिम आबादी काफी है, पूरे सूबे में ये चुनाव बीजेपी बनाम दूसरी पार्टियां हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव बाद ये बड़ा बदलाव देखा जा रहा है.

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यूपी चुनाव में बीजेपी की गैर यादव अन्य पिछड़ी जातियों को लुभाने की नीति काम करती दिख रही है. बीजेपी इस बात को खूब प्रचारित कर रही है कि अखिलेश सरकार सिर्फ एक जाति यानी यादवों और एक समुदाय यानी मुसलमानों का ही हित सोचती है. और बीजेपी की प्रचार रणनीति का ये दांव जनता के बीच सही साबित हो रहा है.

आप गाजियाबाद, कन्नौज, कैराना, बागपत, रायबरेली, अमेठी, अमरोहा, शामली या फिर दूसरी जगहों पर लोगों से बात करेंगे, तो कोई भी इस बात की चर्चा छेड़ देगा कि कैसे सरकारी नौकरियों में धांधली की गई है.

ये लोग आपको बता देंगे कि कैसे पुलिस हो या फिर पब्लिक सर्विस कमीशन समेत तमाम महत्वपूर्ण पदों पर कैसे यादवों की नियुक्ति हुई है. खासकर पुलिस और प्रशासन के लिए यादवों को तवज्जो दिया गया है. फ़र्स्टपोस्ट ने इस दावे की पड़ताल तो नहीं की है. लेकिन दावा सही है या गलत, बावजूद इसके जनता यही समझ रही है. और चुनाव में झूठ या फिर अधूरा सच काम नहीं करता. जो बात अहम है वो किसी नेता या फिर किसी मुद्दे पर लोगों की समझ है.

लोगों में असंतोष है

बागपत के गुड़ कोल्हू में काम करने वाले राकेश कश्यप हों या फिर कन्नौज के सोहन लाल, सुकेश कुशावाला हों या शामली के रामपाल राणा हों, रायबरेली के लाल बहादुर सिंह हों या गाजियाबाद के बनवारी गुप्ता, मुरादाबाद के लोकेश मिश्रा हों, सभी अखिलेश सरकार के दौरान सिर्फ यादवों को दिए जाने वाली सुविधाओं की बात करते हैं.

हालांकि, अखिलेश के मुकाबले बीजेपी खेमे में कोई मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं है. बावजूद इससे बीजेपी को बड़ा नुकसान नहीं होगा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी भी पॉपुलैरिटी रेटिंग में सबसे आगे चल रहे हैं.

उनकी एकाग्रता और सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा जोरों पर है. मोदी की छवि काम करने वाले नेता की है. यही वजह है कि मतदाता उन्हें दूसरा मौका देना चाहते हैं. इसके अलावा एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि जब 15 वर्षों तक मुलायम-मायावती और अखिलेश एक के बाद एक मुख्यमंत्री बने. तो इस बार बीजेपी को क्यों नहीं मौका दिया जाए. इसके अलावा मतदाताओं को लग रहा है कि बीजेपी को जिताने का मतलब होगा केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार बनाना.

जमीन पर नोटबंदी बड़ा मुद्दा नहीं

मोदी के आलोचक भले जो कह लें लेकिन जमीन पर नोटबंदी बड़ा मुद्दा नहीं है. और इसका वोटिंग पैटर्न पर असर भी पड़ रहा है. जो लोग नोटबंदी के खिलाफ है और ये कह रहे हैं कि इसके चलते मोदी का सियासी नुकसान होगा. ऐसे लोग मोदी के खिलाफ ही वोटिंग करने वाले हैं. बीजेपी के समर्थक कह रहे हैं कि देश से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए नोटबंदी जरूरी कदम था.

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2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान जनता की जो समझ थी वो इस चुनाव में पूरी तरह बदल चुकी है. पांच साल पहले बहुत कम लोग थे जो बीजेपी की चर्चा किया करते थे.

2017 के चुनाव में बदलाव साफ है. इस बार बीजेपी की मौजूदगी हर जगह दिख रही है. पार्टी समर्थक हर ओर फैले हुए हैं. ‘अबकी बार बीजेपी सरकार’ ये नारा भले इस बार के चुनाव का न हो. लेकिन लोगों के मन में यही नारा बसा हुआ है.

मसलन, डिंपल यादव की लोकसभा सीट पर जब कुछ युवाओं के बीच गर्मागर्म बहस जारी थी. उसी वक्त एक शख्स इस लेखक के पास आया और कहा कि 'इस बार यहां हवा बीजेपी का ही है. उसकी ही सरकार बननी चाहिए.' ये अकेला उदाहरण नहीं है.

रायबरेली में नरेश स्वीट्स के पास एक बुजुर्ग कांग्रेस नेता तो तब हैरान रह गए जब उनके प्रतापगढ़ के दो दोस्तों ने कहा कि वो मोदी के खिलाफ जो भी कहें, लेकिन मोदी को केंद्र और राज्य दोनों में समर्थन देने की जरूरत है.

उनमें से एक की समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि आखिर मोदी अभी भी सबसे ज्यादा पॉपुलर कैसे हैं. उन्हें ये भी भरोसा है कि रायबरेली और अमेठी क्षेत्र में भी लोग मोदी का समर्थन करेंगे. हालांकि उनकी नजर में राहुल गांधी ने तेजी से कई बातें सीखी हैं. 'अखिलेश के बारे में क्या सोचते हैं?'- उनके दोस्त ने ये सवाल पूछा. तो इसपर उस कांग्रेसी नेता ने कहा कि 'उनके बारे में मैं कैसे बता सकता हूं..वो दूसरे दल के नेता हैं.'

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