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एसपी-कांग्रेस गठबंधनः राहुल की भैंस पानी में जाने से ठिठकी

पॉलिटिक्स के घटाटोप में आम वोटर कांग्रेस की कमजोरियों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है.

Anil Yadav Updated On: Feb 13, 2017 04:36 PM IST

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एसपी-कांग्रेस गठबंधनः राहुल की भैंस पानी में जाने से ठिठकी

यूपी चुनाव में कांग्रेस-एसपी गठबंधन का चाहे जो अंजाम हो लेकिन राहुल गांधी की भैंस पानी में जाने से ठिठक गई है. उनके सामने यही सबसे बड़ी चुनौती थी.

उन्हें अगले लोकसभा चुनाव की वैतरणी तक तैरते रहने के लिए 'लाइफ जैकेट' मिल गई है. वे छियालिस के अधेड़ होने के बावजूद कुछ साल और युवा नेता कहलाते रह सकते हैं और देश का मुख्य विपक्ष कांग्रेस इस अनिश्चित सी आंच पर उम्मीदों की पतीली में खिचड़ी पकाती रह सकती है.

जैसा प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, गूगल पर सबसे अधिक चुटकुले उन पर हैं. बात सिर्फ इतनी भर नहीं है. उनके सारे दांव उल्टे पड़कर नए चुटकुले बना रहे थे.

उलटी हो गई सब तदबीरें

यूपी चुनाव के लिए उन्होंने ब्राह्मण चेहरा शीला दीक्षित को चुना था. वे बुढ़ापे के कारण सभाओं तक में नहीं पहुंच पा रही थीं और ब्राह्मण वोटर उन्हें पंजाबी बता रहा था.

इसकी वजह थी कि एनीमिया की पुरानी मरीज कांग्रेस को ब्राह्मण एकबग्गा यानी एकतरफा वोट दे डालता तो भी कुछ होने वाला नहीं था.

प्रदेश अध्यक्ष उन्होंने राजबब्बर को बनाया था जो लखनऊ में रूक नहीं सकते क्योंकि हर कार्यक्रम के बाद रात की फ्लाइट से उन्हें मुंबई लौटना होता है.

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तस्वीर: पीटीआई

रणनीतिकार उन्होंने 'काफी मंहगे' पीके को छांटा था जो देवरिया में खटिया लुटने के बाद शुक्र मना रहे थे कि चलो, इसी बहाने कांग्रेस की मीडिया में चर्चा तो हुई.

कांग्रेसी पीके को गालियां दे रहे थे क्योंकि उन्हें पता नहीं चल पा रहा था कि किससे और क्यों वोट मांगा जाए और यह कि न जाने कब उनका दिया '27 साल यूपी बेहाल' नारा वापस निगलना पड़ जाए...और वही हुआ!

यूपी के प्रमुख शहरों में अखिलेश-राहुल के इन दिनों हो रहे रोड-शो को देखें तो बॉडी लैंग्वेज कांग्रेस की हालत कहती है.

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अखिलेश कार्यकर्ताओं को अनुशासित रहने, भाषण के बीच नारा न लगाने के लिए थमने का इशारा करते हैं लेकिन राहुल एक बार भी ऐसा नहीं करते क्योंकि वहां कोई है ही नहीं जो उनकी सुने.

सौ में पिचानवे झंडे एसपी के दिखाई देते हैं. तैयारी ऐसी होती है कि पहली बार एसपी का झंडा बनी लाल-हरे सूट वाली छोकरियां भी यूपी के चुनाव में नारे लगाती दिखाई दे रही हैं.

राहुल को अखिलेश का साथ पसंद है 

पहले कांग्रेसी इस तरह के प्रचार के उस्ताद माने जाते थे. लेकिन अब राहुल रोड शो में दिल्ली से आए मेहमान की तरह लगते हैं जिन्हें अखिलेश बुजुर्गों के सामने पड़ने पर हाथ हिलाने नहीं, जोड़ लेने के लिए कान में कहते हैं.

'यूपी को ये साथ पसंद है' के नारे में सुल्तान मूवी के हिट 'गाने बेबी को बेस पसंद है' की धमक और  यूपी के दो लड़के, युवा-युवा, इंटरनेट वाले नेता, नई पीढ़ी की पॉलिटिक्स के घटाटोप में आम वोटर कांग्रेस की कमजोरियों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है.

यही संगीत से सजा भुलावा राहुल गांधी को चाहिए था वरना कांग्रेस की भैंस पानी में चली जाती. इसकी सारी जिम्मेदारी उन पर आती, नए चुटकुले बनते और वे उसे दो साल में कीचड़ से भरी तलैया से बाहर न बुला पाते.

यही अखिलेश को भी चाहिए था ताकि मुसलमान चढ़ते सूरज को पहचानें न कि मुलायम सिंह यादव के पस्त होकर घर बैठ जाने से उन्हें मनमाना और कमजोर न समझ लें.

राहुल गांधी ने पार्टी में कार्यकर्ता कम नेता ज्यादा और सताइस साल में सब भूल गया यूपी का जातिवादी वोटर देखकर पहले बीएसपी की तरफ हाथ बढ़ाया था.

लेकिन मायावती ने साफ मना कर दिया क्योंकि एक बार इस तरह के गठजोड़ का नतीजा देख चुकी हैं. तब बीएसपी ने तो कांग्रेस उम्मीदवारों को दलित वोट ट्रांसफर कराया लेकिन कांग्रेस का वोट बीजेपी को चला गया.

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तस्वीर: पीटीआई

इस बार कांग्रेस के अकाउंट में ट्रांसफर के लिए कुछ था ही नहीं. तब राहुल ने कपिल सिब्बल को चुनाव आयोग में अखिलेश को साइकिल चुनाव चिन्ह दिलाने के लिए पैरवी में लगाया.

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गठबंधन की बात शुरू हुई लेकिन ज्यादा सीटें मांगने पर अखिलेश बिदक गए, राहुल गांधी का फोन उठाना ही बंद नहीं किया, उनके और सोनिया गांधी के क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में उम्मीदवार तक उतार दिए.

इसके बाद प्रियंका गांधी ने बात शुरू की जिसे अहमद पटेल ने आगे बढ़ाया, फिर भी सीटों का पेंच फंसा रहा तो सोनिया गांधी को अखिलेश से बात करनी पड़ी. कांग्रेस को हैसियत से ज्यादा सीटें मिलीं जिसे अखिलेश जोर देकर 'बड़े दिल' से किया समझौता बताते हैं.

राहुल की 'पुलिटिकल पोस्चरिंग'

अपरिपक्वता की पोल किसी और ने नहीं खुद राहुल गांधी ने अखिलेश यादव के साथ पहली साझा प्रेस कांफ्रेन्स में खोल दी.

वे बिना पूछे रिपोर्टर्स को अपना 'पुलिटिकल एक्सपीरियंस' बताने लगे, 'जहां राजनीतिक बातचीत होती है वहां पोस्चरिंग (असली भावनाओं को छिपाने की अदा) होती है. हम दोनों पोस्चरिंग कर रहे थे. मैंने गुस्सा होने का नाटक किया...अखिलेश ने गुस्सा होने का नाटक किया. लेकिन प्रेस ने इसे काफी गंभीरता से ले लिया'

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तस्वीर: पीटीआई

इसके बाद उन्होंने अखिलेश की ओर घूमकर आंखे तरेंरी और कहा, 'अगर मैं ऐसा करूं तो आप समझेंगे, ओह माय गॉड ही इज एंग्री विद हिम, लेकिन ऐसा नहीं होता.'

अखिलेश यादव को यह अभिनय देखकर मजा आ गया क्योंकि राजनीति उनके लिए पोस्चरिंग नहीं, अपने कुनबे में और बाहर पिता की राजनीतिक विरासत के खुले मैदान में सर्वाइवल का सवाल है.

इस पर मोदी के एकछत्र नेतृत्व वाली बीजेपी की आंख गड़ी है. हंसी के बीच भी उनकी ठहरी आंखें पूछती लग रही थीं- क्या पोस्चरिंग से असलियत बदल जाती है राहुलजी!

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