S M L

यूपी चुनाव 2017: समाजशास्त्र के जरिए बीजेपी की जीत का अनुमान

यूपी का समाजशास्त्र बताता है कि वहां के मतदाता पर सोशल इंजीनियरिंग का असर है

Updated On: Jan 16, 2017 04:52 PM IST

Alok Kumar Rai

0
यूपी चुनाव 2017: समाजशास्त्र के जरिए बीजेपी की जीत का अनुमान

आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में इस वक़्त विधानसभा चुनाव का शोरगुल है. जल्द ही यहां चुनाव की प्रक्रिया औपचारिक तौर पर शुरू हो जाएगी जो 11 मार्च तक चलेगी.

राजनैतिक विश्लेषक, चुनावी समीकरण के जानकार, पत्रकार और नेता सबके सब अपने अपने मिशन में जुट गए हैं. सबके सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या उत्तर प्रदेश का मतदाता 2014 की तरह इस बार भी अपनी पारंपरिक समझ को नकार कर नया जनादेश देगा?

हाल के दिनों में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग ट्रेंड देखने को मिले हैं. साथ ही इस बार यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी जैसा विशाल राजनैतिक किरदार भी नहीं है. ऐसे में 2014 के चुनावों के नतीजों के आधार पर कोई अनुमान लगाना गलत होगा.

पिछले दो विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख पार्टियों ने यूपी में जो वोट हासिल किये उनका हिसाब कुछ इस तरह है-

बहुमत की सरकार 

2007 और 2012 के चुनाव के नतीजे बताते हैं कि करीब 30 फीसद वोट के साथ बीएसपी और समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी.

Table1

उत्तर प्रदेश का समाजशास्त्र बताता है कि वहां के मतदाता पर साफ तौर पर सोशल इंजीनियरिंग का असर है. उन्हें जाति और समुदाय में बांटकर देखा जाता है. तमाम पार्टियों की रणनीति भी इसी सामाजिक बंटवारे पर आधारित होती है.

यूपी के जातीय समीकरणों पर नजर डालें तो:

1.सवर्ण जातियां कुल आबादी का 22 प्रतिशत हैं. इनमें ब्राह्मण 9 फीसद, राजपूत 6 फीसद, त्यागी-भूमिहार-2 प्रतिशत, बनिया-2 प्रतिशत, जाट-2 फीसद और बाकी जातियां एक प्रतिशत हैं.

2.यूपी में पिछड़ी जातियों का आबादी में हिस्सा 40 प्रतिशत है. इसमे से यादव-8 फीसद, कुर्मी-3.5 फीसद, लोध-2.5 फीसद, कोइरी-काछी-3.5 प्रतिशत, मल्लाह-कश्यप-2.5 फीसद, ओबीसी बनिया-2 प्रतिशत और बाक़ी जातियां-18 फ़ीसद हैं.

3.राज्य में दलित और अनुसूचित जातियों की आबादी 20 फीसद है. इसमें जाटव-चमार-11 प्रतिशत, पासी-3.5 फीसद, धोबी-1.5 प्रतिशत और बाकी जातियां-4 फीसद हैं.

4.यूपी में अल्पसंख्यकों की आबादी 18 प्रतिशत है. इसमें से 17 फीसद मुसलमान हैं और बाकी एक फीसद सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई हैं.

भारत में तमाम चुनावों से जो कुछ खास बातें सामने आती हैं, वो इस तरह हैं:

1.यहां वोटर अक्सर भावना में बहकर वोट देने का फैसला करता है.

2.सड़क और बिजली के मुद्दे यूपी के चुनावों के सबसे अहम मुद्दे हैं. ये अक्सर कामयाबी या हार की बड़ी वजह बनते हैं

3.किसी राजनैतिक दल का नेतृत्व चुनाव में मिलने वाली जीत या हार में अहम रोल निभाता है.

यूपी के वोटर के बारे में ये कहा जाता है कि वो अक्सर भावनाओं में आकर वोट देता है

यूपी के वोटर के बारे में ये कहा जाता है कि वो अक्सर भावनाओं में आकर वोट देता है

4.किसी करिश्माई नेता से मतदाता का रिश्ता भी चुनाव के नतीजों पर गहरा असर डालता है. भले ही चुनाव में जातीय समीकरणों का बहुत ध्यान रखा जाता हो, मगर किसी करिश्माई नेता की मौजूदगी के बाद ये जातीय समीकरण बेमानी हो जाते हैं. मोदी, नीतीश कुमार और केजरीवाल की कामयाबी से तो यही संकेत मिलता है क्योंकि इनमें से कोई भी किसी एक जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करता है.

5.शहरी वोटर आम तौर पर बीजेपी के समर्थन में वोट देते रहे हैं. यही वजह है कि यूपी में लगातार कमजोर होती बीजेपी को स्थानीय निकाय के चुनावों में कामयाबी मिलती रही है.

सामाजिक ताना-बाना

यूपी का सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि बीजेपी को इनसे इस तरह से फायदा मिल सकता है:

बहुकोणीय मुकाबलों में बीजेपी को अक्सर ज्यादा कामयाबी मिलती रही है. असम, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में बीजेपी की कामयाबी के पीछे ये बहुकोणीय चुनावी मुकाबले भी थे. वहीं दिल्ली और बिहार में जब बीजेपी का विरोधी गठबंधन या दल से सीधा मुकाबला हुआ तो अपने हिस्से के वोट हासिल करने के बावजूद बीजेपी इसे जीत में तब्दील नहीं कर सकी.

ये भी पढ़ें: विद्रोही तेवर और नई राजनीति का आकर्षण

अब जबकि यूपी में बीएसपी, बीजेपी, समाजवादी पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला कमोबेश तय है, तो बीजेपी को इससे फायदा हो सकता है और बाकी दलों के चौथे मोर्चे की मौजूदगी बीजेपी को और भी मदद कर सकती है.

आबादी के लिहाज से यूपी देश का सबसे बड़ा सूबा है. यहां मुसलमानों की नुमाइंदगी करने वाले कई राजनैतिक संगठन हैं. जैसे की पीस पार्टी, जिसने 2012 के चुनाव में 3 फीसद वोट हासिल किये थे और 4 सीटें भी जीती थीं. पूर्वी उत्तर प्रदेश की पंद्रह सीटों पर उलेमा काउंसिल का भी अच्छा खासा असर है. वहीं बाहुबली अंसारी भाइयों की कौमी एकता दल ने भी पिछले चुनाव में चार जिलों में अपना असर दिखाया था और दो सीटें जीती थीं.

समाजवादी पार्टी अपनी अंदरुनी लड़ाई में घिरी है जिससे उसको नुकसान हो सकता है

समाजवादी पार्टी अपनी अंदरुनी लड़ाई में घिरी है जिससे उसको नुकसान हो सकता है

हालांकि अब कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय हो गया है. समाजवादी पार्टी की मुस्लिम समुदाय में अच्छी खासी पैठ है खासकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव युवा मुसलमानों के बीच खासे लोकप्रिय हैं. इस बार बीएसपी भी मुस्लिम वोटरों को लुभाने में पूरी ताकत लगा रही है. असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन भी इस बार यूपी चुनाव में उतर रही है.

यूपी में जिस सीट पर भी कांग्रेस मजबूत रही है, वहां उसे मुस्लिम वोटरों का साथ मिला है. वैसे इस बार राज्य में मुस्लिम वोटर किसी एक दल के साथ जाने के बजाय अलग-अलग दलों के उन उम्मीदवारों को समर्थन देंगे जिनके बीजेपी प्रत्याशी को हरा पाने की उम्मीद ज्यादा होगी.

सत्ताधारी समाजवादी पार्टी अंदरूनी कलह से जूझ रही है. यादवों को ज्यादा तरजीह देने से दूसरी जातियों के वोटर भी पार्टी से नाराज हैं. मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति की वजह से भी वोटरों का एक तबका समाजवादी पार्टी को नापसंद करता है.

बीएसपी ने भी इन चुनावों में मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है

बीएसपी ने भी इन चुनावों में मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है

बीएसपी अभी भी तमाम जातियों के गठजोड़ की उस रणनीति पर अमल कर रही है, जो 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में पूरी तरह नाकाम साबित हुई थी. पिछली बार बीएसपी ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही थी. इस बार वो मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने में जुटी है. बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता और समाजवादी पार्टी के अंदरूनी झगड़े की वजह से मुस्लिम वोटर बीएसपी के साथ जा सकते हैं.

किसान कनेक्ट और खाट सभा जैसी रणनीतियों के बावजूद, कांग्रेस मतदाताओं से नये सिरे से रिश्ता जोड़ने में नाकाम रही है. हालांकि अभी भी मुस्लिम वोटर कांग्रेस को पसंद करते हैं, जैसा कि देवबंद के उप चुनाव में देखने को मिला. लेकिन कांग्रेस की जमीनी स्तर पर गैरमौजूदगी बीजेपी के पक्ष में जा सकती है.

बीजेपी का जातीय समीकरण

बीजेपी ने राज्य में अलग-अलग जातियों के नेताओं को तरजीह देकर जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है.

ये भी पढ़ें: बिहार से बीजेपी का क्या सबक मिला

बीजेपी और संघ का काडर राज्य में हमेशा से मजबूत रहा है. इसी काडर की मदद से बीजेपी राज्य में तीन बार सरकार बना सकी है. और इसी काडर की मदद से बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव में 90 फीसद सीटें जीतने में कामयाब रही थी.

सवर्ण जातियों के वोटर अक्सर बीजेपी का साथ देते रहे हैं. गैर यादव ओबीसी भी बीजेपी के समर्थन में आते रहे हैं. बीजेपी ने गैर जाटव दलितों को लुभाने में भी काफी जोर लगाया है. यूपी के जातीय समीकरणों पर नजर डालें तो जो कुछ मोटी बातें सामने आती हैं, वो इस तरह हैं-

Table2

बहुकोणीय मुकाबले में जिस दल को भी तीस फीसद वोट मिलेंगे, उसकी सरकार बनने की पूरी उम्मीद है. बीजेपी अपनी रणनीति के बूते 30 फीसद से ज्यादा वोट हासिल करने की कोशिश में है.

यूपी को जीतने के लिए बीजेपी और पीएम मोदी को उन पांच फीसद मतदाताओं को अपने पाले में लाना होगा, जो अभी अनिश्चितता के मूड में हैं और जो हवा के रुख के साथ निर्णय लेते हैं. इसके लिए बीजेपी की चुनाव प्रचार की रणनीति अहम होगी.

इसके लिए बीजेपी को नए समुदायों तक पहुंच बनानी होगी. उनके बीच ये माहौल बनाना होगा कि बीजेपी उन जातियों की हमदर्द है. उनकी उम्मीदों को समझती है और उन्हें पूरा करने की कोशिश करेगी. बीजेपी को ऐसा नेतृत्व देने पर जोर देना होगा जो जाति या इलाके के दायरों से ऊपर हो, जो सभी समुदायों की नुमाइंदगी करने वाला हो.

पार्टी को युवा और महिला वोटरों को लुभाने के लिए खास तौर से ताकत लगानी होगी. इसके लिए जरूरी होगा कि बीजेपी का चुनाव प्रचार सकारात्मक मुद्दों पर हो. ताकि वो आबादी के बड़े हिस्से को अपील कर सके. उन वोटरों को लुभा सके जो जातीय नजरिये से आगे बढ़ना चाहते हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi