S M L

यूपी चुनाव 2017: ये हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के दावेदार

एसपी और बीएसपी के पास जहां मायावती और अखिलेश का चेहरा तो वहीं बीजेपी में इस मसले पर कड़ी प्रतिस्पर्धा है

Updated On: Mar 10, 2017 01:14 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

0
यूपी चुनाव 2017: ये हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के दावेदार

कुछ ही घंटों की बात है जब ये तय हो जाएगा कि यूपी विधानसभा के चुनाव में किस पार्टी ने बाजी मारी और कौन सी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.

स्पष्ट बहुमत के आधार पर देखा जाए तो तीनों प्रमुख पार्टियों की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार तय है. एसपी और बीएसपी के पास जहां मायावती और अखिलेश का चेहरा तो वहीं बीजेपी में इस मसले पर कड़ी प्रतिस्पर्धा है.

एक नजर इन सभी संभावित चेहरों पर....

राजनाथ सिंह

उत्तर प्रदेश के संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर ज्यादातर लोग केंद्रीय गृहमंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह के नाम पर शर्त लगाने को तैयार होंगे.

rajnath singh

राजनाथ सिंह सूबे में बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता हैं. उन्होंने मार्च 2002 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था. इसके बाद उन्होंने अपना कदम राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ाया.

वो पहले केंद्रीय मंत्री बने फिर दो बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. बतौर स्टार कैंपेनर राजनाथ सिंह विधानसभा चुनावों के दौरान 26 दिनों तक सूबे में जमे रहे. इस दौरान उन्होंने 120 जनसभाओं को संबोधित किया.

चुनाव प्रचार के दौरान राजनाथ सिंह ने 20 हजार किलोमीटर की यात्रा भी की. उनके बारे में कहा जाता है कि वो संगठन के काफी अनुशासित सिपाही हैं, जो हमेशा से पार्टी के फैसलों के साथ आगे बढ़ने के लिए जाने जाते हैं.

फिजिक्स (भौतिकी) में उन्हें मास्टर की डिग्री हासिल है. जबकि 1964 से वो आरएसएस से जुड़े हुए हैं और यही बात उन्हें एक ऐसा सियासी चेहरा बनाती है जो जमीनी स्तर पर लोगों से मजबूती जुड़े हुए हैं.

मनोज सिन्हा

Manoj Sinha

बीजेपी की तरफ मुख्यमंत्री का चेहरा दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा भी हो सकते हैं

मुख्यमंत्री की रेस में राजनाथ सिंह के बाद जिस दूसरे केंद्रीय मंत्री का नाम आता है वो दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा हैं.

आईआईटी बीएचयू से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की डिग्री हासिल करने वाले मनोज सिन्हा ने अपने काम से बतौर संगठनात्मक रणनीतिज्ञ का दर्जा हासिल किया है.

इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का भरोसा भी जीता है. सभी इस बात को जानते हैं कि उन्हें यूपी की हर एक विधानसभा सीट की जानकारी है.

इतना ही नहीं वो प्रधानमंत्री की हाई प्रोफाइल सीट वाराणसी का जिम्मा भी संभाले हुए हैं. वो एक मजबूत पार्टी कार्यकर्ता हैं जो हमेशा लो-प्रोफाइल में रहना पसंद करते हैं.

बावजूद इसके पूर्वी यूपी में मनोज सिन्हा खासे चर्चित नेता हैं. सिन्हा के साथ बस एक ही कमी है वो है उनकी जाति. वो भूमिहार जाति से ताल्लुक रखते हैं और पूर्वी यूपी के कुछ जिलों तक ही भूमिहारों की संख्या सीमित है.

लेकिन यही कमी उनके लिए वरदान भी साबित हो सकती है क्योंकि अगर वो मुख्यमंत्री पद का जिम्मा संभालते हैं तो उनकी छवि जाति को लेकर पक्षपात नहीं करने वाले नेता की बनेगी.

केशव प्रसाद मौर्य

Agra: UP BJP President Keshav Prasad Maurya addresses an election rally in Agra on Thursday. PTI Photo (PTI2_2_2017_000230B)

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या राज्य के ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं

मुख्यमंत्री की रेस में फुलपुर से पहली बार चुने गए सांसद और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का भी नाम शामिल है.

केशव प्रसाद मौर्य ने राजनाथ सिंह और मनोज सिन्हा के मुकाबले कम जनसभाओं को संबोधित किया है, क्योंकि वो पर्दे के पीछे रहकर संगठनात्मक जिम्मेदारियों को निभाने में लगे थे.

एक बात जो उनके पक्ष में जाती है वो ये कि कल्याण सिंह के उत्कर्ष के दौरान जो गैर-यादव ओबीसी तबका बीजेपी के साथ खड़ा दिखता था. वही मतदाता इस बार पार्टी के साथ दिखा.

ये भी पढ़ें: हमको मालूम है यूपी की हकीकत लेकिन...

अगर सूबे में बीजेपी को भारी जनसमर्थन ओबीसी जातियों की वजह से मिलता है तो इस समुदाय से किसी नेता को नेतृत्व का मौका दिया जाना चाहिए.

हालांकि, केशव प्रसाद मौर्य के लिए जो सबसे कमजोर कड़ी है वो ये कि उन्हें थोड़ा भी प्रशासकीय अनुभव नहीं है. ऐसे में यूपी जैसे बड़े राज्य को संभालना काफी मुश्किल भी साबित हो सकता है.

संतोष गंगवार

GANGWARNE

केंद्रीय वित्तमंत्री संतोष गंगवार भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं

एक और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार जो वित्त-राज्यमंत्री का जिम्मा संभाल रहे हैं. वो भी मुख्यमंत्री की रेस में शामिल हैं.

हालांकि, उनके नाम की चर्चा खूब जोर-शोर से नहीं की जा रही है. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में 16 वीं लोकसभा के लिए बतौर सांसद उन्होंने चुनाव जीता और अपने सियासी विरोधी को 2.4 लाख मतों से चुनाव में शिकस्त दी.

जहां तक बात प्रशासकीय अनुभव की है तो संतोष गंगवार को इसकी कमी नहीं है. वित्त-राज्यमंत्री बनने से पहले गंगवार  पेट्रोलियम और नेचुरल गैस राज्यमंत्री थे.

जबकि इसके साथ ही उन्हें संसदीय कार्य की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई थी.

वर्ष 1999 में वो साइंस एंड टेक्नोलॉजी राज्यमंत्री भी रह चुके हैं. 1989 के बाद से ही गंगवार बीजेपी के स्टेट वर्किंग कमेटी के सदस्य भी हैं.

अखिलेश यादव

Akhilesh

एसपी का मुख्यमंत्री चेहरा निर्विवाद रूप से अखिलेश यादव हैं

अगर यूपी में एसपी कांग्रेस गठबंधन की जीत होती है तो बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है.

परिवार की आतंरिक कलह के बाद अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. अखिलेश के नेतृत्व में निश्चित तौर पर पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव की बयार तो बही है.

लेकिन पार्टी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के बीच अखिलेश को अभी अपनी स्वीकार्यता और बढ़ानी होगी. जबकि अखिलेश के पिता मुलायम सिंह पार्टी के संस्थापक हैं.

ये भी पढ़ें: अगर हार हुई तो अखिलेश यादव का क्या होगा?

वो उस सामाजिक गठजोड़ के नेता हैं जिसका समर्थन उन्हें उनकी सक्रिय राजनीतिक जीवन के दौरान हमेशा से प्राप्त था. जबकि अखिलेश उस सियासी विरासत के असल हकदार हैं इसके लिए उन्हें खुद को साबित करना होगा.

अखिलेश के सामने सिर्फ पार्टी के पारंपरिक समर्थकों यानी यादवों को ही लुभाने की चुनौती नहीं है. बल्कि उन जातियों को भी पार्टी से जोड़ कर रखना है जो अब पार्टी के साथ हैं.

दो राय नहीं कि अखिलेश ने युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाबी पाई है.

मायावती

Mayawati at a press conference

बीएसपी का चेहरा और नेता सिर्फ मायावती हैं

यूपी की सियासत में मायावती किसी राजनीतिक पहेली से कम नहीं हैं. मौजूदा समय में बीएसपी और मायावती एक ही हैं.

लिहाजा यूपी में अगर बीएसपी को सरकार बनाने का मौका मिलता है तो मायावती का मुख्यमंत्री बनना तय है.

मायावती चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं और मौजूदा समय में वो बीएसपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. हालांकि, इस बार बीजेपी और बीएसपी के चुनाव प्रचार शुरू करने के काफी देर बार काफी शांति के साथ उन्होंने अपना सियासी अभियान शुरू किया.

ये भी पढ़ें: चुनाव नतीजों से साफ होगा कि राहुल हीरो हैं या जीरो

उन्होंने उन सीटों पर खास ध्यान दिया जहां 2012 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी के उम्मीदवार काफी कम वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे.

चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत किया तो मुस्लिम प्रभाव वाले सीटों पर उन्होंने उम्मीदवारों के चयन में देरी नहीं की.

उन्होंने अगड़ी जातियों को भी लुभाने की कोशिश की. जिस सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले के चलते उन्होंने 2007 के चुनाव में जीत का परचम लहराया था उस फॉर्मूले में भी उन्होंने बदलाव लाने की कोशिश की.

अब 11 मार्च को चुनाव नतीजे ही बताएंगे कि आखिर मायावती की सियासी रणनीति क्या असर दिखाती है.

ये भी मुमकिन है कि चुनाव नतीजे आने के बाद किसी एक पार्टी को बहुमत न मिले और यूपी में एक बार फिर कुछ वैसा हो जैसा सालों पहले हुआ था और दो पार्टियों के बीच मुख्यमंत्री का पद 6-6 महीने या ढाई-ढाई साल के हिसाब से बंट जाए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi