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एक्जिट पोल 2017: रिकॉर्ड चुनावी जनसभाओं से चुनाव जीतने की तैयारी

चुनावी सभा में अपने विरोधियों पर नाम लेकर निशाना साधने का सिलसिला पीएम मोदी ने शुरू किया

Anant Mittal Updated On: Mar 10, 2017 03:53 PM IST

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एक्जिट पोल 2017: रिकॉर्ड चुनावी जनसभाओं से चुनाव जीतने की तैयारी

यूपी में कुल 21 सभा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में देश के प्रधानमंत्री द्वारा सबसे अधिक चुनाव प्रचार का रिकॉर्ड बना डाला है.

यह बात दीगर है कि साल 2015 में बिहार के विधानसभा चुनाव में 40 चुनावी सभा करने के अपने ही रिकॉर्ड से मोदी उत्तर प्रदेश में लगभग आधे फासले पर ही अटक गए.

दूसरी ओर वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में रिकॉर्डतोड़ चुनाव सभा करने वाले मुलायम सिंह यादव ने इस बार सपा की कुल जमा चार सभाओं को ही संबोधित करके किसी कद्दावर नेता द्वारा सबसे कम प्रचार का नया रिकॉर्ड बनाया है.

यही हाल उनके छोटे भाई और राज्य के पूर्व कद्दावर मंत्री तथा पूर्व सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव का भी रहा. शिवपाल तो अपने चुनाव क्षेत्र जसवंत नगर तक ही सीमित रह गए.

हालांकि सपा अध्यक्ष और सुपर स्टार प्रचारक अखिलेश यादव ने भी 200 से अधिक चुनाव सभा करके किसी मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक सभाओं का रिकार्ड बना दिया.

डिंपल यादव भी सपा के लिए मैदान में

सपा-कांग्रेस गठजोड़ की दूसरी सबसे बड़ी प्रचारक मुख्यमंत्री की पत्नी सांसद डिंपल यादव रहीं, हालांकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी 55 सभा करके रिकार्ड बनाया. बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी 51 जिलों में ताबड़तोड़ सभाएं कीं.

प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव पोस्टरों एवं विज्ञापनों के प्रतीकों के मामले में भी 2012 के पिछले चुनाव से एकदम अलग रहा. पिछले चुनाव में बीजेपी के प्रमुख चेहरे जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी थे, वहीं मोदी और शाह ने अबकी बार उनकी जगह ले ली.

वाजपेयी और आडवाणी का बीजेपी के किसी पोस्टर या विज्ञापन में नामोनिशान भी नहीं दिखा. अलबत्ता बीजेपी के पोस्टरों में जहां ऊपर मोदी और शाह के बड़े चेहरे रहे, वहीं उनकी निचली पट्टी में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, उमा भारती और प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के चेहरे अपेक्षाकृत सिकुड़े से नजर आए.

जाहिर है कि यह चारों चेहरे राज्य में बीजेपी के अगड़ों और अति पिछड़ों के जातीय समीकरण के प्रतीक रहे. हालांकि पार्टी कैडर ने इनमें दलित नेता की गैर मौजूदगी पर उंगली उठाई वह भी तब जबकि मायावती द्वारा बीजेपी और मोदी पर सरेआम दलित विरोधी होने का आरोप लगाया गया.

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सपा के पोस्टर और विज्ञापन भी केवल अखिलेश और राहुल केंद्रित होने के कारण पिछली बार से एकदम अलग रहे. साल 2012 में हालांकि मुलायम सिंह यादव सपा के निर्विवाद और सबसे बड़े नेता थे मगर उन्होंने पार्टी के विज्ञापनों में अपने साथी नेताओं को पूरी तवज्जो दी थी.

अपने साथी विभिन्न जातियों के नेताओं की पूरी जमात के साथ वाले झुंडचित्र ही उनके विज्ञापनों और पोस्टरों में छाए रहे थे. मुलायम सिंह की रणनीति तब प्रदेश के सभी छोटे-बड़े जातीय समूहों और समुदायों को अपने साथ साधने की थी. जाहिर है कि उनकी यह रणनीति सोलह आने खरी भी साबित हुई.

सपा को विधानसभा चुनाव में अपने बूते पूरा बहुमत मिला और उन्होंने लगे हाथ अपने बेटे अखिलेश उर्फ टीपू का राजतिलक कर दिया.

अखिलेश थे पहले विधायक दल के नेता

राजीव गांधी और नंदमूरि तारक रामामराव के बाद अखिलेश देश के ऐसे पहले नेता थे, जिन्हें बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के सीधे किसी विधायी इकाई के मुखिया की बागडोर मिल गई थी. अखिलेश ने इस बार पूरी पार्टी ही अपने नाम करके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को गले लगाया है सो उनकी प्रचार शैली भी बदली है.

कांग्रेस और बसपा के प्रचार के केंद्र में राहुल गांधी और मायावती ही रहे. यह बात अलग है कि उनके भी नारे और जुमले अबकी बार मोदी की आलोचना अथवा सेकुलरवाद की कसम खाने पर केंद्रित रहे.

यूपी में अपने विपक्षियों पर निशाना साधने के मामले में प्रधानमंत्री ने अपना बिहार का रिकॉर्ड तोड़ दिया. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को भ्रष्ट, गुंडा, कुनबापरस्त और जातिवादी से लेकर सांप्रदायिक तक कहने के लिए रोज नए-नए जुमले गढ़े.

उनके विरोधियों ने भी मोदी के लिए अप्रत्यक्ष रूप में गुजराती गधे की उपमा देने से लेकर दलित विरोधी होने तक अनेक तोहमत जड़ीं, जिनका उन्होंने बखूबी जवाब देकर तारीफ भी बटोरी.

चुनावी सभा में अपने विरोधियों पर नाम लेकर निशाना साधने का सिलसिला तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया मगर खत्म राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने ठेठ गंवई शैली में विरोधियों का नामकरण करके किया. लालू ने अधिकतर पूर्वांचल में किए गए अपने भाषणों में अमित शाह को गैंडा कहकर उनका मजाक उड़ाया.

रालोद के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह भी बसपा अध्यक्ष मायावती को बुरा-भला कहकर अपने वोट बैंक की नजरों में चढ़ने की कोशिश से नहीं चूके. हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सभी नेताओं से पद की गरिमा बनाए रखने की अपील की.

राज्य में चुनाव प्रचार करीब डेढ़ महीने चला जिसमें मोदी और उनके मंत्रिमंडल के तीन दर्जन साथियों ने पूरे प्रदेश को मथ डाला. यूपी और सपा के सबसे लोकप्रिय और चमकदार चेहरे अखिलेश यादव ने भी 200 चुनाव सभाओं का रिकॉर्ड बना डाला.

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केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी रोजाना औसतन दो सभाएं कीं और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी 50 का आंकड़ा पार किया. बसपा सुप्रीमो मायावती ने 51 जिलों में सभा करके सत्ता पाने को जीतोड़ मेहनत की.

बसपा महासचिव सतीश मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दिकी तथा राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह और उनके वारिस जयंत चौधरी ने भी डटकर अपने उम्मीदवारों के लिए सभा कीं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, और केंद्रीय मंत्रियों कलराज मिश्र, उमा भारती, मनोज सिन्हा जैसे नेताओं ने भी ताबड़तोड़ सभा कीं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 55 सभा कीं और अखिलेश यादव के साथ जुलूस भी निकाले. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर और प्रभारी गुलाम नबी भी स्टार प्रचारक रहे. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई जनसभा नहीं की मगर वीडियो और छपे हुए संदेश के जरिए कांग्रेस को वोट देने की अपील की.

दो सभाओं में दिखीं प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी केवल दो सभाओं में शामिल हुईं, जिनमें से एक सभा में अनौपचारिक भाषण किया. सपा- कांग्रेस गठबंधन में राहुल गांधी, अखिलेश यादव के संयुक्त रोड शो व सभाओं ने राज्य में 1967, 1977, 1989 और नब्बे के दशक में गठबंधनों की सभाओं की याद करा दी.

उन गठबंधनों में चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, बलराज मधोक, राम मनोहर लोहिया, पीलू मोदी, मोराजी देसाई, जॉर्ज फर्नान्डीज, चंद्रभानु गुप्ता, हेमवतीनंदंन बहुगुणा, बाबू जगजीवन राम, चंद्रशेखर, रामधन, अजीत सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह, कर्पूरी ठाकुर, आरिफ मुहम्मद खां, शहाबुद्दीन, कांशीराम, मायावती आदि कद्दावर नेता संयुक्त सभाओं को संबोधित किया करते थे.

90 के दशक में अटल-आडवाणी-जोशी . फोटो: रायटर्स

उन्हें सुनने हजारों की तादाद में लोग पैदल मीलों चलकर सभाओं में आते थे और अपना जेवनार भी साथ बांध कर लाते थे. तब न तो बसों में भरकर भीड़ जुटाने का रिवाज था और न ही उन्हें खाने-पानी-रुपयों के पैकेट बांटने का.

इतने विलक्षण चुनावी घमासान के बाद देश के अधिकतम मतदाताओं वाले राज्य में अपनी जीत का दावा तो सभी पक्ष कर रहे हैं मगर कोई भी दल बहुमत मिलने के प्रति आश्वस्त नहीं है. ऐसा शायद बिहार के अनुभव के कारण हो रहा है.

वहां प्रधानमंत्री मोदी की सभाओं में बेहिसाब भीड़ जुटने के बावजूद सत्ता की चाबी जनता ने उनके प्रतिद्वंद्वियों को सौंप दी थी.

बिहार की तरह यूपी में भी समाज जातियों और उपजातियों में बंटा हुआ है, मगर वहां के उलट यहां सत्ता के दो से अधिक दावेदार हैं. बिहार में बीजेपी-लोजपा, रालोसपा-मांझी के मोर्चे और जदयू-राजद-कांग्रेस के मोर्चे के बीच सत्ता के लिए सीधी टक्कर थी.

यूपी में बीजेपी-भासपा-अपना दल मोर्चे का मुकाबला जहां सपा-कांग्रेस के मोर्चे से है, वहीं सत्ता की प्रमुख दावेदार मायावती की बसपा भी इन दोनों मोर्चों को कड़ी चुनौती दे रही हैं. इसलिए जातियां ही नहीं उपजातियां और समुदाय भी पार्टियों, नेताओं, उम्मीदवारों, बाहुबलियों और वोटों के स्थानीय ठेकेदारों के बीच बुरी तरह बंट गए हैं.

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