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राजनीति का मतलब है राष्ट्रनिर्माण के लिए सरकार बनाना: राजनाथ सिंह

अगर कोई समुदाय आज हमें वोट नहीं दे रहा तो वह हमें कल वोट देगा

Sanjay Singh Updated On: Mar 01, 2017 07:44 PM IST

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राजनीति का मतलब है राष्ट्रनिर्माण के लिए सरकार बनाना: राजनाथ सिंह

सियासी एतबार से यूपी हिंदी पट्टी का सबसे अहम सूबा है. देश की सबसे बड़ी आबादी वाले इस राज्य में बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता हैं राजनाथ सिंह.

वे फिलहाल गृहमंत्री हैं और इससे पहले यूपी के मुख्यमंत्री, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा अन्य महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. सूबे में चल रहे चुनावों के मद्देनजर राजनाथ सिंह ने अस्थायी तौर पर अपना डेरा लखनऊ में जमाया है. वे लखनऊ से सांसद भी हैं.

इन दिनों उनकी दिनचर्या बड़ी व्यस्त चल रही है. सबेरे मंत्री पद की जिम्मेदारियों पर नजर दौड़ाना, फिर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात. इस बीच चुनाव को लेकर राष्ट्रीय नेताओं से तालमेल बनाना और फिर हैलिकॉप्टर पर सवार होकर चुनाव-अभियान के कठिन सफर पर निकलना.

राजनाथ सिंह दिन में कम से कम पांच से छह रैलियां कर रहे हैं. शाम को डेरे पर लौटते ही फिर से अपने मंत्रालय के अधिकारियों से आज के कामकाज का हाल-चाल लेते हैं.

पार्टी के सूबाई और केंद्रीय नेताओं से संपर्क साधकर फीडबैक लेना होता है. इसके बाद अगले दिन के लिए रणनीति बनाने के काम पर जुट जाते हैं. अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच राजनाथ सिंह ने फ़र्स्टपोस्ट के लिए कुछ वक्त निकाला.

उन्होंने हमारे पॉलिटिकल एडिटर संजय सिंह से रोजमर्रा की राजनीति, चुनाव, राहुल गांधी-अखिलेश यादव की जोड़ी, मनमोहन सिंह पर प्रधानमंत्री की रेनकोट वाली टिप्पणी से उपजे विवाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने रिश्ते समेत कई मुद्दों पर खुलकर बात की.

बातचीत का एक मुद्दा यह भी रहा कि यूपी में अगर बीजेपी जीतती है तो सूबाई राजनीति में अपने लौटने और फिर से मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने को लेकर वे क्या सोचते हैं. पंद्रह साल पहले राष्ट्रीय राजनीति में जाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया था.

पढ़िए राजनाथ सिंह से फर्स्टपोस्ट की पूरी बातचीत.

आप यूपी के कद्दावर नेता हैं और राज्य में चुनाव-अभियान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. साथ ही आप देश के गृहमंत्री भी हैं और यह पद पूरा समय मांगता है. ऐसे में तमाम जिम्मेदारियों के बीच आप कैसे तालमेल बैठा पा रहे हैं.

मैं गृहमंत्रालय के अधिकारियों से लगातार बात करते रहता हूं. मैं अपने टेबुल पर रखी तमाम फाइल्स को निबटा कर आया हूं. अधिकारियों से मेरा रोजाना का संपर्क है और मुझे जो निर्देश देने होते हैं वे निर्देश मैं रोज ही देता हूं.

आखिर काम तो नौकरशाही के ढांचे के भीतर ही होता है. हां, दो-चार अधिकारियों से मुझे फोन पर रोजाना बात करनी होती है और यह काम मैं लगातार कर ही रहा हूं. अगर दिल्ली में होता हूं तो इनकी मीटिंग बुलाता हूं.

कभी-कभी, जैसे कुछ रोज पहले ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहसचिव, आईबी के निदेशक और रॉ के चीफ के साथ मेरी बैठक हुई और हर दो-तीन घंटे पर, चाहे मैं जहां भी होऊं, मुझे खबर मिलती रहती है कि देश में कहां क्या चल रहा है.

अब जबकि सूबे के ज्यादातर इलाकों में चुनाव पूरे हो चुके हैं तो आपका आकलन क्या कहता है, यूपी के चुनाव किसकी ओर जा रहे हैं?

बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलेगा.

आप उस सूरत में भी यह कह रहे हैं जबकि पहले चरण के दौरान जिन इलाकों में चुनाव हुए वहां जाट नाराज थे, उन्होंने बीजेपी के खिलाफ और आरएलडी को वोट डाला?

मैं नहीं मानता कि जाटों के सारे के सारे वोट आरएलडी को ही पड़े, बीजेपी को भी जाट समुदाय के वोट अच्छी तादाद में पड़े हैं.

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क्या इस चुनाव का पहिया एक अलग ही दिशा में मुड़कर विकास से कब्रिस्तान-श्मशान की ओर चला आया है. आखिर ऐसा क्यों हुआ?

प्रधानमंत्री के बयान की गलत तरीके से व्याख्या नहीं होनी चाहिए. प्रधानंमत्री के कहने का मतलब था कि नारा तो हमारा सबका साथ, सबका विकास का है तो इसी तर्ज पर किसी भी आदमी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए.

जाति, धर्म या मत के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. अगर हम किसी समुदाय के लिए कुछ ज्यादा करते हैं और किसी समुदाय के लिए कुछ कम तो जब तक यह जरुरत को भांपकर किया जा रहा है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

लेकिन अगर यह काम वोटबैंक की राजनीति को नजर में रखकर किया जा रहा है तो यह समाज और देश के लिए ठीक नहीं है. राजनेताओं को ऐसे काम से दूर रहना चाहिए.

मैं हमेशा कहता हूं कि राजनीति का मतलब सिर्फ सरकार बनाना नहीं होता, राजनीति का मतलब सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं. राजनीति का मतलब है राष्ट्रनिर्माण के लिए सरकार बनाना.

क्या आप सचमुच मानते हैं कि अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने जाति, समुदाय और धर्म के आधार पर, श्मशान बनाम कब्रिस्तान या फिर हज के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी के मसले पर भेदभाव किया है ?

मैं आपसे साफ-साफ कहूं तो कहना होगा कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने हमेशा फूट डालो-राज करो की नीति पर विश्वास किया है. यह शुरुआत से ही उनकी नीति रही है. समाजवादी पार्टी ने कभी सबको साथ लेकर चलने वाली राजनीति नहीं की. न ही बीएसपी ने ऐसा किया है.

क्या आपका इशारा यादव और मुस्लिम को लेकर है?

मेरा मतलब कि वे लोग कहते रहते हैं ना कि यह समुदाय मुझे वोट कर रहा है, वह समुदाय मुझे वोट कर रहा है. मैं कभी नहीं कह सकता कि यह या वह समुदाय मुझे वोट कर रहा है या नहीं. अगर कोई समुदाय आज हमें वोट नहीं दे रहा तो वह हमें कल वोट देगा.

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तब बीजेपी पर विपक्ष का यह आरोप क्यों कि वह ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है?

मैं ध्रुवीकरण की राजनीति को दिल से नापसंद करता हूं. ध्रुवीकरण चाहे किसी भी रुप में हो, ऐसी राजनीति मुझे मंजूर नहीं क्योंकि अपना देश बड़ा है और ध्रुवीकरण की राजनीति देश के लिए ठीक नहीं. ऐसी राजनीति कभी नहीं होनी चाहिए. राजनीति हमेशा इंसाफ और इंसानियत की होनी चाहिए.

इन चुनावों में आपके राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों ने प्रधानमंत्री पर निजी तौर पर हमला बोला है. इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है?

हर किसी को ध्यान रखना चाहिए कि वह किन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है. किसी को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि प्रधानमंत्री स्वयं में एक संस्था है और संस्था की गरिमा का सम्मान होना चाहिए. संस्थाओं की गरिमा गिराने और व्यवस्था को भंग करने का कोई प्रयास नहीं होना चाहिए क्योंकि देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है.

समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन ने ‘बाहरी बनाम यूपी वाला’ का अभियान छेड़ रखा है. इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?

प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है और यह कहना बेकार है कि वे बाहर के हैं (वे हंसते हुए कहते हैं).

समाजवादी पार्टी-कांग्रेस का गठबंधन कितनी ताकतवर है? अखिलेश यादव-राहुल गांधी की नई-नवेली दोस्ती बीजेपी के लिए कितना बड़ा खतरा है?

एक माइनस को दूसरे माइनस से जोड़ दें तो भी वह माइनस ही रहेगा. कोई गठबंधन नहीं हुआ है, दो कमजोर लड़ाई के लिए एक साथ आ मिले हैं (हंसते हुए कहते हैं). लेकिन यहां एक माइनस दूसरे माइनस के साथ आ मिला है. इस गठबंधन के किसी असर का कोई सवाल ही कहां पैदा होता है.

अखिलेश यादव ने अमिताभ बच्चन के प्रसंग में ‘गुजरात के गधे’ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल किया. इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं. आपका क्या कहना है?

बड़े दुर्भाग्य की बात है. अगर मैं उनकी जगह होता और कुछ ऐसा कहा होता, हालांकि मैंने कभी भी ऐसा नहीं कहा होता और जो जबान से फिसलकर बात निकल गई होती तो मैं तुरंत अपना बयान वापस ले लेता.

manmohan singh-narendra modi

मनमोहन सिंह के बारे में प्रधानमंत्री के रेनकोट वाली टिप्पणी को लेकर आपका क्या मानना है. क्या आज का सियासी तबका हास्य-विनोद की बातों को नहीं समझता और उसमें व्यंग्य को लेकर सहनशीलता नहीं है?

देखिए, आपको यह बात समझनी होगी कि प्रधानमंत्री ने एक तरह से मनमोहन सिंह का सम्मान ही किया था. मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचार के बहुत से मामलों से सनी रही लेकिन इन मामलों में मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व पर एक भी दाग-धब्बा नहीं लगा.

मनमोहन सिंह के बारे में सोचकर देखिए, यह मत भूलिए कि उन्होंने नोटबंदी को सबसे बड़ी संगठित लूट या संगठित अपराध करार दिया था. किसने लूटा, इसकी एक व्याख्या तो यह होगी कि प्रधानमंत्री लुटेरा है. सबसे बड़ा संगठित अपराध – अपराध तो कोई अपराधी ही करता है ना, तो इस तर्क के हिसाब से प्रधानमंत्री सबसे बड़े अपराधी ठहरते हैं.

अगर हमने इसी तर्क की लकीर पर सोचा होता तो हमें मनमोहन सिंह पर गुस्सा आता. हमने ऐसा नहीं किया लेकिन उन लोगों ने गलत व्याख्या (रेनकोट की) निकाली.

एक नेता के तौर पर राहुल गांधी आपको कैसा जान पड़ते हैं? कांग्रेस से रिटायर हो चली मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी शीला दीक्षित ने हाल ही में कहा कि राहुल को अभी परिपक्व होने में समय लगेगा क्योंकि वे अभी अपनी उम्र के चौथे दशक में पहुंचे हैं.

(हंसते हैं) …मैं बस यही कहूंगा कि मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं..(फिर हंसते हैं)..वे एक तपे और मंझे नेता बनकर उभरें.

क्या वे अभी परिपक्व नहीं हैं?

मैंने ऐसा नहीं कहा. मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद कि वे एक परिपक्व, तपे, ऊर्जावान और भविष्यदर्शी नेता बनकर उभरें.

कुछ समय पहले आपने यूपी में बीजेपी के 14 साल के वनवास की बात कही थी. पंद्रह साल पहले आपने सूबे की सत्ता छोड़ी थी. इन सालों में ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी इतनी बड़ी ताकत बनकर उभरी है?

देखिए, कारण मुझे पता है लेकिन मैं आपको बताऊंगा नहीं (हंसते हैं). मैं बस आपको इतना बता सकता हूं कि बीजेपी की ताकत बढ़ी है. लोगों को यकीन है कि बीजेपी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है.

मोदी जी की सरकार को देखकर और अटल जी की भी सरकार रही है. तो उसे भी देखकर लोगों को लगता है कि इनपर कभी कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा. जीडीपी की वृद्धि अपने शिखर पर पहुंची है.

लोग देख रहे हैं कि मोदी सरकार ने बीते ढाई सालों में काम किया है. भारत अब सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है. इन सारी बातों ने बीजेपी को सबसे ज्यादा विश्वसनीय पार्टी बनाया है.

hindu-muslim voters

बड़ी चर्चा है कि बीजेपी ने किसी मुसलमान को टिकट नहीं दिया . क्या पार्टी के ‘सबका साथ सबका विकास’ वाली टेक को इससे हानि नहीं पहुंचती?

हां ये बात सच है. टिकट जीत की संभावना के आधार पर दिए गए. शायद उधर ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं था सो टिकट नहीं मिला. लेकिन हमेशा ऐसा ही नहीं रहने वाला. आगे हम यूपी में इस बात का ध्यान रखेंगे.

अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को टिकट मिलने चाहिए. देश के बहुत से इलाकों में हमने उन्हें टिकट दिए हैं. गुजरात की विधानसभा में ऐसा कोई ना था तो एक को एमएलसी बनाया गया फिर मंत्रीपद मिला.

राजस्थान में हमारी पार्टी से मुस्लिम मंत्री हैं. केंद्र में भी हमारी सरकार में हमेशा मुस्लिम मंत्री रहे हैं. अभी मख्तार अब्बास नकवी और एम जे अकबर मंत्री हैं. हां, अच्छा होता कि सूबे में भी कोई उम्मीदवार रहता.

इन चुनावों में आपको अटल बिहारी वाजपेयी की कितनी याद आती है? आप लखनऊ से सांसद हैं, यह उनका भी निर्वाचन क्षेत्र रहा है और आपकी शैली बहुत कुछ उनसे मिलती-जुलती है.

मैं वाजपेयी जी को कभी भूल नहीं सकता. मैं उनसे बहुत गहरे में प्रभावित हूं. जहां तक उनकी विरासत का सवाल है, हम जैसे लोग कभी वाजपेयी नहीं बन सकते. उनके ऊपर ईश्वर की खास कृपा थी. वे दस सालों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं लेकिन आज भी उनके नाम पर लोग ताली बजाते हैं.

आपने बीजेपी के दोनों प्रधानमंत्री, वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के साथ काम किया है. क्या आपको दोनों की ताकत में कोई समानता नजर आती है. दोनों आपस मे किन बातों में समान और किन बातों में अलग हैं.

देखिए, मेरा मानना है कि एक नेता की दूसरे से तुलना करना ठीक नहीं है, तुलना करने पर दोनों ही के साथ आप इंसाफ नहीं कर पायेंगे. हरेक की अपनी खासियत होती है. हरेक के काम करने की एक अलग शैली होती है और उस कार्यशैली के भी अपने गुण होते हैं. दोनों की आपस में तुलना नहीं की जानी चाहिए.

आप और प्रधानमंत्री मोदी दोनों ही समकालीन है. मोदी जब पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी थे तब आप पार्टी के अध्यक्ष थे और अब आप गृहमंत्री हैं यानी व्यावहारिक रुप से देखें तो केंद्र में नंबर दो के स्थान पर. उनके साथ आपके रिश्ते कैसे हैं?

हमारे रिश्ते जैसे पहले थे वैसे ही आज भी हैं. लेकिन हां, बेशक हमें ध्यान रखना होगा कि वे हमारे प्रधानमंत्री हैं. इससे जुड़ी मर्यादा और शिष्टाचार का सम्मान करना होगा. मुझे भी इन बातों का ध्यान रखना है और मैं ध्यान रखता भी हूं.

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