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ब्रांडिंग और पीआर के हथियारों से लड़े जा रहे चुनावी महाभारत!

ब्रांडिंग अब सिर्फ जरूरत नहीं बल्कि गलाकाट सियासी स्पर्धा की बाध्यता भी है.

Tarun Kumar Updated On: Mar 02, 2017 03:50 PM IST

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ब्रांडिंग और पीआर के हथियारों से लड़े जा रहे चुनावी महाभारत!

यूपी में चुनावी जंग अब धीरे-धीरे अपने आखिरी पायदान तक पहुंच रही है. इस जंग में रैलियों, पदयात्राओं और डोर-टू-डोर कैंपेंनिंग के जांचे-परखे फॉर्मूले के साथ-साथ अब नए हथियार भी खूब दिख रहे हैं. चुनावी जंग अब ब्रांडिंग और पीआर की अकूत ताकत से लड़ी जाती हैं. इसी के साथ इस जंग के नए योद्धा भी सामने आए हैं.

प्रशांत किशोर, अहमद आफताब, प्रसून जोशी, पीयूष पांडेय, अफजल सिद्दिकी, आकाशनूर गादरी में क्या समानताएं हैं? क्या इनके दिमाग भी इन दिनों हमारी तरह ही सोचते हैं? क्या उनकी आंखें भी इन दिनों हमारी तरह साबुत नींद ले पा रही हैं? इन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि चुनावी जंग ने विज्ञापन, रचनात्मक लेखन, ब्रांडिंग, पीआर, लायजनिंग और मीडिया प्रबंधन क्षेत्र के इन धुरंधरों की दिनचर्या में उलटफेर कर दिए हैं.

चुनावी रणनीतियों के केंद्र बने ‘पार्टी वार रूम्स’ की गहमागहमी यह बयां करने के लिए काफी है कि असली जंग अब चुनावी रैलियों में नहीं, कहीं और लड़ी जा रही है.

अब वार रूम से चुनावी जंग

वार रूम चुनाव विज्ञान की प्रयोगशाला कहे जा सकते हैं. यहां टेक-सेवी पेशेवरों की फौज आंकड़ों के विश्लेषण, मीडिया रिसर्च और कम्युनिकेशन, फीडबैक, फील्ड रिपोर्ट, स्पीच रायटिंग, डिजिटल-रेडियो-टीवी-प्रिंट कम्युनिकेशन, क्रिएटिव रायटिंग आदि के मोर्चे पर डटी रहती है.

नेताओं के भाषण, घोषणापत्र, बयानबाजी, पहनावे-ओढ़ावे सब पर ब्रांडिंग का असर है. नेताओं के साक्षात्कार, बयान, पलटवार सबकी टाइमिंग यही टीम तय कर रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी की चाय वाली पृष्ठभूमि का उपहास क्या उड़ाया, मोदी की ब्रांडिंग टीम ने पलटवार करते हुए मोदी का ‘चाय पर चर्चा’ वाला कैंपेन चलाकर कांग्रेस की ब्रांडिंग की हवा निकाल दी!

मौजूदा चुनावी महाभारत को ब्रांडिग जंग का नमूना माना जा सकता है. बीजेपी, सपा, कांग्रेस, बसपा, अकाली दल, आम आदमी पार्टी सबने ब्रांडिंग की ताकत झोंक दी है.

अब बीजेपी के कैंपेन को ही लें- इसकी कमान एकसाथ कई एजेंसियों ने संभाल रखी है. पीयूश पांडेय की ओगिलवी एंड मैथर, प्रसून जोशी की मैक्केन्स, मैडिसन, क्रेयंस आदि की ब्रांडिंग रणनीति को जामा पहनाने में नामी तकनीकी, बिजनेस व मीडिया स्कूलों के प्रोफेशनल्स फील्ड से लेकर वार रूम तक फैले हैं.

दूसरी तरफ, अपनी जादुई ब्रांडिंग का लोहा मनवा चुके प्रशांत किशोर सपा-कांग्रेस कैंपेन की बागडोर संभाले हुए हैं. अखिलेश की लार्जर देन लाइफ इमेज बनाने की मुहिम में करीब 500 प्रोफेशनल्स वार रूम में डटे हैं, वहीं हजारों ग्राउंड वर्कर्स फील्ड से फीडबैक भेजते हैं.

बसपा भी इस होड़ में किसी से कम नहीं है. पार्टी की ब्रांडिंग की कमान अफजल सिद्दिकी के हाथों में हैं. वह पार्टी के वरिष्ठ नेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी के बेटे हैं. पार्टी ने हर जिले में 100 समर्पित टेक-सेवी युवाओं को वाट्सऐप, फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्यूटर आदि पर प्रचार सामग्रियां अपलोड और फीड करने की जिम्मेदारी सौंपी है. अपना दल, आरएलडी आदि ने भी अपनी क्षमता के अनुसार कुछ ब्रांडिंग एजेंसियों की सेवा ली हैं.

पंजाब में भी चला सोशल-कैंपेन

पंजाब में वोट डिब्बे में बंद हुए अब करीब महीना भर होने को है. लेकिन जब यहां चुनावी जंग चल रही थी तो ये नए हथियार यहां भी खूब चमके थे. पंजाब में मोहाली स्थित कांग्रेस वार रूम में 'पीके' की आई-पैक के करीब 450 प्रोफेशनल जमे रहे। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि लोकलुभावन बनाने के लिए ‘पंजाब दा कैप्टन’ प्रचार अभियान चलाया गया. इसका लक्ष्य अमरिंदर को महाराज की छवि से आजाद कराकर जनता से जोड़ना था.

अगर फेसबुक पर कैप्टन की कैंपेन के पेज को 9 लाख से अधिक लोगों की लाइक मिली, तो अकाली दल के नेता और पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखवीर बादल के फेसबुक पेज को 25 लाख से अधिक लाइक मिल चुके हैं. पार्टी ने भी कई एजेंसियों को हायर किया था. केजरीवाल की पार्टी की पंजाब कैंपेन भी कम धारदार नहीं रही. पार्टी को हजारों फ्रीलंसरों से मदद मिली, वहीं स्मार्ट फोन और लैपटॉप से लैस करीब 500 प्रोफेशनल्स ने आप की ब्रांडिंग की कमान संभाली.

यूं तो देश में चुनावी ब्रांडिंग और पीआर का कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है. इसकी शुरुआत करीब दो दशक पहले हो चुकी थी, लेकिन 2014 में ‘ब्रांड मोदी’ की अपार कामयाबी को गेम-चेंजर के तौर पर देखा जाता है.

2014 ने बदला माहौल

मोदी के मोदित्व को कॉरपोरेटी जामा पहनाने में प्रशांत किशोर के नेतृत्व में तब सिटीजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) और उन जैसे दूसरे खिलाड़ियों ने जो करिश्माई समीकरण बुने, वह नजीर बन गया.

15 राज्यों में हजारों फुल-टाइमर्स और एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों को इस कैंपेन को सफल बनाने में लगाया गया. सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए 700 टन लोहा जुटाने की मुहिम मोदी के इमेज को चमकाने की रणनीति का हिस्सा थी. तब मैडिसन, एपीसीओ वल्र्डवाइड, म्यूचुअल पीआर जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भी मोदी की ब्रांडिंग का चमकाने का जिम्मा सौंपा गया. इन एजेंसियों ने ‘सबका साथ, सबका विकास, ‘अच्छे दिन आएंगे’ जैसे जुमले गढ़कर मोदी की ब्रांडिग की धार तेज कर दी.

कहा जाता है कि तब मैडिसन ने ही अकेले भाजपा से 300 से 400 करोड़ रूपए का अनुबंध किया था! कांग्रेस भी इस स्पर्धा में पीछे नहीं थी. उसने जेनेसिस बर्नसन-मार्सटेलर और डेंन्स्टू नामक दो विदेशी एजेंसियों की सेवा ली थी. प्रशांत किशोर बाद में नीतीश के साथ आए और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू-नीतीश गठबंधन की जीत से पॉलिटिकल ब्रांडिंग क्षेत्र का सबसे बड़ा उलटफेर कर दिया. महज एक साल पहले अपराजेय बनकर उभरे मोदी को बिहार में हार देखनी पड़ी.

राजनीतिक व चुनावी ब्रांडिंग की महिमा से शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, वामदल, डीएमके, एआईएडीएमके जैसी कोई पार्टी अछूती नहीं है. ममता बनर्जी ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपने करीबी अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ'ब्रायन के नेतृत्व में गठित वार रूम को मीडिया मैनेजमेंट की पूरी छूट दे रखी थी. हालिया बीएमसी चुनाव में शिवसेना और बीजेपी ने अपनी पूरी ब्रांडिग ताकत झोंक दी थी. अब तो वामदलों को भी ब्रांडिंग की महिमा समझ में आने लगी है, इसलिए केरल के मुख्यमंत्री पिन्नरई विजयन अपनी उपलब्धियों के प्रचार प्रसार में ब्रांडिंग पर खास जोर देते हैं.

सोशल मीडिया की अपरंपार पहुंच और विजुअल मीडिया की वैश्विक बूम ने चुनावी ब्रांडिंग को नुक्कड़ सभाओं, असंठित रैलियों की सीमा से बाहर निकालकर कॉरपोरेटी लुक दे दिया है. जाहिर है, चुनाव नेता लड़ते हैं, पर उनके हर दांव वार रूम से नियंत्रित होते हैं. ब्रांडिंग अब सिर्फ जरूरत नहीं बल्कि गलाकाट सियासी स्पर्धा की बाध्यता भी है.

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