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यूपी चुनाव 2017: चुनावी भाषा गंधाने लगी है, दलों में बढ़ती हताशा है इसकी जिम्मेदार

नेता निराशाजनक स्थिति पर सिर्फ हताश उपायों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देने में लगे हुए हैं

Akshaya Mishra Updated On: Feb 23, 2017 08:07 AM IST

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यूपी चुनाव 2017: चुनावी भाषा गंधाने लगी है, दलों में बढ़ती हताशा है इसकी जिम्मेदार

अपने प्रतिद्वंद्वियों की निंदा करने की नित- नई गहराइयां नापने वाले राजनीतिज्ञों का दम्भ भरा शोर बेमतलब है. क्या पहले ऐसा होते हमने नहीं देखा है? जब भी हमारे नेताओं के पास विचार खत्म हो जाते हैं, वे व्यक्तिगत हमलों और अपमानजनक भाषा का सहारा ले लेते हैं.

यही आदत हम उत्तरप्रदेश में अपनाई जाती देख रहे हैं. इस बार शायद फर्क बस इतना है कि दलों के बड़े प्रचारक आगे हैं, और इस बात में कोई शक नहीं है कि आमतौर पर हम लोग इनको इनकी असंयमी भाषा के लिए जानते हैं.

आप कह सकते हैं कि बढ़ रही हताशा इसकी जिम्मेदार है. उत्तर प्रदेश में तीन चरणों में मतदान से अब तक तो किसी रुझान का पता नहीं चल पाया है. प्रदेश में पहले चरण का वोटिंग पैटर्न आमतौर पर चुनाव के बाकी हिस्से के लिए एक ट्रेंड सेटर माना जाता है.

यूपी में हर पार्टी जीत का दावा कर रही है

तो भी सभी बूथों पर तीन चरणों और ज्यादा वोटिंग के बाद भी समझ में नहीं आता कि हर पार्टी हर चरण में जीत का दावा कैसे कर रही है. आधी दूरी तय करने के बाद आने वाले उलझाऊ संकेतों के साथ पार्टियों अब वापस वही करने लग गई हैं जो उनके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है - अपने विरोधियों की बखिया उधेड़ना और विवादास्पद मुद्दों को उठाना.

BSP Mayawati Press Conference

यहां हम अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हवाला दे सकते हैं जो कि 'SCAM' शब्द के साथ अपनी रचनात्मकता का परिचय दे रहे हैं. उन्होंने इसको समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, अखिलेश यादव और मायावती का इसी क्रम में एब्रीविएशन तैयार कर दिया है. और इसके बाद उन्होंने BSP को बहनजी संपत्ति पार्टी बना डाला.

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कब्रिस्तान, शमशान की बात और ईद के समय बिजली का होना और दीवाली पर न होना - जैसी उनकी उक्तियों से उनकी नियत का साफ पता चलता है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सभी कसाई खानों पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं. उन्होंने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कैराना से हिंदू परिवारों के पलायन का भी इशारों में जिक्र कर डाला. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश यहां इतनी मुश्किल भी नहीं है.

मायावती ने तो नरेंद्र दामोदरदास मोदी से अपना बदला ले भी लिया. सुल्तानपुर में एक रैली में उन्होंने NDM (Narendra Damodardas Modi) को नकारात्मक दलित आदमी का एब्रीविएशन बना दिया. यहां ये तो कहना पड़ेगा कि इसमें बहुत कल्पनाशीलता नहीं थी.

अन्यथा वोट पाने के लिए साम्प्रदायिकता का कार्ड खेलने का आरोप लगा कर मायावती तो मोदी पर टूट ही पड़ी थीं. प्रधानमंत्री को यह शोभा नहीं देता - अपने सुनने वालों को ये बात बताना वो नहीं भूलीं.

अखिलेश की भाषा भी है बदली-बदली

अखिलेश वैसे तो एक शांत वक्ता हैं लेकिन उन्होंने भी बीजेपी के स्टार प्रचारकों पर शब्दों का 'गधा'-प्रहार किया. उन्होंने अमिताभ बच्चन को गुजरात के गधों के लिए प्रचार न करें - वाली बात कहने में बहुत सारे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, फिर भी समझ में आया कि उनका इशारा किस तरफ है.

राहुल, अखिलेश का साथ

राहुल, अखिलेश का साथ

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी के लिए अपना सबसे अच्छा शब्द-बाण चलाया और मोदी की तुलना गब्बर सिंह से कर दी. यहां तक कि प्रियंका गांधी ने भी उनके बाहरी होने का मजाक बनाया.

चुनाव चूंकि चौथे चरण में प्रवेश कर गया है और इसका अपने अगले चरणों में पहुंचने के साथ ही इस तरह के प्रवचन और भी दूषित होते चले जाएंगे.

प्रदेश का विकास और वास्तविक समस्याओं पर रैलियों में बात होने की उम्मीद कम ही है. 'मोदी बनाम सभी' की लड़ाई ने तो पहले से ही आकार ले लिया है और जिस तरह से ये आगे बढ़ी रही है इससे लगता है कि जल्दी ही ये 'यूपी वाला बनाम बाहरी व्यक्ति' की लड़ाई में तब्दील हो जाएगा.

कुछ ही लोग मानते हैं कि साम्प्रदायिक मसले चुनाव के दौरान कभी नहीं उठाये जाएंगे. सच तो ये है कि बीजेपी का कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं होना ही ये जाहिर करता है कि बीजेपी अपने पक्ष में हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की तरफ लक्ष्य कर रही है जबकि हिन्दू समुदाय के वोट गठबंधन और बसपा के बीच बंट गए हैं.

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इसलिए हैरानी की बात नहीं होगी अगर अब सम्प्रदाय-केंद्रित शब्दों का आडम्बर असहनीय मात्रा में सुनाई देने लगे.

राजनीति में ये गिरावट की हद नहीं है 

सात चरण के चुनाव को बहस की गुणवत्ता में गिरावट के लिए दोषी ठहराया जा सकता है. ये कुछ ज्यादा ही लंबा है और कुछ समय बाद थकान आ ही जाती है. शुरुआती कुछ रैलियों में अपनी सबसे आकर्षक पंक्तियां बोलते-बोलते ये हालत आ जाती है कि प्रमुख प्रचारकों के पास आगे की रैलयों में बोलने को कुछ खास बचता ही नहीं. और टेलेविजन चैनल्स को भी उनके सारे व्याख्यान लोगों के घरों तक लाइव पहुंचाने में कुछ फायदा नहीं होता.

लोगों को पहले से ही पता रहता है कि क्या बोला गया है, उनको किसी दिलचस्प बात में उलझाये रखना जरूरी होता है. इसका स्टार प्रचारकों की कम संख्या से भी लेना-देना होता है क्योंकि इससे नयेपन की संभावना मारी जाती है.

क्या हमने गिरावट की हद देख ली है? बिलकुल नहीं. समकालीन राजनीति में, जहां कटुता दलों के बीच के रिश्ते को परिभाषित करती है, गिरावट के लिए कोई सीमा नहीं है. इस खेल में तो ऐसा होता ही है. नेता निराशाजनक स्थिति पर सिर्फ हताश उपायों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देने में लगे हुए हैं.

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