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यूपी चुनाव 2017: जनता थकी, नेता वही पर गारंटी किसी की नहीं

यूपी की राजनीति में कोई नई बात नहीं है जनता इन जुमलों को सुनते-सुनते थक गई है

Ambikanand Sahay Updated On: Feb 19, 2017 03:55 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: जनता थकी, नेता वही पर गारंटी किसी की नहीं

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥

रामायण में लिखी ये चौपाई आज भी बहुत मायने रखती है. गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस में त्रिकाल दर्शी गुरू वशिष्ठ ने यह भविष्यवाणी राम के राज्य अभिषेक के लिए की थी. जब ये भविष्यवाणी गलत साबित हो सकती है. तो कोई भी भविष्यवाणी गलत साबित हो सकती है.

मसला दोबारा अखिलेश के राज्य अभिषेक का है. तो हमें किसी भी भविष्यवाणी पर विश्वास नहीं करना चाहिए.

हालात कुछ ऐसे हैं कि यूपी ही नहीं पूरी दुनिया में जहां भी चुनाव हुए नतीजे उम्मीद से अलग ही आए हैं- चाहे ट्रंप का अमेरिका का राष्ट्रपति बनना हो या मसला ब्रेक्जिट का हो- सभी मुद्दों पर दिग्गज पत्रकार गलत साबित हुए हैं.

hindu-muslim voters

तीसरे चरण में 69 सीटों पर मतदान हो रहे हैं. तीसरे चरण में मुस्लिम फैक्टर कोई खास मायने नहीं रखता. पहले दो चरण में हुए चुनावों में मुस्लिम वोटर इससे कई ज्यादा थे. सपा-बसपा के लिए मुस्लिम वोटर काफी मायने रखता है. सपा-बसपा की उम्मीदें कम होने का मतलब बीजेपी की उम्मीद बढ़ जाना है.

यूपी में जातीय समीकरण भी बहुत मायने रखता है. धार्मिक आधार कमजोर होने पर कास्ट फैक्टर बहुत प्रभावशाली हो जाता है. इससे पहले 2012 में समाजवादी पार्टी ने 69 सीटों में से 55 जीतकर ये साबित भी कर दिया था.

यूपी की ग्राउंड रिपोर्ट पर अगर नजर डालें तो इस बार राज्य में हिंदू-मुसलामानों के बीच तनाव नहीं दिख रहा है. इसलिए इस बार हम कह सकते हैं ना तो धार्मिक ध्रुवीकरण होगा ना ही काउंटर ध्रुवीकरण होगा. इससे ये कहना गलत नहीं होगा.

Mulayam Singh

यूपी में 2012 के चुनावों में मुलायम की समाजवादी पार्टी की सुनामी चली थी. ये मोदी से लहर से कई ज्यादा मजबूत थी. मोदी लहर में भी बीजेपी को इस लिहाज से तीसरे चरण में सिर्फ 52 सीट ही मिले थे.

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि जातीय समीकरण को बेहतर ढंग से कौन आकर्षित कर सकता है- सपा बसपा या बीजेपी. यहां पर एक सच्चाई बतानी जरूरी है कि पिछले दो साल में बीजेपी ने गैर ओबीसी वोटबैंक को काफी हद तक अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता पाई है.

वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव जो कि आज अपनी नई छवि के साथ मैदान में हैं. वो सवर्णों को कुछ हद तक अपनी और आकर्षित करने में कामयाब हुए हैं. और जहां तक बीएसपी सुप्रीमो मायावती का ख्याल है. दलित वर्ग का करीब 90 फीसद हिस्सा हाथी के साथ खड़ा दिखाई देता है.

हालांकि विकास की बात ऐलान के तौर पर सब पार्टी करती हैं. लेकिन जब आप यथार्थ में उनके निगेटिव कैपेनिंग में मशगूल हैं. नरेंद्र मोदी के इस वक्तव्य पर कि वो गुजरात में पैदा हुए हैं और यूपी ने उन्हें गोद ले लिया है यूपी को एक नया चुनावी मद्दा दे दिया है.

Priyanka Gandhi

पीएम मोदी को जवाब देते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि यूपी को गोद लिए हुए बेटे की जरूरत नहीं है यहां और भी बेटे हैं. मायावती ने कहा यूपी को गोद लिए हुए बेटे की क्या जरूरत है. जबकि उसकी खुद की बेटी यहां है.

इसके अलावा तीनों प्रमुख पार्टियां एक दूसरे की कमी झांकने में व्यस्त हैं. 15 लाख वाला जुमला, नोटबंदी से उपजी अफरा-तफरी. बीजेपी जोरदार ढंग से गुंडाराज का मसला उठा रही हैं. और बसपा के भ्रष्टाचार को उजागर कर रही है. ये देखना दिलचस्प होगा कि निगेटिव कैंपेनिंग से कौन जनता को लुभा पाएगा. ये राजनीति में कोई नई बात नहीं है जनता इन जुमलों को सुनते-सुनते थक गई है.

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