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यूपी चुनाव 2017: अच्छा है, मुलायम अब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हैं!

अगर सपा हारती है, तो मुलायम सारा ठीकरा अखिलेश पर फोड़ देंगे.

Harshvardhan Tripathi Updated On: Feb 22, 2017 02:43 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: अच्छा है, मुलायम अब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हैं!

गांधीनगर से बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी सांसद हैं. लेकिन, गांधीनगर क्या पूरे गुजरात में चुनावी हार-जीत का जिम्मा लंबे समय से नरेंद्र मोदी के ही ऊपर है.

अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने और अमित शाह के बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात की हर जीत इस जोड़ी को ताकतवर करती है और हर हार के बाद लोगों के निशाने पर यही दोनों होते हैं.

यूपी में हार-जीत का सारा जिम्मा मुलायम के सिर

2017 के पहले तक उत्तर प्रदेश में होने वाली हर जीत-हार का जिम्मा मुलायम सिंह यादव पर ही रहता है. हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने बेटे से लड़ाई में कई बार ये बोला कि अखिलेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहते समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में 5 सीटों पर सिमट गई. वो भी भला हो मुलायम सिंह का कि उन्होंने आजमगढ़ जाकर एक सीट बीजेपी के मुंह से अपने खाते में खींच ली.

अब सवाल ये है कि 2014 में मुलायम सिंह यादव को जिताने वाला आजमगढ़ 2017 में कैसे वोट करने जा रहा है?

आजमगढ़ सपा का गढ़ है

आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में 10 से 9 विधानसभा सीटें एसपी ने जीत ली थीं. समाजवादी पार्टी के पारम्परिक मतदाता आधार- यादव+मुसलमान- के आधार पर आजमगढ़ को पूरब का इटावा कहा जा सकता है.

आजमगढ़ में लम्बे समय तक रमाकांत यादव ने मुलायम की मशाल जलाए रखी. 1999 में पहली बार रमाकांत यादव समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनकर लोकसभा पहुंचे, फिर वो बीएसपी के रास्ते बीजेपी में पहुंच गए और 2009 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ में कमल खिला दिया.

Yogi Adityanath Keshav prasad maurya

आजमगढ़ में कमल का खिलना महत्वपूर्ण इसलिए भी रहा क्योंकि ये जिला प्रदेश के सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाले जिलों में है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुसलमान इसी जिले में हैं.

इसीलिए 2009 में भले ही रमाकांत यादव लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हुए. लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 10 में से 9 सीटें झटक ले गई और 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम यहां से सांसद हो गए. इस लिहाज से आजमगढ़ ने एसपी को मजबूत किया है.

एसपी-बीएसपी के मुकाबले के बीच बीजेपी का दांव

एसपी का सीधा मुकाबला बीएसपी से ही रहता है. लेकिन 2017 में इस किले में दरार साफ दिखने लगी है.

बूढ़नपुर तहसील अदालत में एडवोकेट और ग्राम प्रधान प्रवीण सिंह कुछ यूं फरमाते हैं.

ये भाजपा का स्वर्णिमकाल है. 1991 में दोनों सुरक्षित विधानसभा सीटें बीजेपी ने जीती थीं. लालगंज 1996 में जीती थी. संयोग देखिए कि 91 और 96 में बीजेपी की सरकार भी बनी.

लालगंज सुरक्षित से बीजेपी ने दरोगा सरोज को टिकट दिया है. पुराने सपाई हैं. उन्हें अपनी जाति का मत मिल सकता है. सवर्ण मतदाता पूरे प्रदेश में लगभग बीजेपी के साथ दिख रहे हैं. सुरक्षित सीट होने से यहां सवर्ण मतदाताओं के पास कोई विकल्प भी नहीं है. बीजेपी की स्थिति अच्छी दिख रही है.

मायावती के समर्थक

हालांकि, लालगंज बीएसपी की मजबूत सीट है. सुखदेव राजभर लगातार 1991 से यहां से चुनकर विधानसभा पहुंचते रहे. सिर्फ 1996 में बीजेपी से नरेंद्र सिंह जीते थे और 2012 में ये विधानसभा सुरक्षित हो गई. समाजवादी पार्टी के बेचई सरोज ने 2012 में ये सीट जीती. वो फिर से किस्मत आजमा रहे हैं. बीएसपी ने यहां से आजाद अरिमर्दन को टिकट दिया है.

मेहनगर सुरक्षित सीट से समाजवादी पार्टी ने विधायक बृजलाल सोनकर की जगह कल्पनाथ सरोज को टिकट दिया है. बीएसपी ने यहां से फिर से विद्या चौधरी को टिकट दिया है. भारतीय समाज पार्टी से अरविंद कन्नौजिया की पत्नी चुनाव लड़ रही हैं. बीजेपी ने समझौते में ये सीट भारतीय समाज पार्टी को दी है. इस विधानसभा में सबसे ज्यादा ठाकुर मत हैं. करीब 70,000 ठाकुर वोट बीजेपी गठजोड़ को मिल सकता है.

दीदारगंज सीट पर समाजवादी पार्टी ने वर्तमान विधायक आदिल शेख पर फिर से दांव लगाया है. शेख अबू आजमी के नजदीकी माने जाते हैं. बीएसपी ने फिर से सुखदेव राजभर को टिकट दिया है. बीजेपी ने यहां से कृष्ण मुरारी विश्वकर्मा को टिकट देकर मुकाबला रोचक बना दिया है. विश्वकर्मा को बीएसपी सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा मिला था.

फूलपुर सीट से रमाकांत यादव का लड़का अरुणकांत यादव कमल निशान पर फिर से किस्मत आजमा रहा है. 2012 में इस सीट से विधायक श्याम बहादुर यादव फिर से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हैं और बीएसपी से अबू कैश फिर से लड़ रहे हैं. फूलपुर में सबसे ज्यादा यादव मतदाता, दलित मुसलमान भी अच्छी संख्या में हैं.

अतरौलिया में बदल सकते हैं समीकरण

अतरौलिया विधानसभा में बीजेपी ने कन्हैयालाल निषाद को प्रत्याशी बनाया है. अतरौलिया से समाजवादी पार्टी से विधायक संग्राम यादव को फिर से टिकट मिला है. बीएसपी ने यहां अखंड प्रताप सिंह को टिकट दिया है.

यहां भी मुकाबला सपा-बसपा के बीच ही रहता है. लेकिन, कन्हैयालाल निषाद ने मुकाबला रोचक बना दिया है. यहां 40,000 निषाद मतदाता हैं. क्षत्रिय ब्राह्मण मत मिलाकर करीब 60,000 हैं. इससे कन्हैयालाल का पलड़ा भारी होता दिख रहा है. कन्हैयालाल का भाई इसी विधानसभा में ग्राम प्रधान है और कन्हैयालाल मुंबई के कारोबारी हैं.

गोपालपुर सीट से समाजवादी पार्टी से वसीम अहमद विधायक हैं. वसीम 1996 और 2002 में भी यहां से विधायक रह चुके हैं. फिर भी समाजवादी पार्टी ने वसीम का टिकट काटकर नफीज अहमद को टिकट दे दिया है.

बीएसपी ने यहां से कमला प्रसाद यादव को टिकट दिया है. इस विधानसभा सीट पर यादव दलित मुसलमान की अच्छी खासी संख्या है. अन्य पिछड़ा मतदाता भी यहां अच्छी संख्या में हैं. गोपालपुर से बीजेपी से किरण पाल मैदान में हैं. संघ पृष्ठभूमि से आने वाले किरण पाल को अन्य पिछड़े मतों के साथ सवर्ण मतों के साथ आने का फायदा मिल सकता है.

यूपी के वोटर के बारे में ये कहा जाता है कि वो अक्सर भावनाओं में आकर वोट देता है

सगड़ी सीट बीएसपी मजबूत दिख रही है. बीएसपी से सर्वेश सिंह सीपू की पत्नी वंदना सिंह चुनाव लड़ रही हैं. सर्वेश सिंह एसपी से 2007 में विधायक चुने गए थे. पति की हत्या के बाद सहानुभूति लहर वंदना सिंह के पक्ष में है. यहां बीजेपी से देवेंद्र सिंह और एसपी से विधायक अभय नारायण सिंह मैदान में हैं.

आजमगढ़ की सदर सीट से एसपी के पूर्व मंत्री दुर्गा यादव मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं. उनके सामने बीएसपी से भूपिंदर सिंह मुन्ना और बीजेपी से अखिलेश मिश्रा हैं. त्रिकोणीय मुकाबला बन रहा है. मुबारकपुर से शाम आलम गुड्डू जमाली अकेले बीएसपी विधायक हैं. उनके सामने एसपी के अखिलेश यादव और बीजेपी से लक्ष्मण मौर्य मुकाबले में हैं.

बीएसपी सरकार में कोऑपरेटिव चेयरमैन रहे लक्ष्मण मौर्य को टिकट देकर बीजेपी ने मुकाबला रोचक कर दिया है. निजामाबाद से एसपी ने वर्तमान विधायक आलम बदी पर फिर से भरोसा किया है. लेकिन बीएसपी ने मुसलमान की बजाय इस बार चंद्रदेवराम यादव को प्रत्याशी बनाया है. बीजेपी ने अपने पूर्व जिलाध्यक्ष विनोद राय को टिकट दिया है.

अखिलेश के सिर फूटेगा ठीकरा

अभी तक आजमगढ़ में सुरक्षित सीट को छोड़कर ज्यादातर सपा-बसपा के बीच ही मुकाबला रहता था और उसमें सपा का पलड़ा भारी होता था. लेकिन इस बार बीजेपी अन्य पिछड़ा और अति पिछड़ा प्रत्याशी उतारकर समाजवादी पार्टी के इस पूर्वी किले में तगड़ी सेंध मारने का इंतजाम कर रखा है.

राजभरों की पार्टी से समझौते की वजह से आजमगढ़ जिले में राजभर मतदाता पूरी तरह से बीजेपी के ही साथ आ गया है. इसलिए आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी के इस मजबूत किले पर अगर विरोधी पार्टियां कब्जा करने में कामयाब होती हैं, तो मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ये कहकर बच सकते हैं कि हम दोनों भाइयों में से कोई भी पार्टी पदाधिकारी नहीं है. इसका सारा जिम्मा अखिलेश यादव को ही लेना होगी.

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